
समर्थ रामदास का जीवन परिचय (Samarth Ramdas Biography in Hindi)- ये शिवाजी के गुरु के रूप में भी जाने जाते हैं। महाराष्ट्र के महान संत समर्थ गुरु रामदास का जन्म औरंगाबाद जिले के जांब नाम के ग्राम में 1608 में हुआ था। इनके पिता सूर्याजी पंत एवं माता रेणुबाई दोनों ही बहुत धार्मिक विचारों के थे। रामदास का बाल्यकालीन नाम नारायण था। रामदास नाम बड़ा होने के बाद पड़ा था। बाल्यकाल से ही ये धार्मिक एवं परोपकारी विचारों के शख्स थे। 12 वर्ष की उम्र में मां के कहने पर ये शादी करने के लिए तैयार तो हो गए, लेकिन जैसे ही पंडितों ने मंत्र पढ़ा, ‘शुभ मंगल सावधान’ अर्थात् पैरों में गृहस्थी रूपी बंधन पड़ने वाले हैं, सावधान हो जाओ। रामदास तब विवाह मंडप से भाग निकले। ये सीधे पंचवटी गए। वहां नित्यप्रति गोदावरी में स्नान करते और कभी-कभार जल में खड़े होकर मध्याह्न तक ईश भक्ति किया करते थे।
बिंदु(Points) | जानकारी (Information) |
नाम (Name) | समर्थ रामदास |
असल नाम (Real Name) | नारायण सूर्याजीपंत कुलकर्णी |
जन्म (Birth) | 1608 |
मृत्यु (Death) | 1682 |
जन्म स्थान (Birth Place) | जालना गाँव (महाराष्ट्र) |
पिता का नाम (Father Name) | सूर्यजीपन्त |
माँ का नाम(Mother Name) | राणुबाई |
इस प्रकार ये दस वर्ष से ज्यादा तक ईश-वंदना का कार्य करते रहे। इसके पश्चात् बारह वर्ष तक इन्होंने भारत के सभी तीर्थस्थलों के दर्शन किए और देश की स्थिति को भी महसूस किया। अब ये लोगों को परमार्थ संबंधी कर्मयोग की शिक्षा प्रदान करने लगे। इन्होंने समाज के लोगों को संगठित करने का कार्य किया। कुछ समय रुककर वहां का कार्यभार शिष्यों के सुपुर्द कर ये सदैव आगे बढ़ते रहे। राम एवं हनुमान के प्रति इनकी अगाध निष्ठा थी। मैसूर में राम जन्मोत्सव का वृहद स्तर पर आयोजन करके इन्होंने भगवान राम के प्रति भक्ति भावना को बढ़ाने का कार्य शुरू किया। महाराष्ट्र के ग्यारह स्थलों पर हनुमान मंदिरों का निर्माण कार्य इनके अन्य महत्वपूर्ण कार्यों में से एक था। गुरु रामदास विद्वान, कवि और राष्ट्रभक्त भी थे। इन्होंने कई ग्रंथ सृजित किए थे। इनका रचित ‘दासबोद्य’ तो एक तरह का विश्वकोश ही है। इससे सभी तरह के आचार- विचारों का ज्ञान प्राप्त होता है। इनकी रचित ‘रामायण’ तुलसी कृत रामचरित मानस से भी दोगुने आकार की मानी जाती है। इनकी अद्भुत सामर्थ्य देखकर साधु समाज ने इन्हें ‘समर्थ’ कहना ही शुरू कर दिया। तभी से समर्थ स्वामी रामदास के नाम से जाने गए। इनके वाणी उद्बोधन को भी इनके शिष्यों के द्वारा लिखित स्वरूप में तीन ग्रंथों में संरक्षित किया गया।
महान छत्रपति शिवाजी से इनकी मुलाकात 1659 में हुई। शिवाजी इनसे आसानीपूर्वक नहीं मिल सके, लेकिन जब शिवाजी ने गुरु समर्थ के दर्शन किए बिना भोजन ही न करने की घोषणा की तो समर्थ स्वामी ने उनसे भेंट की थी। तदंतर दोनों के रिश्ते बेहद आत्मिक हो गए। शिवाजी से हिंदू साम्राज्य की स्थापना करने में समर्थ स्वामी रामदास के प्रयासों से भारी मदद मिली। एक बार जब स्वामी जी ने सतारा के किले में ‘जय-जय श्री रघुवीर समर्थ’ की आवाज लगाकर भिक्षा मांगी तो शिवाजी ने अपना संपूर्ण राज्य ही इनकी झोली में डाल दिया था। स्वामी रामदास पर वेद, उपनिषद और भागवत इत्यादि के साथ ही सर्वाधिक प्रभाव भगवत्गीता का रहा था। इन्होंने अपने साहित्य में अध्यात्म के चित्रण के साथ-साथ राजकारण, समाजकारण, व्यवहार चातुर्य और लोककार्य जैसे विषयों की भी विवेचना की थी। धार्मिक नेतृत्व देने के साथ ही ये देश को मुस्लिम आधिपत्य से आजाद कराने के लिए भी कृतसंकल्प रहे। इनके शिष्य शिवाजी ने गुरु की हृदयेच्छा को पूर्ण करने के लए अपना पूरा जीवन संघर्ष किया। 1681 में समर्थ गुरु रामदास का निधन हुआ।
समर्थ रामदास की रचनाये (Samarth Ramdas Books)
समर्थ रामदास ने कुल तीन प्रकार के ग्रंथों रचना है जिसके नाम कुछ इस प्रकार हैं-
- दासबोध
- आत्माराम
- मनोबोध