B.Ed. / BTC/ D.EL.ED / M.Ed.

सतत् विकास ने आप क्या समझते हैं ? पर्यावरण के संरक्षण में सतत् विकास की भूमिका

सतत् विकास ने आप क्या समझते हैं ? पर्यावरण के संरक्षण में सतत् विकास की भूमिका
सतत् विकास ने आप क्या समझते हैं ? पर्यावरण के संरक्षण में सतत् विकास की भूमिका

सतत् विकास से आप क्या समझते हैं ? पर्यावरण के संरक्षण में सतत् विकास की भूमिका का विस्तार से वर्णन कीजिए।

सतत् विकास ने आप क्या समझते हैं ?

सतत् विकास – मनुष्य से जब से पृथ्वी पर पैर रखा, वह तभी से विकास की ओर अग्रसर रहा है। अर्थात् मानव जाति ने आदिकाल से ही विकास की ओर कदम बढ़ाने प्रारम्भ कर दिए थे। समय के साथ-साथ विकास की इस प्रक्रिया में निरन्तर परिवर्तन आए। मानव सभ्यता के विकास का सम्बन्ध उसके सामाजिक और प्राकृतिक घटकों के विकास से है। आधुनिक युग के विज्ञान और तकनीकी के विकास ने इन दोनों घटकों को प्रभावित किया है। विकास का अर्थ यह नहीं कि केवल कुछ गिने-चुने व्यक्ति, समुदाय, समाज या देशों की प्रगति मात्र से ही हो बल्कि यहाँ सतत् विकास का अर्थ है कि वर्तमान पीढ़ी के सभी सदस्यों के साथ-साथ भावी पीढ़ी के लोगों को भी लाभ मिले।

नार्वे के प्रधानमन्त्री जी.एच. बुंटलैण्ड, ने सतत् विकास की परिभाषा इस प्रकार दी है “सतत् विकास एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें यह सुनिश्चित किया जाता है कि वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ-साथ भावी संतति की आकांक्षाओं और आवश्यकताओं की पूर्ति में कठिनाई न हो।” आज सतत् विकास अति आधुनिक और महत्वपूर्ण मुद्दा है। इस मुद्दे से सम्बन्धित आज विश्व में अनेक कार्यक्रम कार्यान्वित किए गए हैं।

सतत् विकास की परियोजनाओं पर कार्य करते समय हमें इस बात पर भी अवश्य ध्यान देने की आवश्यकता कि-

  • क्या इससे जैव-विविधता को कोई खतरा तो नहीं है ?
  • इससे मिट्टी का कटाव तो नहीं होगा ?
  • क्या यह जनसंख्या वृद्धि को कम करने में सहायक है ?
  • क्या इससे वन क्षेत्रों को बढ़ने में प्रोत्साहन मिलेगा ?
  • क्या यह हानिकारक गैसों के विकास को कम करेगी ?
  • क्या इससे अपशिष्ट उत्पादन की कमी या निष्पादन को समाप्त किया जा सकेगा ?
  • क्या इससे सभी को लाभ पहुँचेगा ?

उपरोक्त तथ्य या घटक सतत् विकास के परिचायक है और इनको अनदेखा नहीं किया जा सकता।

ब्रंट कमीशन के अनुसार-सतत् विकास – “भावी पीढ़ी द्वारा उसकी आवश्यकताओं को पूरा करने की अपनी क्षमता को प्रभावित किए बिना वर्तमान समय की आवश्यकताओं को पूरा करना है।” इसलिए सतत् विकास से अभिप्राय उस विचारधारा से हैं जहाँ मानव के परिणामस्वरूप प्रकृति की पुनः उत्पादक शक्तियाँ एवं क्षमताएं सन्तुलन में बनी रहती है।

अगर हम गहनता से अवलोकन के बाद गम्भीरता से विचार करें तो इस बात का पता चलता है कि आज सतत् विकास की चुनौती प्राकृतिक और मानवीय पर्यावरण दोनों में निहित है। पिछले 60-80 वर्षों की अवधि के अन्तर्गत सतत् विकास के औद्योगिक और वैज्ञानिक विकास में तीव्र गति के साथ वृद्धि हुई है। इस प्रकार बढ़ती जनसंख्या की मांग और आवश्यकताओं को पूरा करने और निरन्तर बिना सोचे-समझे भौतिक विकास, आवश्यकता से अधिक दोहन और प्राकृतिक संसाधनों के विनाश के कारण भावी पीढ़ी को बहुत बड़ा खतरा है। इस खतरे के मुख्य रूप से कुछ कारण निम्न हैं –

  1. सतत् विकास और ग्रामीण विकास ।
  2. उद्योगों का सतत् विकास।
  3. शहरीकरण ।
  4. शिक्षा।
  5. निर्धनता (गरीबी)।
  6. सतत् ऊर्जा विकास।
  7. सतत् वानिकी विकास।
  8. सतत् जैविक विकास।
  9. जैव प्रौद्योगिकी का पर्यावरण अनुकूल प्रबन्धन ।
  10. सतत् मानव आवास विकास।
  11. पर्वतों, तटीय क्षेत्रों और द्वीपों का सतत् विकास।

पर्यावरण संरक्षण और सतत् विकास

सतत् विकास के दौर में मनुष्य इस – नियन्त्रणरहित विकास की ओर चला गया था। परन्तु अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर परिचर्चा रियो-डी जेनेरियो, ब्राजील में 1992 की संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण एवं विकास गोष्ठी में हुई, जिसे ‘पृथ्वी सम्मेलन’ के नाम से जान जाता है।

घोषणा का मुख्य लक्ष्य, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सभी राष्ट्रों में सहयोग, था। इसकी एक मुख्य घोषणा ‘एजेण्डा-21’ में सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक परिदृश्य में इक्कीसवीं सदी में सतत् विकास के लिए अन्तर्राष्ट्रीय कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की गई। संयुक्त राष्ट्र द्वारा यह निर्णय लिया गया कि सम्मेलन में सभी देशों में पर्यावरण सम्बन्धी हास को रोकने और इस प्रक्रिया को बदलने के लिए एवं पर्यावरण के सम्बन्ध में ठोस और सतत् विकास के लिए कार्य से सम्बन्धित कार्यनीतियों और उपायों पर विचार किया जाएगा। सितम्बर 2003 में जो हेन्सबर्ग, दक्षिण अफ्रीका में आयोजित ‘अर्थ सम्मिट’ की विषय-वस्तु ‘सतत् विकास’ थी।

पर्यावरण संरक्षण हेतु सतत् विकास के सिद्धान्त

संयुक्त राष्ट्र संघ पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के अन्तर्गत नौ सिद्धान्तों को सुझाया एवं स्वीकार किया गया-

  1. अनवीनीकरण संसाधनों के ह्रास को कम से कम करने का प्रयास करना।
  2. पृथ्वी की जैव विविधता का संरक्षण करना।
  3. मनुष्य के व्यवहार और क्रियाओं में परिवर्तन।
  4. पृथ्वी (भूमि) के जीवन की गुणवत्ता बनाए रखने वाली व्यवस्था को सुधारना।
  5. मानव जनसंख्या को पृथ्वी की वहन क्षमता के अन्दर रखना।
  6. समुदायों को अपने पर्यावरण के बचाव के लिए जागरूक करना।
  7. जैविक विविधता का आदर और उसको बचाने की अर्थात् उसको सुरक्षित रखने का प्रयास करना।
  8. वैश्विक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण के निमित्त संगठन का होना।
  9. पर्यावरण / पृथ्वी के विकास और संरक्षण हेतु एक ढांचा बनाना।

पर्यावरण संरक्षण हेतु प्रयास – पर्यावरण संरक्षण हेतु सतत् विकास की भूमिका से सम्बन्धित पहला कदम या प्रयास है -3 R विधि को अपनाना, अर्थात् इसमें 3 R का प्रयोग होता है जैसे –

  1. प्राकृतिक संसाधनों का कम से कम दोहन / प्रयोग करना। (Reduce Consumption of Natural Resources)
  2. प्राकृतिक संसाधनों का पुनः प्रयोग करना। (Reuse of Natural Resources)
  3. प्राकृतिक संसाधनों का पुनः संसाधन करना। (Recycling use of Natural Resources)

ऐसा करने से वर्तमान संसाधनों का बहुत अधिक दोहन नहीं होगा। पर्यावरण को संरक्षित करने के लिए – शिक्षा प्रणाली और संचार माध्यमों जैसे – रेडियो, दूरदर्शन, अखबार, इन्टरनेट, सोशल मीडिया आदि के प्रयोग से लोगों में प्रारम्भ से ही पर्यावरण से सम्बन्धित शिक्षा और जागरुकता को बढ़ावा दिया जाए जिससे पृथ्वी को धरती माता समझते हुए उसके प्रति सम्मान, श्रद्धा व अपनेपन की भावना उत्पन्न हो सके। प्राकृतिक संसाधनों का कम से कम ह्रास हो सके, इसके लिए आधुनिक तकनीक को विकसित किया जाय ताकि कम से कम अपशिष्ट उत्पन्न हो तथा उसका सहजता के साथ निस्तारण भी किया जा सके। संसाधनों का प्रयोग / उपयोग पर्यावरण की सहन क्षमता के अनुकूल हो ।

इसके अतिरिक्त कुछ और भी कार्य नीतियाँ हैं जिनको सतत् विकास की प्राप्ति तथा पर्यावरण संरक्षण हेतु अपनाना लाभप्रद है-

पर्यावरण संरक्षण के लिए सतत् विकास से सम्बन्धित कार्य नीतियाँ निम्नवत् है-

1. जो लोग बहुत गरीब व बेरोजगार हैं उनको सहायता व रोजगार के अवसर प्रदान किए जाएं, चूँकि ऐसे लोगों के लिए आस-पास के पर्यावरण को हानि पहुँचाने के अतिरिक्त कोई और विकल्प नहीं होता, इसलिए इनको कौशल परक शिक्षा प्रदान की जाय, ताकि वे रोजगार के लायक हो सकें।

2. प्राकृतिक संसाधनों की सीमाओं जैसे- नवीकरण ऊर्जा तथा वायु सौर, ज्वारभाटीय लहरों आदि का प्रयोग करके आत्मनिर्भरता का विचार विकसित किया जा सके।

3. परम्परागत कार्यप्रणाली के स्थान पर आर्थिक सुधारों का प्रयोग करते हुए कम लागत पर विकास का विचार विकसित करना, जिसके परिणामस्वरूप पर्यावरण की गुणवत्ता भी प्रभावित नहीं होनी चाहिए, साथ ही दीर्घकाल में भी इससे उत्पादकता में कमी भी नहीं आनी चाहिए।

4. स्वास्थ्य नियन्त्रण, उचित प्रौद्योगिकी, खाद्य पदार्थ आत्मनिर्भरता, स्वच्छ जल और सभी के लिए आवास की समस्याओं में सुधार करना चाहिए।

5. यह संकल्पना व्यक्ति केन्द्रित क्रियाकलापों की आवश्यकता है, इस अवधारणा के चलते व्यक्तियों को एक संसाधन माना गया है।

6. शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा, निर्धनता उन्मूलन के लिए विकास और कार्य नीति द्वारा क्षमता में निर्माण।

इसे भी पढ़े…

Disclaimer

Disclaimer:Sarkariguider does not own this book, PDF Materials Images, neither created nor scanned. We just provide the Images and PDF links already available on the internet. If any way it violates the law or has any issues then kindly mail us: guidersarkari@gmail.com

About the author

Sarkari Guider Team

Leave a Comment