
जनतन्त्र में विद्यालय संगठन के मार्गदर्शक सिद्धान्त क्या हैं? इसके क्रियान्वयन से विद्यालय के वातावरण में किस प्रकार पर्याप्त सुधार हो सकता है? उल्लेख कीजिए।
किसी शिक्षणालय की व्यवस्था से तात्पर्य मात्र शिक्षण कार्य की देखरेख ही नहीं होता है वरन् यह शब्द अपने आप में एक व्यापक अर्थ लिये हुए है। शिक्षणालय-व्यवस्था के इसी व्यापक अर्थ को स्पष्ट करते हुए आर.पी. शर्मा ने लिखा है कि-“जब हम शिक्षणालय- व्यवस्था शब्द का प्रयोग करते हैं तब हमारा तात्पर्य मात्र दफ्तर के काम, अनुशासन को ठीक रखना, शिक्षकों को आदेश देना, बालकों को नियन्त्रण में रखना, चिट्ठी-पत्री भेजना आदि से नहीं होता बल्कि स्कूल की समस्त कार्यवाही के संचालन की नीति से होता है और उसमें केवल स्कूल की दिनचर्या ही नहीं आती, बल्कि उसके आदर्श, उसका स्तर, उसकी नीति, उसकी कार्यवाही, उसका समाज से सम्बन्ध, उसकी सार्थकता आदि सभी बातें आती हैं।” इनके अतिरिक्त अन्य विद्वानों ने भी शिक्षणालय व्यवस्था के इसी व्यापक अर्थ को स्वीकार किया है अर्थात् शिक्षणालय व्यवस्था में स्कूल की दैनिक दिनचर्या तथा कार्यवाही के साथ-साथ बालकों के शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक विकास सम्बन्धी समस्तनिक नीतियों के निर्माण तथा समाज की विकास सम्बन्धी क्रियाओं से सम्बन्धित समस्त बातें शिक्षणालय-व्यवस्था में आती हैं।
विद्यालय संगठन की आवश्यकता
विद्यालय को समाज की निर्माणशाला माना जाता है। इस रूप में विद्यालय को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण दायित्व का निर्वाह करना पड़ता है, जिसके लिए विद्यालय संगठन की अत्यधिक आवश्यकता होती है। इसको दूसरे रूप में देखने पर हम यह पाते हैं कि समाज के लिए कुशल एवं योग्य व्यक्ति तैयार करना विद्यालय का उद्देश्य होता है तथा विद्यालय में पढ़ने वाला बालक ही आगे चलकर सामाजिक प्राणी बनता है, जो तभी सम्भव है जबकि विद्यालय में उसकी शारीरिक, मानसिक तथा आत्मिक शक्तियों का समुचित विकास हो तथा यह विकास अध्यापकों की योग्यता, भवन की अनुकूलता, उचित पाठ्य-सामग्री, उपयुक्त खेल-कूद, वैज्ञानिक समय तालिका एवं मन्द और तीव्र बुद्धि के बालकों के लिए यथायोग्य शिक्षा व्यवस्था पर निर्भर करता है। दूसरे शब्दों में, इन सब बातों के अभाव में बालक का सर्वांगीण विकास होना सम्भव नहीं है। इसी प्रकार भौतिक अर्थात् भवन, फर्नीचर, शिक्षा के उपकरण आदि एवं मानवीय अर्थात् बालक, समाज व अध्यापक आदि के उत्थान के लिए भी शिक्षणालय संगठन अत्यन्तावश्यक है, क्योंकि एक आदर्श शिक्षाणालय व्यवस्था उसी को कहा जाता है जिसमें भौतिक एवं मानवीय दोनों तत्त्वों का समुचित मेल हो।
जन्तन्त्र में विद्यालय-व्यवस्था और स्वरूप
वर्तमान एवं भूतकालिक विद्यालय व्यवस्थाओं के विषय में विचार करने पर हम दो प्रकार की व्यवस्थाएँ पाते हैं जिनमें एक व्यवस्था अंग्रेजी काल की है जिसे हम स्थिर व परम्परागत व्यवस्था कह सकते हैं तथा दूसरी वर्तमान कालीन जिसे जनतान्त्रिक विद्यालय व्यवस्था कहा जा सकता है। इन दोनों व्यवस्थाओं में मूलभूत अन्तर यह है कि परम्परागत विद्यालय व्यवस्था में विद्यालय की सम्पूर्ण सत्ता का प्रधान मुख्याध्यापक होता था तथा वह जो नियम बना देता था उनका कठोरता से पालन कराया जाता था। इस प्रकार इस विद्यालय व्यवस्था में छात्रों एवं अध्यापकों के सहयोग की कोई आवश्यकता नहीं समझी जाती थी जिसके फलस्वरूप इसमें कठोर, निरंकुशता एवं दमनकारी प्रणाली का प्रयोग होता था। दूसरे शब्दों में, स्थिर एवं परम्परागत विद्यालय व्यवस्था में विद्यालय एक विकास-स्रोत न रहकर एक यन्त्रमान बनकर रह गया था।
इससे यह स्पष्ट है कि यदि भारत में जनतन्त्र को मजबूत बनाना है तब यह परमावश्यक हो जाता है कि विद्यालय व्यवस्था किसी एक व्यक्ति के हाथ में न रहे, क्योंकि यह जनतन्त्र के मूलभूत सिद्धान्तों के विपरीत व्यवस्था होगी और जब बालक विद्यालय से ही जनतान्त्रिक मूल्यों को नहीं जान पायेगा तब कहाँ से जानेगा? अतः यह आवश्यक हो जाता है कि विद्यालय- व्यवस्था में प्रधान अध्यापक के साथ अध्यापकों, छात्रों एवं उनके माता-पिता आदि सभी की हिस्सेदारी होनी चाहिए जो कि इस समय की व्यवस्था में हो रही है अर्थात् वर्तमान विद्यालय प्रबन्ध में प्रधान अध्यापक अध्यापकों को आदेश नहीं देता वरन् उनके सुझाव व सलाह से काम लेता है, साथ ही छात्र एवं अध्यापक दोनों के सहयोग को उचित स्थान प्रदान किया जाता है।
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