सृजनात्मकता से आप क्या समझते हैं? – Creative in Hindi
सृजनात्मकता, मानवीय विकास श्रृंखला में नवीन एवं सतत् अन्वेषण है। यह निर्माण है। नवीनता इसकी विशेषता है। सृजनात्मकता विधा है, विकास है। सृजनात्मकता उत्पादकता की प्रतीक है, बौद्धिक एवं चिन्तन क्षमताओं का प्रतिफल है। सृजनशीलता बालक के भविष्य की संरचना करती है। ऐसा बालक जो वर्तमान परिस्थितियों में भविष्य का चिन्तन करता है तथा अपनी कार्यशैली में स्वयं की क्षमताओं का समुचित प्रयोग करता है, सृजनात्मक व्यवहार का प्रदर्शन करता है। समस्या के समाधान करने में -सृजनात्मक चिन्तन तथा बौद्धिक कौशल का विशेष योगदान है। सृजनात्मकता मौलिकता से सम्बन्धित है। वह व्यक्ति जो विपरीत तथा अप्रिय परिस्थितियों में निराश नहीं होता, अपितु उत्साहित से लक्ष्य प्राप्ति की ओर दृढतापूर्वक अग्रसर होता है, उसमें मौलिकता के सभी लक्षण विद्यमान होते हैं। सृजनात्मकता के धमी बालक एवं बालिकाएँ अपने चिन्तन तथा बौद्धिक शक्तियों के द्वारा दूसरे लोगों को शीघ्र प्रभावित कर लेते हैं। विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने सृजनात्मकता के विचार को स्पष्ट करने के लिए इस प्रकार का परिभाषित किया है-
मेडनिक के अनुसार, “सृजनात्मक चिन्तन में साहचर्य के तत्त्वों का मिश्रण रहता है। जो विशिष्ट आवश्यकताओं को पूर्ण करते हैं अथवा किसी अन्य रूप में लाभप्रद होते हैं।”
स्टेन, “जब किसी क्रिया द्वारा नवीन सृजन होता है, जिसे किसी समूह द्वारा मान्यता प्राप्त होती है तो ऐसी क्रियाओं के नवीन सृजन को सृजनात्मकता कहते हैं।”
डेन्डकर ने सृजनात्मकता को एक गुण की संज्ञा दी है तथा कहा है कि इसके द्वारा व्यक्ति की किसी नवीन इच्छित वस्तु का सृजन किया जाता है।
आइजनेक सृजनात्मकता को नवीन सम्बन्धों का ज्ञान मानता है तथा इसमें परम्परागत प्रतिमानों के स्थान पर असाधारण विचार विकसित होते हैं।
उपरोक्त परिभाषाओं को दृष्टिगत रखते हुए हम संक्षेप में यह कह सकते हैं कि-
1. सृजनात्मकता नवीनता एवं मौलिकता का मिश्रण है।
2. सृजनात्मक कार्यों से समाज लाभान्वित होता है।
3. सृजनात्मक कार्य व्यक्ति की प्रतिभा के विकासाधार हैं।
4. सृजनात्मक लक्ष्य निर्धारण तथा उद्देश्य प्राप्ति की दिशा में क्षमताओं का प्रतीक है।
5.सृजनात्मकता, चिन्तन की एक विशेषता है, बुद्धि की नहीं।
6. सृजनात्मकता व्यक्ति का असाधारण गुण है जिसके द्वारा वह नई कृतियों का निर्माण करता है।
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गिलफोर्ड ने प्रकाश डालते हुए सृजनात्मकता में निम्न क्षमताओं का विद्यमान होना आवश्यक बताया है-
1. ऐसा छात्र अथवा व्यक्ति जो वर्तमान से असन्तुष्ट होकर भविष्य के विषय में विस्तार है तथा अपने चिन्तन एवं कल्पनाओं को व्यवहारिक स्वरूप प्रदान करता है, उसमें सृजनात्मकता होती है।
2. सृजनकर्त्ता, समस्या की पुनर्व्यवस्था करता है।
3. ऐसा व्यक्ति अथवा छात्र जो अपने वातावरण के प्रति समायोजन कर लेता है, सृजनात्मक है।
4. ऐसा व्यक्ति अथवा छात्र जो तर्क, चिन्तन तथा प्रमाण द्वारा दूसरों के विचारों को प्रभावित करके, उनमें परिवर्तन लाता है, उसमें सृजनात्मकता पाई जाती है।
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चिन्तन सृजन का मुख्य आधार है। विचारों में विभिन्नताएं होती हैं। प्रत्येक चिन्तन में कोई न कोई लक्ष्य होता है। इन्हीं लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु व्यक्ति प्रयास करता है। प्रयास के उपरान्त प्राप्त लक्ष्य पूर्ति उसे सन्तुष्टि प्रदान करती है तो व्यक्ति अपने प्रयासों को निरन्तर जारी रखेगा जिससे सृजनात्मकता में वृद्धि होती है। सृजनात्मक चिन्तन के अग्र सोपान हैं-
1. तैयारी- किसी कार्य को सम्पन्न करने हेतु किसी न किसी रूप में तैयारी आवश्यक होती है। अध्यापक शिक्षण करने से पूर्व विषय वस्तु सम्बन्धी सूचनाएँ एकत्रित करते हैं यही तैयारी है।
2. गम्भीर चिन्तन- जब कोई साहित्यकार, कवि, कलाकार अथवा वैज्ञानिक किसी नवीन सृजन का लक्ष्य निर्धारित करता है, तो वह गम्भीर चिन्तन करता है। अपनी वैचारिक प्रतिभा को संगठित करता है। वैचारिक तथ्यों को उचित व्यवस्था देता है तथा लक्ष्य की दिशा के विषय में गम्भीर सोच में डूब जाता है। वह गम्भीर चिन्तन है जो व्यक्ति को नवीन सृजन की प्रेरणा से अभिभूत कर देता है।
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3. अन्तर्दृष्टि का यकायक विस्फोट- गम्भीर चिन्तन करते-करते जब किसी व्यक्ति को अचानक समस्या समाधान का मार्ग सूझता है, उसे यकायक अन्तर्दृष्टि विस्फोट की संज्ञा दी जा सकती है।
4. अभिव्यक्ति- मस्तिष्क को चिन्तन के रूप में छू लेने वाले विचारों को लेखन का रूप देना अथवा मौखिक कथन अभिव्यक्ति कहलाता है। विचार प्रवाह जैसे जैसे विकसित होता है, आवश्यकतानुसार उन्हें संशोधित करके, लेखक अथवा चिन्तक उसे शब्दों की मालाओं में गूंथकर, नवीन सृजन प्रदान करता है। ऐसा करने में उसे स्वयं सन्तुष्टि की अनुभूति होती है तथा नवीन सृजन अन्य लोगों को लाभान्वित करता हैं। यह प्रक्रिया वैचारिक अभिव्यक्ति कहलाती है।
शिक्षक को सृजनशील बनाने के उपाय
वर्तमान शैक्षिक तथा शिक्षण उद्देश्यों में सृजनशीलता का विकास शिक्षक का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है। नित्य नवीन सृजन, राष्ट्रीय विकास तथा उत्पादन का मार्ग प्रशस्त करता है। सृजनात्मकता राष्ट्रीय विकास की आधारशिला है। सृजनात्मक प्रतिभा सम्पन्न नागरिकों का निर्माण ही राष्ट्रीय निर्माण है। इसी दृष्टि से अध्यापक को राष्ट्रीय निर्माता कहा जाता है। शिक्षा में सृजनात्मकता आवश्यक तत्त्व है। इसलिए अध्यापक का यह उत्तरदायित्व है कि वह शिक्षण द्वारा बालकों में सृजनात्मकता विकसित करे। अध्यापक अपने छात्रों को निम्न प्रकार सृजनात्मक संरचना में सहायता प्रदान कर सकता है-
1. शिक्षण अधिगम प्रक्रिया के संचालन में समस्या के प्रत्येक पक्ष को ध्यान में रखकर गम्भीर चिन्तन किया जाना चाहिए।
2. अध्यापक को समस्या से जुड़े प्रश्नों की जानकारी आवश्यक है, जिससे छात्रों को अवगत कराया जा सके।
3. समस्या से सम्बन्धित सहायक तत्त्वों का संकलन छात्रों द्वारा कराया जाना चाहिए। 4. मौलिक तथ्यों पर आधारित नवीन ज्ञान को प्रस्तुत करने वाले छात्रों को शिक्षक द्वारा भली-भाँति किया जाना चाहिए।
5. अध्यापक को यह प्रयास करना चाहिए कि छात्रों में मूल्यांकन की क्षमता विकसित कर सके।
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6. छात्रों के समक्ष विभिन्न प्रकार की समस्याओं का प्रस्तुतिकरण करके, उन्हें इनके समाधान का पूर्ण अवसर प्रदान करना चाहिए।
7. छात्र के किसी एक क्षेत्र में असफल होने पर उसे दूसरे क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
8. सृजनात्मकता में अधिक वृद्धि की आवश्यकता नहीं है। अतः अध्यापक को प्रत्येक छात्र में मौलिकता विकसित करके सृजनात्मकता हेतु प्रेरित करना चाहिए।
छात्रों में सृजनात्मकता विकसित करने के लिए निम्न तथ्यों का ध्यान रखना चाहिए। सृजनात्मकता के विकास हेतु विभिन्न मनोवैज्ञानिकों द्वारा सुझावों का प्रस्तुतीकरण किया गया है—
(अ) सूचनाओं का एकत्र करना- छात्रों के समक्ष विषय-वस्तु प्रस्तुत करके, तत्सम्बन्धों सूचनाएँ एकत्रित करने का निर्देशन दिया जाए। उदाहरणतया ऐतिहासिक तथ्यों को प्रमाणित करने हेतु विभिन्न प्रमाणों का एकत्रीकरण।
(ब) समस्या समाधान हेतु प्रोत्साहन- विद्यालय में अनेक समस्याएं उत्पन्न होती रहती हैं, जैसे—छात्रों में अनुशासन की समस्या, सफाई आदि की व्यवस्था शिक्षक छात्रों को इस बात के लिये प्रोत्साहित करता है कि विद्यालय समस्याओं के समाधान हेतु उनके क्या सुझाव हैं?
(स) समस्या सम्बन्धी परिणामों का विश्लेषण-अध्यापक छात्रों के समक्ष विभिन्न प्रकार की सामाजिक, राजनैतिक समस्याओं को प्रस्तुत करे तथा उनका विश्लेषण करने के उपरान्त उनके विचार जानने चाहिए। जैसे-जातीयता एवं धर्मान्धता राष्ट्रीय एकीकरण पर क्या प्रभाव डालती हैं? इस समस्या को सुलझाने हेतु छात्रों के विचार व्यक्त कराए जाने चाहिए। ऐसा करने से उनमें सृजनात्मकता विकसित होगी।
(द) आँकड़ों का वर्गीकरण एवं अन्वेषण- छात्रों के समक्ष विभिन्न क्षेत्रों से आंकड़े एकत्रित कराएं, जैसे- जनसंख्यात्मक एवं शिक्षा सम्बन्धी ग्रामीण अंचलों तथा नगरीय क्षेत्रों से विभिन्न रूपों में आँकड़े एकत्रित करना तथा उनका विश्लेषण करके किसी निष्कर्ष पर पहुंचकर, सुझाव प्रस्तुत करना। इससे सृजनशीलता में वृद्धि होगी।
वास्तव में जो बालक सृजनशील होते हैं, उनमें मौलिकता का गुण विद्यमान रहता है। ऐसे बालकों में प्रतिमा होती है, लगन होती है तथा अपने विकास पथ को खोज लेने की क्षमता रखते हैं। ऐसे छात्र अपने भावी जीवन में वैज्ञानिक, साहित्यकार, कुशल कारीगर, प्राध्यापक, अभियन्ता अथवा डॉक्टर बनते हैं।
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