
व्यावसायिक पत्र की विशेषताओं का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
व्यावसायिक पत्र की श्रेष्ठता या प्रभावशीलता दो घटकों पर निर्भर करती है-
पत्र का बाहरी रूप- किसी पत्र के बाहरी रूप का पत्र के पाने वाले पर सबसे पहला प्रभाव पड़ता है और यह पहला प्रभाव प्राय: अन्तिम सिद्ध होता है। एक कहावत है “जो पहलवान पहले चोट करता है, प्राय: उसे ही विजय प्राप्त होती है। इस आधार पर पत्र के बाहरी कलेवर का प्राप्तकर्ता पर तत्काल प्रभाव पड़ता है। अत: भ्रमर रूपी ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए व्यापारिक पत्र का बाहरी रूप पराग सदृश सुन्दर एवं आकर्षक होना चाहिए।
अत: पत्र के बाहरी स्वरूप को आकर्षक बनाने के लिए निम्नलिखित बातों का विशेष। रूप से ध्यान रखना चाहिए।
(क) स्टेशनरी या आलेखन सामग्री आर्थिक स्तर के अनुकूल होना चाहिए।
(ख) कागज का रंग प्राय: सफेद ही होना चाहिए।
(ग) कागज का आकार- व्यापारिक पत्र की आवश्यकता के अनुसार होगा।
(घ) टाइप करना – सजावट हाशिया पैराग्राफ, शुद्धता, एकरूपता रेखांकन इन सभी बातों को ध्यान में रखना चाहिए।
(ड) लिफाफा, कार्बन व रिबन का प्रयोग आवश्यकता के अनुसार करना चाहिए।
(च) पत्र को मोड़ना व लिफाफे में रखना- ठीक ढंग से होना चाहिए।
(छ) मुद्रांकन पत्र को लेटर बाक्स में छोड़ने से पहले उस पर मुद्रांकन होना चाहिए।
विषय सामग्री सम्बन्धी गुण
एक प्रभावी पत्र के विषय सामग्री सम्बन्धी गुण निम्नलिखित हैं-
(क) यथार्थता- व्यावसायिक पत्र यथा सम्भव सरल एवं सच्चा होना चाहिए क्योंकि शब्दों एवं वाक्यों को तोड़-मरोड़ कर रखने से दूसरे व्यापारी या ग्राहक को वास्तविक स्थिति सही-सही ज्ञान नहीं हो पाता हैं।
(ख) पूर्णता- पत्र में सभी आवश्यक बातों का समावेश होना चाहिए। कोई ऐसी बात लिखने से न रह जाये जो कि प्राप्तकर्ता के लिए माल सम्बन्धी आदेश देते समय माल की किस्म मात्रा, कीमत, पैंकिंग का ढंग, सुर्पुदगी का समय और भुगतान की विधि के विषय में पूर्ण सूचना देना आवश्यक होता है।
(ग) नम्रता अथवा शालीनता- पत्रों की भाषा नम्र, शिष्ट होना चाहिए। यदि कोई ग्राहक व्यापारी किसी कार्य से असन्तुष्ट होकर आवेश में असंगत भाषा का प्रयोग करते हुए पत्र भेजता है तो भी पत्र का उत्तर देते समय शिष्ट एवं संयत भाषा में उसकी असंतुष्टि के कारणों के सम्बन्ध में तर्कपूर्ण तथ्य प्रस्तुत करना चाहिए। नम्रता व्यवसाय के लिए अत्यन्त आवश्यक गुण है, लेकिन मिथ्या आरोपों का साहस पूर्ण ढंग से खण्डन पत्र के माध्यम से करना चाहिए। विनम्रता को विवशता का पर्याय नहीं बनाना चाहिए।
(घ) शुद्धता- पत्र में कोई भी असत्य या भ्रमात्मक बात न लिखी जाये। जहाँ तक हो सके, त्रुटियों से बचा जाये, क्योंकि व्यर्थ में असुविधा होती है। सभी तथ्य एवं आँकड़े यथासम्भव शुद्ध हो चाहिए। डॉ० रे० आरनर के मतानुसार- “जिस प्रकार एक व्यक्ति के लिए सदाचार की आवश्यकता होती है उसी प्रकार एक व्यापारी के हित पत्र व्यवहार में शुद्धता अनिवार्य है।”
(ड) संक्षिप्तता- व्यावसायिक पत्र का यह विशेष गुण है। आज के युग में समय की बड़ी कीमत है। पत्र में अनावश्यक ब्यौरे या लिखी गयी बातों की पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिए। पत्र का आकार जितना छोटा होगा, उतना ही प्रभावशाली होगा। लेकिन संक्षिप्तता का अर्थ यह नहीं है कि प्रेषक का मंतव्य साफ साफ प्रकट न हो सके और पाठक को अनुमान से काम लेना पड़े।
(च) प्रभावात्मकता- पत्र इस तरह से प्रस्तुत किया जाये कि ग्राहक के मन में वस्तु की गुणवत्ता के विषय में पूरा-पूरा विश्वास जम जाये ताकि वह अपने मन में सामग्री या उत्पाद से अपना सम्पर्क बनाने का मन बना ले।
(छ) श्रृंखलाबद्धता- भावों, विचारों या सूचनाओं को स्पष्ट अभिव्यक्ति के लिए उनका प्रस्तुतीकरण श्रृंखलाबद्ध होना चाहिए। एक तरह के विचार या विषय को एक अनुच्छेद में रखना चाहिए।
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