
रुचि की विशेषताएँ (Characteristics of Interest)
रुचि की विशेषताएँ- परामर्श एवं निर्देशन कार्य के लिए रुचियाँ अत्यन्त ही महत्वपूर्ण हैं। ये अधिगम एवं कक्षा को महत्वपूर्ण एवं उपयोगी बनाती हैं। रुचि की विशिष्ट विशेषताओं वर्णन निम्नलिखित है-
(1) रुचि व्यक्तित्व का एक अंग है। सम्पूर्ण मानस व्यवहार का एक पहलू है।
(2) रुचि अनुभव में संलग्नता की प्रवृत्ति है।
(3) रुचि वंशानुक्रम एवं वातावरण से प्रभावित होती है।
(4) आयु बढ़ने के साथ-साथ रुचियों की विभिन्नता समाप्त हो जाती है।
(5) रुचि किसी क्रिया के प्रति आकर्षित होने, पसन्द करने एवं सन्तुष्टि पाने प्रवृत्ति है।
(6) रुचि सुखान्त भावनाओं या व्यवहार के आकर्षण का प्रतिबिम्ब है।
(7) रुचि किसी वस्तु के प्रति जाग्रत होने, प्रतिक्रिया करने की प्रवृत्ति है।
(8) रुचि किसी वस्तु के प्रति ध्यान केन्द्रित करने वाली प्रवृत्ति है, रुचि एवं एक ही सिक्के के दो पहलू है।
(9) रुचि व्यवहार के समस्त क्षेत्रों से सम्बन्धित एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है।
रुचियों के स्रोत (Sources of Interest)-
रुचि के क्षेत्र में हुए विभिन्न अनुसन्धानों के परिणामों के आधार पर स्वीकारा जाता है कि पियों का जन्म मनो-शारीरिक कारणों से होताना इसके विकास में अन्य मनोवैज्ञानिक पहलुओं की भाँति वंशानुक्रम एवं वातावरण का महत्वपूर्ण योगदान रहता है। अतः कहा जा सकता है कि रुचि जन्मजात एवं अर्जित दोनों प्रकार की होती है।
सुपर के अनुसार- “रुचि की उत्पत्ति में जहाँ एक ओर जन्मजात अधिक्षमता एवं अन्तःस्रावी तत्व सहायक होते हैं, वहाँ दूसरी ओर सुविधाओं एवं सामाजिक मूल्यांकन का भी विशेष प्रभाव पड़ता है। कुछ वस्तुएँ जिन्हें व्यक्ति भली-भाँति चाहता है तथा जो उसको मान्यता एवं सन्तुष्टी प्रदान करती है रुचि कहलाती है। यही नहीं, कुछ व्यक्तियों के किसी कार्य को करने की रुचि अपने साथियों के तादात्म्य से होती है। कभी-कभी व्यक्ति स्वयं भी रुचि के प्रति अपना प्रत्यय बना लेता है।
उक्त विचार के विपरीत रुचि के सम्बन्ध में दूसरी आधुनिकतम विचारधारा यह है कि जन्मजात न होकर अर्जित होती है। आदत एवं क्षमताओं की तरह इनको भी समाज रटकर,. समाज के साथ अन्तःक्रिया करके अर्जित किया जाता है। समाज की सभ्यता एवं संस्कृति का इनके विकास में महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। थोर्नडाइक का इस सम्बन्ध में निष्कर्ष है कि ‘रुचि अर्जित की जाती है।
संक्षेप में कहा जा सकता है कि विकास में विभिन्न तथ्यों का महत्वपूर्ण योगदान रहता है। इच्छाएँ, आवश्यकताएँ, अभाव, अनुभव, सुविधाएँ, संस्कृति शिक्षा आदि ऐसे तत्व हैं जो रुचियों के निर्धारण के आधार है। इन तथ्यों के परिवर्तन से रुचियों के परिवर्तन परिलक्षित होता है। अतः कह सकते हैं कि रुचियों में गत्यात्मकता पाई जाती है। समाज की परिस्थितियों, सुविधाओं, स्वीकृतियों, मान्यताओं आदि के परिवर्तन से व्यक्ति की रुचियाँ परिवर्तित हो जाती हैं। कुल मिलाकर रुचियाँ स्वरूप से परिवर्तनशील होती हैं।
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