
सम्पादन कला क्या है ? सम्पादन के गुणों का वर्णन करते हुए उल्लेख कीजिए समाचार की प्रस्तुतीकरण में किन बातों का ध्यान रखा जाता है?
सम्पादन कला का अर्थ- सम्पादन वह कला है जिसमें सम्पादक अपने निजी दृष्टिकोण और समाचार पत्र की सूचनाओं को प्रकाशन योग्य बनाने में अहम भूमिका रखता हो। सम्पादन’ शब्द ‘पद’ धातु से उद्भव है जिसका पर्याय किसी विषय में सम्यक गति होना है। सन् 61867 ई० के प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन ऑफ बुक्स एक्ट के अनुसार समाचार पत्र में जो कुछ छपता है उसका निश्चय करने वाला व्यक्ति सम्पादक कहलाता है।
Editor means the person who controls the selection of the matter that is published in a newspaper- Press and Registration of Books Act, 1867.
संपादकीय समाचार पत्र को चिरस्मरणीय बनाता है। समाचार पाठक पढ़कर भूल सकता है पर संपादकीय काफी अर्से तब मस्तिष्क में प्रतिबिम्बित रहता है। इसके अभाव में समाचार पत्र की उपयोगिता वैसी ही है जैसी कि “शीतलता के बिना जल, दाहकता के बिना अग्नि, शील के बिना सौन्दर्य, विनय रहित शक्ति, समर्पण रहित भक्ति, प्रेम रहित अनुरक्ति प्राण रहित शरीर, सुगन्ध विहीन पुष्प, कूजन रहित पक्षी समुदाय, हंसी ठिठोली शून्य पनघट और राष्ट्र भाषा रहित राष्ट्र।
(संपा0 डॉ० सुरेश गौतम, डॉ० वीणा गौतम : हिन्दी पत्रकारिता -कल आज और कल) तत्वतः संपादन वह कला है जैसे गागर में सागर भरना, पर गागर इतनी छोटी भी न हो कि पाठक प्यासा रह जाये। एक आदर्श सम्पादन का आधारभूत तत्व उसके कलेवर से ‘वामन’ और चेतना से ‘विराट’ होता है। संपादकीय समाचार पत्र की धड़कन है जो अपनी धड़कनों से व्यक्ति समाज और राष्ट्र की धड़कनों को प्रभावित ही नहीं बल्कि धड़कनों से धड़कनों को मिलाकर एक राग, आग, फाग और पराग की सृष्टि करते हैं। निश्चय के नलकूप से अनिश्चय की आग को बुझाना, बाढ़, अकाल या भूकंप की विभीषिका के इन्द्र-गर्व को सहयोग के ग्वाल हाथों द्वारा-गोवर्धन उठवाकर धूलि-धूसरित करवाना कुशल संपादकीय की छिंगनी का ही कमाल हुआ करता है।
डॉ.संजीव भानावत ने अपनी पुस्तक ‘संपादन कला’ में पत्रकार रामपाल सिंह के विचरों को उद्धृत करते हुए कहा है कि संपादकीय लेखक को प्रत्येक घटना का मूल्यांकन इन नौ दृष्टियों से करना चाहिए- (1) जानकारी देना, (2) सतर्क करना, (3) भाष्य करना, (4) शिक्षित करना, (5) मार्गदर्शन करना, (6) समझाना और राजी करना, (7) एक मंच प्रस्तुत करना, (8) प्रेरित करना, (9) मनोरंजन।
(डॉ० संजीव भानावत : संपादन कला)
वस्तुतः संपादन एक स्वतंत्र विधा है जिसको किसी सिद्धान्त अथवा नियम के आधार पर ढाला नहीं जा सकता। संपादन का अपना विशिष्ट व्यक्तित्व एवम् भाषा प्रस्तुतीकरण का तरीका होता है जो सम्पादकीय रूप में दृष्टिगोचर होता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि वस्तुनिष्ठता, निर्भीकता, रोचकता, दूरदर्शिता, मार्गदर्शन, विचारोत्तेजन, सुझाव, आलोचना, युक्तियाँ, तार्किकता, निष्पक्षता, चेतना, प्रशंसा, उत्साहवर्धन, प्रताड़ना, भावुकता, बौद्धिकता, सुसंगतापूर्णता, सकारणता और निर्लिप्तता सम्पादन के आधारभूत तत्व हैं। साथ ही साथ इसका भी ध्यान रखा जाए कि संपादकीय संक्षिप्त ही हों। प्रमुख पत्रकार पुलित्सर सदैव तीन बातों पर बुलेटिन बल देते थे- (1) संक्षेप, (2) सीधापन और (3) शैली।
सम्पादकीय विभाग समाचार-पत्र की रीढ़ है। रेडियो समाचार, टीवी समाचार को समाचार सम्पादक अत्यन्त कुशल एवं सजग संयोजक के रूप में कार्य को संपादित करते हैं। वह उपलब्ध एवं अपेक्षित समाचारों तथा उसके साथ प्राप्त चित्रात्मक सामग्री, अर्थात् फिलम वी0सी0आर0 कवरेज इत्यादि अन्य संभावित सामग्री को ध्यान में रखकर अपने बुलेटिन की रूपरेखा तैयार करता है। वह इस बात का भी ध्यान रखता है कि पिछले दिन तथा उससे पूर्व प्रसारित बुलेटिन में क्या प्रसारित हो चुका है। वह समाचारों के महत्व के अनुरूप उनका क्रम निर्धारित करता है और उन सभी समाचारों के साथ दी जाने वाली दृश्य सामग्री को भी क्रम देता है। वह सारी सामग्री प्रस्तुतकर्ता को सौप दी जाती है। समाचार सम्पादन में आधारभूत तत्वों का विशेष ध्यान दिया जाता है।
वस्तुतः यह सत्य है कि समाचार सम्पादक का काम बहुत ही उत्तरदायित्वपूर्ण होता है। वह एक ओर जहाँ समाचारों को क्रम देता है, वहीं उसके साथ ही दृश्यात्मक सामग्री को संलग्न करता है। संपादन करते समय दोनों में तालमेल रखना तथा काँट-छाँट करना आवश्यक है और सभी समाचारों एवं सामग्री के साथ यह संकेत अंकित करता है कि इस समाचार एवं दृश्य सामग्री को कितनी अवधि दी जानी है। दूरदर्शन प्रसारण के लिए एक विशेष किस्म का इलेक्ट्रानिक स्लाइड प्रोजेक्टर प्रयोग में लाया जाता है। इसकी सहायता से एक के बाद एक कई स्लाइड एक साथ एक ही समय में दिखा सकते हैं। एक ओर विशेष प्रोजेक्टर होता है जिसकी सहायता से फिल्म चलाई जाती है। इसे टेलीसिने कहते हैं। वीडियो टेप आ जाने से दूरदर्शन में फिल्मों का प्रयोग लगभग समाप्त हो गया है, लेकिन विशेष अवसरों पर या फिल्म के प्रसारण के लिए टेलीसिने का प्रयोग किया जाता है।
संवाददाता के प्रमुख गुण :
एक कुशल संवाददाता में सहज बुद्धि एवं भाषा पर पूर्ण रूप से अधिकार आवश्यक है। ये दोनों गुण संवाददाता की योग्यता का मूल्य निर्धारण करते हैं। एक कुशल संवाददाता में निम्न गुण आवश्यक हैं-
- समाचार बोध- एक संवाददाता में समाचार बोध या चेतना होनी चाहिए। उसमें समाचार और असमाचार में अन्तर स्पष्ट करने की क्षमता होनी चाहिए।
- दूर दृष्टि- भविष्य के प्रति दूर दृष्टि रखना एक संवाददाता को अति आवश्यक है। यह विशेष गुण अग्रिम प्रक्रिया की पहचान में उपयोगी है।
- आत्मानुशासन – एक रिपोर्टर लगातार प्रयासों एवं आत्म नियंत्रण द्वारा अपना काम दक्षता से करने की कुशलता प्राप्त कर सकता है।
- ईमानदारी- संवाददाता का यह गुण उसे सत्य एवं ईमानदारी के प्रति अचल रहने की योग्यता के प्रति प्रेरित करता है।
- स्पष्टवादिता एवं निर्भयता – स्पष्टवादिता एवं निर्भयता के कारण ही कोई रिपोर्टर अप्रिय प्रश्न पूछकर सत्य उगलवा सकता है।
- गतिशीलता- एक स्तरीय संवाददाता को अपना स्वभाव ही गतिशील बना लेना चाहिए। जब कभी भी आवश्यक हो वह बिना आलस्य के शीघ्रता से कहीं भी चला जाये।
- क्षिप्रता- सुस्त एवं ढीला व्यक्ति कभी भी एक अच्छा रिपोर्टर नहीं बन सकता।
- जिज्ञासा- संवाददाता को नये तथ्य जानने, नया ज्ञान प्राप्त करने, कुछ नया तलाशने की जिज्ञासा होना अनिवार्य है।
- संशय या अविश्वास- संवाददाता को कोई भी संवाद ज्यों का त्यों स्वीकार नहीं करना चाहिए। उसे तब तक संशय का रुख अपनाना चाहिए जब तक उसे किसी तथ्य का ठोस प्रमाण न मिल जाये।
- सतर्कता या स्फूर्ति – विचित्र खबरें अपने आप समाचार-पत्र के कार्यालय में प्रवेश नहीं करतीं, सतर्क रिपोर्टर उनका पीछा करके शीघ्रातिशीघ्र पकड़ते हैं।
- श्रेष्ठ मानवीय गुण- एक श्रेष्ठ संवाददाता में मानवीय गुणों की परम आवश्यकता है। इनमें – अध्यवसाय, व्यवहार कुशलता, नेतृत्व क्षमता, प्रशान्तता, धैर्य, समय की पाबन्दी, आदि होना परम आवश्यक है।
अभिव्यक्ति पक्ष से जुड़े हुए गुण भी अति आवश्यक हैं-
- रचनात्मक लेखन- उसके अन्दर लेखन क्षमता न होने पर वह एक अच्छा एवं आकर्षक तथा वस्तुनिष्ठ समाचार न लिख पायेगा।
- स्पष्टता- एक कुशल रिपोर्टर के लिए केवल विचारों की स्पष्टता तथा मन मस्तिष्क की स्पष्टता ही पर्याप्त नहीं है। अपने विचारों को समूची घटनाओं को तथा मन की बात को वह जिस स्टोरी का रूप देता है वह भी अभिव्यक्ति की दृष्टि से स्पष्ट होनी चाहिए।
- कल्पना शक्ति- घटनाओं तथा स्थितियों को रचनात्मक कल्पना से जोड़कर लिखी हुई स्टोरी पाठकों को बांध देती है। कल्पनाशील शीर्ष पंक्तियाँ पाठकों को खूब आकर्षित करती हैं।
- वस्तुनिष्ठता- श्रेष्ठ रिपोर्टर को अपने व्यक्तिगत विद्वेषों, दुर्भावनाओं तथा सम्बन्धों एवं विचारों को स्टोरी में नहीं आने देना चाहिए।
- विशुद्धता तथा यथार्थता- संवाददाता को स्टोरी लिखते समय जुटाये गये तथ्यों को भली-भाँति जाँचकर परखना चाहिए। जाँच परख तब तक करनी चाहिए जब तक वह उनकी यथार्थता एवं विशुद्धता के प्रति सन्तुष्ट न हो जाये।
समाचार का प्रस्तुतीकरण :
समाचार प्रस्तुति प्रक्रिया में संवाददाता को निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना होता है-
- समाचार प्रस्तुति में भाषा सुगठित होनी चाहिए।
- भाषा संतुलन अति महत्वपूर्ण होता है। भाषा का प्रवाह सरल, सुस्पष्ट तथा मसालेदार होना चाहिए।
- छोटे-छोटे वाक्य, छोटे अनुच्छेद, स्वीकारात्मक भाव हमेशा ही बनाये रखने चाहिए।
- संक्षिप्तता के साथ-साथ सत्यता का अंश नहीं समाप्त होना चाहिए।
- समाचार का महत्वपूर्ण अंश शुरुआती पंक्तियों में करना चाहिए।
- हमेशा ताजी एवं नवीन खबर प्रिय होती है अतः समाचार प्रस्तुति प्रक्रिया में त्वरित गति को प्रमुख स्थान देना चाहिए।
- समाचार प्रस्तुति राग-द्वेष की भावना से रहित होनी चाहिए।
- कठिन शब्दों का प्रयोग कम से कम करना चाहिए।
- जनरुचि, जातिरुचि और समूहरुचि को प्रमुख स्थान देना चाहिए।
- समाचार प्रस्तुति में सामयिकता, सामीप्य तथा आकार-प्रकार समाचार के महत्व को बढ़ावा देते हैं।
- प्रसार क्षेत्र की आवश्यकताओं का ध्यान रखना अति आवश्यक होता है।
- राष्ट्र की मर्यादा, परम्परा एवं आदर्शों को समाचार में अवश्य ही स्थान देना चाहिए।
- पत्र तथा पत्रकारों के हित का बराबर ध्यान रखना चाहिए।
डेली हेराल्ड ने लिखा है- “हम अपने पत्र में ऐसे समाचार दें, जिससे पाठक मुस्कुराये और उत्साहित हों। प्रत्येक पृष्ठ पर समाचारों को स्थान मिले जिससे पाठकों का मन प्रसन्न हो।”
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