B.Ed. / BTC/ D.EL.ED / M.Ed.

शैक्षिक निर्देशन के स्तर | Different Levels of Educational Guidance in Hindi

शैक्षिक निर्देशन के स्तर

शैक्षिक निर्देशन के स्तर (Different Levels of Educational Guidance)

व्यक्ति का सर्वांगीण विकास उसकी शिक्षा व्यवस्था द्वारा होता है। मानव जीवन में शिक्षा की उपादेयता है। शैक्षिक निर्देशन मानव जीवन की समस्याओं के समाधान में सहायक बनता है। शैक्षिक निर्देशन (Educational Guidance) का सम्बन्ध व्यक्ति के व्यावसायिक निर्देशन (Vocational Guidance) से भी बहुत गहरा व करीबी है। शैक्षिक निर्देशन का कुछ भाग व्यक्ति के व्यक्तिगत निर्देशन (Personal Guidance) से भी सम्बन्ध रखता है। अतः व्यक्ति को शैक्षिक निर्देशन देते समय उसके व्यक्तिगत निर्देशन तथा व्यावसायिक निर्देशन के पक्षों को भी ध्यान में रखना होता है।

विद्यार्थी के विभिन्न आयु स्तरों की विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए उन्हें शैक्षिक निर्देशन दिया गया उनके भावी जीवन को सम्भव बनाने में अपनी भूमिका का निर्वहन करने में सहायक होता है अतः शैक्षिक निर्देशन प्राथमिक स्तर, माध्यमिक स्तर तथा महाविद्यालय स्तरों पर विशेषताओं तथा आवश्यकताओं के आधार पर निर्देशन को निर्धारित करना अति आवश्यक होगा।

शैक्षिक निर्देशन के विषय क्षेत्रों से तात्पर्य है कि शैक्षिक निर्देशन की मुख्य रूप से आवश्यकता किन-किन अवसरों पर पड़ती है? शैक्षिक निर्देशन के कार्यक्षेत्र के अन्तर्गत निम्नलिखित बिन्दु समाहित हैं-

1. माध्यमिक स्तर तक शिक्षर प्राप्त करने के पश्चात् विद्यार्थियों की एक मुख्य समस्या  होती है और वह होती है कि वे आगे उच्च शिक्षा को बढ़ायें या फिर व्यावसायिक पाठ्यक्रम में प्रवेश में लें अथवा कोई रोजगार शिक्षण-प्रशिक्षण प्राप्त करें। उच्च शिक्षा के अध्ययन-विषय का चयन करना विद्यार्थी-वर्ग की एक मुख्य समस्या होती है। इसमें शैक्षिक निर्देशन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। विद्यार्थी को निर्देशन द्वारा इसमें काफी सहयोग मिलता है कि वह कृषि वर्ग, विज्ञान वर्ग, वाणिज्य अथवा कला वर्ग के अध्ययन-विषयों का चयन करे जिससे उसकी भविष्य की सुखद जीवन-प्रक्रिया बन सके। अध्ययन-विषयों के चयन में शैक्षिक निर्देशन सेवा विद्यार्थियों की क्षमताओं, उपलब्ध साधनों तथा उनकी अभिरुचियों को ध्यान में रखते हुए दी जानी चाहिए, तभी वह अपने जीवन की लक्ष्यित सफलता प्राप्त कर सकेंगे।

2. जब विद्यार्थी अपनी शैक्षिक उपलब्धियों को अपेक्षित स्तर पर प्राप्त नहीं कर पाता या फिर उसे असफलता ही मिले तब ऐसी स्थिति में उसे शैक्षिक निर्देशन के द्वारा काफी सहयोग प्रदान किया जा सकता है। इस स्थिति में शैक्षिक निर्देशन के अन्तर्गत निर्देशनकर्ता को सर्वप्रथम असफलता के कारणों से विदित होना आवश्यक हो जाता है कि आखिर किन कारणों से विद्यार्थी अपेक्षित उपलब्धि प्राप्त नहीं कर पा रहा है। उन कारणों (बाधक तत्वों) को दूर करके उसकी प्रगति में सुधार किया जा सकता है। स्मरण रहे कि बाधक कारणों के होने पर कठिन परिश्रम भी पर्याप्त परिणाम नहीं दे पाता है।

3. शिक्षा प्राप्त करते समय अर्थात् शैक्षिक जीवन में कभी-कभी विद्यार्थियों में कई कारणों से अवांछनीय आदतें पड़ जाती हैं जिनसे उनके सामने समायोजनात्मक समस्यायें आने लगती हैं। उनसे सहपाठी, मित्र, शिक्षक व परिजन भी असंतुष्ट रहने लगते हैं। अतः उनके सामने समायोजनात्मक समस्याएँ (Adjustment Problems).उत्पन्न हो जाती है। इस अवांछनीय व्यवहार को दूर करने के लिए व्यक्तिगत निर्देशन (Personal Guidance) के साथ-साथ शैक्षिक निर्देशन का उपयोग करना विशेष लाभकारी होता है। क्योंकि विद्यार्थी के इस अवांछनीय व्यवहार के कुछ कारण तो व्यक्तिगत व सामाजिक होंगे लेकिन कुछ कारक ऐसे भी होंगे जो शैक्षिक कारणों में आएंगे यथा- पढ़ाई में मन न लगना, पाठ्यक्रम में रुचि न होना इत्यादि। शैक्षिक निर्देशन के द्वारा विद्यार्थी की इन समस्याओं के समाधान के सन्दर्भ में उचित व लाभकारी निर्देशन प्रदान कर उसकी स्थिति को काफी सुधारा जा सकता है जिससे वह अपने शैक्षिक लक्ष्य को सुगमता से प्राप्त कर सकता है।

  1. निर्देशन का अर्थ, परिभाषा, तथा प्रकृति
  2. निर्देशन का क्षेत्र और आवश्यकता
  3. व्यक्तिगत निर्देशन (Personal Guidance) क्या हैं? 
  4. व्यावसायिक निर्देशन से आप क्या समझते हैं? व्यावसायिक निर्देशन की परिभाषा दीजिए।
  5. वृत्तिक सम्मेलन का अर्थ स्पष्ट करते हुए उसकी क्रिया विधि का वर्णन कीजिए।
  6. व्यावसायिक निर्देशन की आवश्कता | Needs of Vocational Guidance in Education
  7. शैक्षिक निर्देशन के उद्देश्य एवं आवश्यकता | 
  8. शैक्षिक निर्देशन का अर्थ एवं परिभाषा | क्षेत्र के आधार पर निर्देशन के प्रकार
  9. शैक्षिक दृष्टिकोण से निर्देशन का महत्व
  10. शिक्षण की विधियाँ – Methods of Teaching in Hindi
  11. शिक्षण प्रतिमान क्या है ? What is The Teaching Model in Hindi ?
  12. निरीक्षित अध्ययन विधि | Supervised Study Method in Hindi
  13. स्रोत विधि क्या है ? स्रोत विधि के गुण तथा दोष अथवा सीमाएँ
  14. समाजीकृत अभिव्यक्ति विधि /समाजमिति विधि | Socialized Recitation Method in Hindi
  15. योजना विधि अथवा प्रोजेक्ट विधि | Project Method in Hindi
  16. व्याख्यान विधि अथवा भाषण विधि | Lecture Method of Teaching

इसे भी पढ़े ….

  1. सर्व शिक्षा अभियान के लक्ष्य, उद्देश्य एवं महत्व 
  2. प्राथमिक शिक्षा की समस्यायें | Problems of Primary Education in Hindi
  3. प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण की समस्या के स्वरूप व कारण
  4. प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण की समस्या के समाधान
  5. अपव्यय एवं अवरोधन अर्थ क्या है ? 
  6. शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2010 क्या है?
  7. प्राथमिक शिक्षा का अर्थ, उद्देश्य , महत्व एवं आवश्यकता
  8. आर्थिक विकास का अर्थ, परिभाषाएँ, प्रकृति और विशेषताएँ
  9. शिक्षा के व्यवसायीकरण से आप क्या समझते हैं। शिक्षा के व्यवसायीकरण की आवश्यकता एवं महत्व
  10. बुनियादी शिक्षा के पाठ्यक्रम, विशेषतायें तथा शिक्षक प्रशिक्षण व शिक्षण विधि
  11. कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग के गुण एवं दोष 
  12. सार्जेन्ट योजना 1944 (Sargent Commission in Hindi)
  13. भारतीय शिक्षा आयोग द्वारा प्राथमिक शिक्षा के सम्बन्ध में दिये गये सुझावों का वर्णन कीजिये।
  14. भारतीय शिक्षा आयोग द्वारा माध्यमिक शिक्षा के सम्बन्ध में दिये गये सुझावों का वर्णन कीजिये।
  15. मुस्लिम काल में स्त्री शिक्षा की स्थिति
  16. मुस्लिम शिक्षा के प्रमुख गुण और दोष
  17. मुस्लिम काल की शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य
  18. मुस्लिम काल की शिक्षा की प्रमुख विशेषतायें
  19. प्राचीन शिक्षा प्रणाली के गुण और दोष
  20. बौद्ध शिक्षा प्रणाली के गुण और दोष
  21. वैदिक व बौद्ध शिक्षा में समानताएँ एवं असमानताएँ
  22. बौद्ध कालीन शिक्षा की विशेषताएँ 

Disclaimer

Disclaimer: Sarkariguider.in does not own this book, PDF Materials Images, neither created nor scanned. We just provide the Images and PDF links already available on the internet. If any way it violates the law or has any issues then kindly mail us: guidersarkari@gmail.com

About the author

Sarkari Guider Team

Leave a Comment