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अध्यापक की परामर्शदाता के रूप में भूमिका | Role of the Teacher as a Counselor in Hindi

अध्यापक की परामर्शदाता के रूप में भूमिका
अध्यापक की परामर्शदाता के रूप में भूमिका

अध्यापक की परामर्शदाता के रूप में भूमिका | Role of the Teacher as a Counselor in Hindi

अध्यापक की परामर्शदाता के रूप में भूमिका- शिक्षक विद्यालयी व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग है। उसका मुख्य कार्य शिक्षण है। शिक्षण के दौरान वह अनुशासन बनाये रखता है। प्रश्न यह उठता है कि क्या शिक्षक परामर्श के उत्तरदायी है। जो लोग यह कहते हैं कि परामर्श का कार्य शिक्षक को करना चाहिये उनका तर्क है कि शिक्षक का विद्यार्थी से निकट का सम्बन्ध होता है। वह बालकों को अच्छी तरह जानता है तथा उनके परिवेश एवं क्षमताओं और उपलब्धियों से अपेक्षाकृत अधिक परिचित होता है। किन्तु जो लोग परामर्श-कार्य के लिये विशेषज्ञ की नियुक्ति पर बल देते हैं उनका तर्क है कि परामर्श की प्रक्रिया इतनी जटिल एवं व्यापक है कि अध्यापक के लिये अध्यापन के साथ परामर्श का कार्य कर पाना नितान्त कठिन है। साथ ही परामर्श का कार्य बिना प्रशिक्षण के दक्षतापूर्वक करना सम्भव नहीं है। इसके अतिरिक्त अध्यापक के पास परामर्श के कार्य के लिये पर्याप्त समय का भी अभाव रहता है।

दूसरे पक्ष के तर्क में पर्याप्त बल है और परामर्शदाता का कार्य विशेषज्ञता की माँग करता है, किन्तु परामर्शदाता एवं शिक्षक के कार्यों में कोई अन्तर्विरोध नहीं है। दोनों एक-दूसरे के सहयोगी हैं। परामर्शदाता बिना शिक्षक के सहयोग के अपना कार्य दक्षतापूर्वक नहीं कर सकता और शिक्षक परामर्शदाता के निष्कर्ष एवं सहायता का लाभ उठाकर अपने कार्य में और प्रगति कर सकता है।

एफ.जे. केलर ने परामर्शदाता को अध्यापक के समकक्ष माना है। केलर के अनुसार परामर्शदाता और अध्यापक में पर्याप्त सीमा तक समानता होती है। इस समानता को स्पष्ट करते हुए वह लिखता है, “अध्यापक वह सिखाता है जो वह (Teacher) स्वयं है। अध्यापक को कार्य के महत्त्व में विश्वास करना चाहिये। ऐसा विश्वास उसके व्यक्तित्व का अंग बन जाता है, वह अपने विश्वास के अनुरूप बन जाता है और दूसरों को वैसा ही बनाने में समर्थ हो सकता है जैसा वह स्वयं है।”

शिक्षक का व्यक्तित्व प्रभावशाली होना चाहिये। उसे यह अनुभव करना चाहिये कि उसका कार्य जितना  महत्त्वपूर्ण है, तद्नुसार ही उसे अपने उत्तरदायित्व को पूर्ण तत्परता से पूरा करना चाहिये। अध्यापक एक आदर्श होता है जिसका अनुकरण छात्र करते हैं। अतः उसे स्वस्थ्य एवं सन्तुलित विश्वासों को निर्मित करना चाहिये और अपने व्यक्तित्व को उन विश्वासों के साथ एकरूप करने का प्रयत्न करना चाहिये। केलर ने अध्यापक के व्यक्तित्व को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना है तथा उसके विवेकशील, जनतन्त्र एवं सच्चरित्र होने पर बल दिया है, किन्तु केलर इस बात को भी अपने ध्यान में रखता है कि अध्यापकों में भी वैयक्तिक अन्तर होते हैं और उनका यन्त्रवत् मॉडल तैयार नहीं किया जा सकता।

शिक्षक को परामर्शदाता के समानान्तर केलर ने बताया है कि परामर्शदाता के व्यक्तित्व एवं कार्यों पर संस्थाध्यक्ष, प्रधान-अध्यापक तथा परामर्श में सहयोग देने वाले अन्य अनेक व्यक्तियों
की सापेक्षता में विचार किया जाना चाहिये।

चूँकि अध्यापक छात्रों के निकट सम्पर्क में रहता है। अतः वह विविध परिस्थितियों में छात्रों का अध्ययन करने में समर्थ होता है। शिक्षक को छात्रों की आवश्यकताओं का अच्छा ज्ञान होने से वह कुछ परामर्श सम्बन्धी कार्य कर सकता है। शिक्षक परामर्श सम्बन्धी निम्नलिखित कार्य कर सकता है-

1. छात्रों से सम्बन्धित तथ्यों को एकत्रित करने में सहायता करना

2. परामर्श कार्य के लिये आवश्यक परीक्षणों के प्रशासन में परामर्शदाता की सहायता करना

3. कुसमायोजित छात्रों का पता लगाकर परामर्शदाता के पास भेजना।

4. मन्द गति से अधिगम वाले छात्रों को उचित परामर्श देना।

5. अपने विषय को विभिन्न व्यवसायों से जोड़ना अर्थात् अन्तर-विषयी दृष्टिकोण को अपनाना।

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