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निर्देशन का क्षेत्र और आवश्यकता | Scope and Needs of Guidance in Hindi

निर्देशन का क्षेत्र और आवश्यकता
निर्देशन का क्षेत्र और आवश्यकता

निर्देशन का क्षेत्र और आवश्यकता

निर्देशन का क्षेत्र (Scope of Guidance)- 21वीं सदी के आते-आते निर्देशन के क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन हो गया है। अब निर्देशन व्यावसायिक दुनिया से निकलकर शैक्षिक दुनिया को नया आयाम दे रहा है।

अतः इस आधार पर निर्देशन के क्षेत्र की कल्पना करना कठिन नहीं है वस्तुतः जहाँ- जहाँ समस्यायें हैं वहाँ निर्देशन प्रदान करने की सम्भावना निहित है। अतः निर्देशन का क्षेत्र बहुत व्यापक है।

लेकिन भारत में निर्देशन सेवाओं का कार्य क्षेत्र अभी तक सीमित है। वहाँ शैक्षिक, व्यावसायिक व वैयक्तिक क्षेत्र में भूमिका अहम् है इन्हें कुछ बिन्दुओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-

शैक्षिक निर्देशन (Educational Guidance) के क्षेत्र में-

(1) वांछित पाठ्यक्रम पर आधारित विषयों का चयन करने में सहायक,
(2) पाठ्यसहगामी क्रियाओं के चयन हेतु,
(3) नवीन पाठ्यक्रम के सम्बन्ध में निर्णय लेने में,
(4) अधिगम प्रक्रिया में निरन्तर, अपेक्षित उपलब्धि स्तर बाये रखने की दृष्टि से,
(5) राष्ट्रीय एकता पर आधारित कार्यक्रमों में भाग लेने हेतु प्रेरित करने की दृष्टि से.
(6) अपव्यय व अवरोधन की समस्या समाधान करने के लिये,
(7) प्रौढ़ शिक्षा पर आधारित कार्यक्रमों की दिशा में प्रेरित करने हेतु, आदि।

व्यावसायिक निर्देशन (Vocational Guidance) के क्षेत्र में-

(1) योग्यतानुसार व्यवसाय चयन करने में,
(2) व्यावसायिक क्षेत्र में होने वाले परिवर्तनों में परिचित कराने के लिये,
(3) व्यावसायिक अवसरों में विविधता की दृष्टि में,
(4) श्रम एवं उद्योग की परिस्थितियों में वांछित परिवर्तन करने के लिये,
(5) विशिष्टीकरण की दिशा में प्रेरित करने हेतु,
(6) नव-विकसित तकनीकी से परिचित कराने के लिये।

व्यक्तिगत निर्देशन (Personal Guidance) के क्षेत्र में-

(1) संकटकालीन स्थिति के निरन्तर मानसिक एवं संवेगात्मक सामंजस्य बनाए रखने में,
(2) व्यक्तिगत समस्या का समाधान करने हेतु, वांछित निर्णय शक्ति का विकास करने में,
(3) व्यक्ति समायोजन में वृद्धि करने हेतु,
(4) पारिवारिक संघर्ष से मुक्त होने से,
(5) पारिवारिक जीवन में समायोजन की दृष्टि से,
(6) अवकाश में समय का सदृपयोग एवं मूल्यांकन करने के लिये।

निर्देशन की आवश्यकता (Need of Guidance For Education View)-

वैज्ञानिक तथा तकनीकी विकास के कारण शैक्षिक दुनिया में महान परिवर्तन हुए हैं। अब शैक्षिक पाठ्यक्रम का विकास राष्ट्रीय विकास को ध्यान में रखकर किया जा रहा है। शैक्षिक दृष्टि से निर्देशन की आवश्यकता निम्नलिखित तथ्यों के आधार पर स्पष्ट की जा सकती है-

1. परिणाम के आधार पर पाठ्यक्रम का चयन- नए युग में अनेक नए संकायों के विषयों का प्रसार हुआ है। सभी व्यक्तियों की रुचियाँ भिन्न-भिन्न होती हैं तथा योग्यता व क्षमता भी अलग-अलग होती है। एक व्यक्ति एक विषय में पारंगत हो सकता है, तो दूसरे में उसकी पारंगतता कम होती है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति अपनी योग्यता, सभ्यता व रुचि के असार विषय का चयन करे जिससे वह अधिक से अधिक विकास कर सके। इसके लिए पाठ्यक्रम चयन हेतु निर्देशन सेवा की परम आवश्यक है। इसके लिए हम मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का प्रयोग भी कर सकते हैं और उनके परिणाम के आधार पर छात्रों को पाठ्यक्रम चयन करने में सहायता प्रदान की जा सकती है।

2. व्यक्तिगत विभिन्नता के प्रभाव के कारण- मनोविज्ञान के अनुसार हर व्यक्ति एक-दूसरे से भिन्न होता है। जनसंख्या वृद्धि के कारण विभिन्नताओं का प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। इससे शिक्षा के क्षेत्र में विभिन्न समस्याओं ने जन्म लिया है। जैसे छात्र असन्तोष, प्रशिक्षित अध्यापकों का अभाव, अनुशासनहीनता आदि इसलिए शिक्षा के क्षेत्र में व्यक्तिगत विभिन्नताओं का विशेष महत्व है। सभी व्यक्ति सभी प्रकार की शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकते हैं उनकी क्षमताएँ, योग्यताएँ व रुचियाँ अलग-अलग होती है इसलिए विषयों का चयन, उनकी वयक्तिगत विभिन्नताओं के अनुरूप ही करना चाहिए, इसके लिए निर्देशन की आवश्यकता महसूस होती है।

3. अपव्यय अवरोधक की समस्या के निराकरण के लिए- हमारे देश में अपव्यय अवरोधन की समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है। इस समाधान हेतु भारत सरकार भी प्रयत्नशील है जिसके लिए अनेक आयोगों गठन किया गया है सफलता हाथ नहीं लग सकी है। इस समस्या में छात्र बिना पूरी पढ़ाई किए बीच में ही पढ़ना बन्द कर देते हैं या कक्षा में अनेक बार अनुत्तीर्ण होते हैं। शिक्षा के प्राथमिक स्तर पर यह समस्या विकराल रूप लिए हुए है। इसके भी अनेक कारण हैं अयोग्य अध्यापक, असन्तोष विद्यालय व्यवस्था, व्यक्तिगत विभिन्नता। अनुपयुक्त और कठिन पाठ्यक्रम। अतः छात्र अपव्यय व अवरोधन की समस्याओं से निपट सके इसके लिए उन्हें उचित निर्देशन सेवाओं की आवश्यकता है।

4. अनुशासनहीनता की समस्या के कारण- शिक्षा के क्षेत्र में अनुशासनहीनता एक ज्वलन्त समस्या के रूप में उभरकर आयी है। शिक्षा के क्षेत्र में आए दिन हड़ताल, तोड़-फोड़ लूटमार आदि की घटनाएँ देखने को मिलती हैं। इसके पीछे प्रमुख कारण है छात्रों को उचित व्यवसाय का न मिलना आज की शिक्षा छात्र को समाज में समायोजित नहीं कर पाती है। परन्तु अपेक्षित छात्रों की समस्याओं के समाधान हेतु कोई प्रभावी कदम संस्थाओं द्वारा नहीं उठाए जाते हैं। ऐसी स्थिति में निर्देशन सेवा द्वारा अनुशासनहीनता की समस्या का समाधान निकाला जा सकता है।

5. शैक्षिक संतुलन के स्तर को बनाए रखने की समस्या- आज शिक्षा के क्षेत्र में हम यह देखते हैं कि उसका स्तर दिन पर दिन गिरता जा रहा है। इसके अनेक कारण हैं शिक्षा देने वाले अध्यापक व शिक्षा लेने वाले छात्र दोनों के अन्दर दोश हैं। आज का सामाजिक वातावरण अध्यापकों की योग्यता, अध्यापकों की उत्तरदायित्वहीनता आदि इसके प्रमुख कारण हैं। इन कारणों को निर्देशन सेवाओं द्वारा ही दूर किया जा सकता है। शैक्षिक उपलब्धियों के स्तर में जो गिरावट आ रही है उसकी असफलता के कारणों का पता करके उन्हें निर्देशन सेवाओं द्वारा दूर किया जा सकता है तथा छात्रों को अधिगम की नवीन तकनीकों से परिचित कराकर शिक्षा के स्तर को उच्च बनाया जा सकता है।

इस प्रकार उपरोक्त विवरण के आधार पर निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पाठ्यक्रम के चयन से लेकर शिक्षा के उच्च स्तर को बनाए रखने में निर्देशन सेवाओं का महत्वपूर्ण योगदान है। हमारे यहाँ आज भी निर्देशन सेवाओं को अनदेखा किया जा रहा है।

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