नैतिक विकास से संबंधित महत्वपूर्ण सिद्धान्त
नैतिक विकास से संबंधित महत्वपूर्ण सिद्धान्त- जीन पियाजे का सिद्धांत | समाजीकरण का सिद्धांत | सिगमण्ड फ्रायड का मनोविश्लेषण सिद्धांत | गैसेल का नैतिक विकास का सिद्धांत | हार्टशान एण्ड में का सिद्धांत | स्किनर का सिद्धान्त
जन्म के समय से ही बालक न तो नैतिक होता है और न ही अनैतिक उसका व्यवहार और आचरण उसकी स्वाभाविक प्रवृत्तियों एवं संवेदनाओं के द्वारा प्रभावित होते हैं। समाज के द्वारा बनाये गये नैतिक और अनैतिक नियमों के बारे में उसे कोई ज्ञान नहीं होता है। सुख-दुख, प्रशंसा एवं निंदा तथा दंड और पुरस्कार के आधार पर वह किसी कार्य के उचित और अनुचित होने के बारे में निर्णय लेता है।
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विभिन्न मनोवैज्ञानिकों के विचारों में इस बात को लेकर आपस में मतभेद है कि बालक में उचित और अनुचित, नैतिक प्रत्यय तथा सही निर्णय लेने की क्षमता का विकास किस प्रकार से होता है। इस सम्बन्ध में अलग-अलग मनोवैज्ञानिकों ने कुछ सिद्धान्त प्रतिपादित किये हैं, जिनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार से है-
1. जीन पियाजे का सिद्धांत
पियाजे ने बालक के नैतिक विकास से सम्बन्धित चार अवस्थायें मानी हैं। पियाजे के अनुसार प्रथम अवस्था में नैतिक विकास अहम् केन्द्रित रहता है। दूसरी अवस्था में बालक की नैतिकता में सत्ता में संपूर्ण समर्पण की भावना रहती है। विकास की तीसरी अवस्था परस्परता तथा व्युत्क्रम की अवस्था होती है। इस अवस्था में बालक द्वारा जो नैतिक नियम स्वीकार करने योग्य होते हैं वे स्वीकार कर लिये जाते हैं तथा जो अस्वीकार करने योग्य होते हैं, वे उसके द्वारा अस्वीकार कर दिये जाते हैं। चौथी अवस्था साम्य की अवस्था होती है। इस अवस्था में बालक में परहित-कामना व सामाजिक प्रेम की भावना का उदय होता है।
पियाजे ने नैतिक विकास की व्याख्या के लिये तथा नैतिकता के सम्यक विकास के लिये संज्ञानात्मक योग्यताओं के विकास को महत्त्वपूर्ण बताया। उन्होंने परतन्त्र नैतिकता (Heteronomous Morality) तथा स्वायत्त नैतिकता (autonomous morality) को महत्वपूर्ण माना परतन्त्र नैतिकता अवस्था में बच्चों में तर्क क्षमता का विकास कम हुआ रहता है। उनके मन में धारणा बनी रहती है कि नैतिक नियम परिवर्तनशील नहीं होता है और अपने व्यवहार के परिणाम से व्यवहार के वांछित होने का अनुमान लगाते हैं। इससे उनका व्यवहार परिमार्जिता होता है। स्वायत्त नैतिकता अवस्था लगभग सात वर्ष पश्चात् की होती है। इस अवस्था में संज्ञानात्मक विकास काफी सीमा तक हो चुका होता है तथा बच्चे महसूस करने लगते हैं कि नैतिकता के नियमों में अन्य लोगों की सहायता से कुछ परिवर्तन सम्भव है। वे दूसरों के इरादों व भावनाओं की अविश्वसनीयता का भी अपेक्षाकृत अधिक सटीक अनुमान लगा लेते है।
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जीन पियाजे ने नैतिक निर्णय पर शोध कार्य किया और पाया कि जब बालक नैतिकता के बारें में सोचते हैं तो वे दो अलग-अलग अवस्थाओं से गुजरते हैं। चार से सात साल के बालक बाह्य सत्ता प्राप्त नैतिकता प्रदर्शित करते हैं। बालक नियमों एवं न्याय को न बदलने वाले गुण धर्म मानते हैं। उनके लिए नियम बालक नियमों एवं न्याय ऐसी वस्तुएँ हैं जो लोगों के बस से बाहर होती है। सात से दस साल की अवस्था में बालक नैतिक चिन्तन की प्रथम से द्वितीय अवस्था के मध्य एक मिली जुली स्थिति में होते हैं। दस अथवा उससे बड़े बालक स्वतंत्रता पर आधारित नैतिकता प्रदर्शित करते हैं। वह यह समझ जाते है कि कानून एवं नियम लोगों के द्वारा बनाये हुए हैं तथा कार्य का मूल्यांकन करने में वे कार्य को करने वाले व्यक्ति के इरादों तथा कार्य के परिणामों पर भी विचार करते हैं। छोटे बालक बाह्य सत्ता वाली नैतिकता के स्तर पर होते हैं तथा वे किसी व्यवहार के बारे में निर्णय सही अथवा गलत का उस व्यवहार से होने वाले परिणामों को देखकर लेते हैं। जैसे-जैसे बालक स्वतंत्र अवस्था पर आने लगता है किसी कार्य को करने का उद्देश्य उसके नैतिक चिन्तन का आवश्यक बिन्दु बनने लगता है। पियाजे ने छोटे बालकों को सुझाया कि वह कंचे के खेल के नवीन नियमों को बनायें तो उन्होंने मना कर दिया, इसके विपरीत बड़े बालकों ने स्वीकार किया तथा पहचाना कि नियम सुविधा के लिये बनाये गये हैं जिन्हें परिवर्तित किया जा सकता है।
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पियाजे के अनुसार बालक जैसे-जैसे बड़े होते हैं उनकी सोच सामाजिक मुद्दों के बारें में गहरी होती जाती है। साथियों के साथ सामाजिक समझ आपसी लेन-देने से आती है। पियाजे ने अपने अध्ययन में पाया कि बालक में नैतिक विकास, संज्ञानात्मक विकास के साथ-साथ होता है। जैसे-जैसे बालक का संज्ञानात्मक विकास एक स्तर से दूसरे स्तर की ओर बढ़ता है वैसे-वैसे उसमें नैतिक तर्कना का विकास होता है। इस प्रकार पियाजे ने अपनी पुस्तक ‘द मारल जजमेंट आफ द चाइल्ड’ में नैतिक विकास को अवस्थाओं के रूप में प्रस्तुत किया तथा प्रत्येक स्तर पर नैतिक विकास हेतु उस अवस्था के अनुरूप ज्ञानात्मक कौशलों को आवश्यक बताया। पियाजे ने तर्क प्रस्तुत किया कि बच्चों द्वारा नियमों का प्रयोग करना उनके नैतिक विकास का आधार है। पियाजे ने नैतिक विकास की आत्मकेन्द्रियता, शिशु आयु से विद्यालय प्रवेश आयु तक), परतन्त्रता (प्रारम्भिक शिशु विद्यालय आयु), संक्रमण (उत्तर प्राथमिक शिक्षा अवस्था) तथा स्वायत्तता (किशोरावस्था) अवस्थाओं का प्रतिपादन किया।) अतः विकास परतन्त्रता, संक्रमण पर नियंत्रण से स्वायत्तता की ओर होता है। ज्ञानात्मक विकास और नैतिक विकास में घनिष्ठ सम्बन्ध होता है तथा विभिन्न अवस्था में दोनों का विकास साथ-साथ होता है।
2. समाजीकरण का सिद्धांत
वाल्टर्स, स्किनर तथा सीयर्स के सिद्धान्त के अनुसार बालक का नैतिक विकास समाजीकरण का परिणाम होता है। इन मनोवैज्ञानिकों द्वारा प्रस्तुत विचारधाराएँ बालक द्वारा प्रदर्शित व्यवहार को ही उसके नैतिक विकास का प्रमाण मानती हैं। लेकिन किसी एक परिस्थिति में बालक द्वारा प्रदर्शित व्यवहार को नैतिक या अनैतिक व्यवहार की संज्ञा नहीं दी जा सकती है।
3. सिगमण्ड फ्रायड का मनोविश्लेषण सिद्धांत
फ्रायड के महत्त्वपूर्ण सिद्धांत को मनोविश्लेषणवादी सिद्धान्त के नाम से जाना जाता है। फ्रायड का मानना है कि बालक शुरू में अनुकरण के द्वारा नैतिक व्यवहार को सीखता है। अनुकरण के द्वारा ही बालक अपने माता-पिता, भाई-बहन, चाचा दादा एवं परिवार के अन्य सदस्यों के नैतिक व्यवहार को अपनाता है। बचपनावस्था में बालक अपने माता पिता द्वारा बताये गये सही कार्य को सही व गलत को गलत ही समझता है और बालक माता-पिता के विचारों, इच्छाओं, रुचियों और धारणाओं के अनुरूप ही व्यवहार करने में प्रसन्नता अनुभव करता है। वह * माता-पिता की अवहेलना करने या बात न मानने पर उनको दुख पहुँचाने पर मानसिक पीड़ा का अनुभव करता है। इस अपराध भावना या कष्टदायक अनुभूति से बचने के लिए बालक परिवार से सम्बन्धित नैतिक नियमों व व्यवहार को अवचेतन रूप से ग्रहण कर लेता है। इस प्रकार से बालक के द्वारा अपने माता-पिता के विचारों व दृष्टिकोणों का अन्तःकरण या आत्मसात् कर लिया जाता है। बालक द्वारा इस आधार पर विकसित की गई नैतिकता या नैतिक व्यवहार ही आगे चलकर विवेक का रूप धारण कर लेता है, जिसके कारण यह बालक विवेक के द्वारा निर्देशित होकर सामाजिक समायोजन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।
4. गैसेल का नैतिक विकास का सिद्धांत
गैसेल के अनुसार बालक के नैतिक विकास की तीन अवस्थायें होती हैं। बालक के नैतिक विकास की पहली अवस्था जन्म से लेकर 5 वर्ष तक के मध्य की अवस्था होती है, जिसके अन्तर्गत बालक मुख्य रूप से आत्म-केन्द्रित होता है। दूसरी अवस्था 6 वर्ष से लेकर 10 वर्ष तक की होती है। इस अवस्था बालक स्वयं अच्छे-बुरे का निर्णय न लेकर अपने माता-पिता के आधार पर ही निर्णय लेता है। तीसरी अवस्था 11 से 16 वर्ष के बीच की अवस्था है। इस अवस्था में आकर बालक माता-पिता पर आश्रित न रहकर समाज में अपनी स्वतंत्र सत्ता बना लेता है तथा वह दूसरों की भलाई का भी अत्यधिक ध्यान रखता है।
5. हार्टशान एण्ड में का सिद्धांत
इन मनोवैज्ञानिकों के अनुसार बालकों के नैतिक व्यवहार में परिवर्तन होता रहता है। बालक एक परिस्थिति में ईमानदार व दूसरी परिस्थिति में बेईमान हो सकता है, जैसे- कक्षा में नकल करना बालक का एक विशिष्ट प्रकार का व्यवहार हो सकता है। उदाहरण के तौर पर- बालक अंग्रेजी व विज्ञान के जैसे विषयों में नकल कर सकता है, जबकि अन्य विषयों में वह ऐसा नहीं करता। अतः बालक को इस आधार पर नैतिक और अनैतिक की संज्ञा नहीं दी जा सकती है।
6. स्किनर का सिद्धान्त
स्किनर के अनुसार बालक के नैतिक विकास में पुरस्कार की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। बालक को उचित-अनुचित, सही-गलत तथा अच्छे-बुरे का ज्ञान कराने के लिये यह जरूरी है कि उसको दण्ड व पुरस्कार के द्वारा समझाया जाये। स्किनर के अनुसार बालक दण्ड एवं पुरस्कार के आधार पर सही-गलत, उचित-अनुचित और अच्छे-बुरे तथा नैतिक-अनैतिक व्यवहारों में अंतर करना सीख लेता है।
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