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भारतीय परम्परा के अनुसार ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का स्वरूप

भारतीय परम्परा के अनुसार 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का स्वरूप
भारतीय परम्परा के अनुसार ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का स्वरूप

भारतीय परम्परा के अनुसार ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का स्पष्ट स्वरूप उल्लेखित कीजिए।

भारत का मूल्य-संबंधी दृष्टिकोण अत्यधिक प्राचीन है। मूल्यों से संबंधित पूरब की समस् अवधारणाओं में भारतीय अवधारणा सर्वोत्कृष्ट एवं सबसे अधिक प्रभावशाली है। मूल्यों की प्रासंगिकता को सार्वकालिक माना गया है। यह मूल्यों की जीवन में सर्वोच्च महत्ता ही है। जिसे स्वीकार करते हुए। महात्मा गाँधी जी ने कहा है- “मूल्य ही व्यक्ति के भाग्य का निर्माण करते हैं। “

मूल्यों की मूल भावना समष्टि का कल्याण है, समान रूप में सबका उत्थान है। मूल्यों से संबंधित भारतीय परिप्रेक्ष्य व्यक्तिगत के साथ ही सामूहिक मानव विकास पर केन्द्रित है। यह मूल्यों को व्यक्तिगत के साथ ही सामाजिक, राष्ट्रीय एवं वैश्विक तथा इससे भी आगे सार्वभौमिक व्यवस्था के सुचारू रूप में संचालन के पीछे रहने वाली मार्गदर्शक शक्ति घोषित करता है। इस स्वीकृति मात्र से ही मूल्यों से संबंधित भारतीय दृष्टिकोण या अवधारणा की सर्वकालिक महत्ता, अद्वितीयता एवं श्रेष्ठता स्वयं सिद्ध हो जाती है।

हिन्दू धर्म में वेद अति पवित्र एवं प्रमुख धर्मग्रन्थ हैं। हिन्दू धर्म की अन्य सभी ग्रन्थ संहिताएँ वेद मान्यता पर ही आधारित है। सत्य-संबंधी सार्वभौमिक नियमों, समस्त मान्यताओं एवं मानकों के मूल स्रोत और निर्धारक भी है।

वेदों में सत्य प्रथम एवं सर्वोच्च मूल्य के रूप में प्रकट होता है। सर्वोच्च शक्तिमान ईश्वर स्वयं सत्य के मूलस्रोत के रूप में सामने आते हैं। इस वास्तविकता वेदों में प्रथम, ऋग्वेद, के इस मंत्र द्वारा भली भाँति जाना जा सकता है-

“एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः ॥ ”

अर्थात् सत्य (केवल) एक (ही) है, मेधावी जन (यद्यपि) उनका इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि (आदि) विभिन्न रूपों (व नामों से) वर्णन करते हैं।”

ईश्वर को आधारभूत मानते हुए, उन्हें मूलस्रोत स्वीकार करते हुए, तथा केन्द्र में रखते हुए, सत्य को समस्त व्यवहारों में अंगीकार करना ही सर्वकल्याण का मार्ग है। यही, वास्तव में, मानव जीवन को योग्य, मूल्यवान तथा सार्थक बनाने का उपाय है।

समानता, एकता एवं विश्वोन्नति का अद्वितीय संदेश ऋग्वेद की यह ऋचा प्रकट करती हैं-

“समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः ।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥”

अर्थात् “(हम) सभी के संकल्प एक समान हो, हृदय एकविध एवं एकरूप हों, मन समान हो तथा परस्पर कार्य पूर्ण रूप से संगठित हों।”

निस्संदेह रूप से सत्याधारित मानव एकता का श्रेष्ठता प्रकटीकरण है। साथ ही यह उत्कृष्ट एवं सर्वकालिक वास्तविकता है। वैश्विक एकता से संबंधित इस अद्वितीय संदेश के बल पर गुणवत्ता एवं  मात्रा दोनों रूपों में सर्वकल्याणार्थ- विश्वोन्नति तथा सार्वभौमिक प्रगति के लिए बहुत कुछ प्राप्त किया जा सकता है।

भारत का प्राचीन उद्घोष ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ रहा है। वसुधैव कुटुम्बकम् जिस श्लोक का भाग है, वह श्लोक मूलतः महापनिषद् में प्रकट होता है तथा पूरा श्लोक इस प्रकार है-

“अयं बन्धुरयं नेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥”

अर्थात् “यह मेरा बन्धु (सम्बन्धी) हैं, और वह पराया (अजनवी) है, ऐसा विचार संकीर्ण मानसिकता का द्योतक है। जो श्रेष्ठजन (उदार चरित) है, उनके लिए सारा संसार एक कुटुम्ब (परिवार) की भाँति है।’

यह श्लोक हितोपदेश में भी है। महोपनिषद् के इस श्लोक से मिलता है। इस प्रकार है-

“अयं निजः परोवेति गणना लघु चतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥

अर्थात् – “यह मेरा हैं, यह उसका है, ऐसी मान्यता (वास्तव में) संकुचित चित्त वाले मनुष्यों की – होती है, विपरीत इसके, उदार चरितज़न के लिए संपूर्ण पृथ्वी एक ही परिवार की तरह होती है। “

उपर्युक्त दोनों श्लोकों में समानता है। ये श्लोक हमें वृहद् उन्नति, कल्याण और समृद्धि हेतु विशालतम स्तर पर सहयोग-सहकार तथा सामंजस्य का संदेश देते हैं। सर्वहित हेतु एक साथ बढ़ने; एक चित्तता से कार्य करने एवं सभी प्रकार के भेदभाव से मुक्त होकर, एक-दूसरे मानव को समान मानते हुए, समस्त भेदभावों को छोड़ते हुए, एवं एक स्रोत से ही सबकी उत्पत्ति की सव्यता स्वीकार करते हुए, एक-दूसरे की सहायता करने के लिए तत्परता का आह्वान करते हैं। ऋग्वेद में प्रकट उस महान मंत्र द्वारा इसकी सहज भाव से पुष्टि होती हैं, जिसका सरल भाषा में भावार्थ है “इकट्ठे चले, एक कंठ से स्वर निकालें एवं मन से भी एक हो जाएँ…. ।” अर्थात्

“संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानानां उपासते॥”

सम्पूर्ण मानव-एकता, भेदभाव से पूर्णतः मुक्ति एवं एकचित्तता से सर्वकल्याण, सर्वोन्नति तथा सर्वसमृद्धि मूल भावना तथा मूल उद्देश्य हो । मानव के रूप में राजा एवं रंक, धनी तथा निर्धन, संत एवं सामान्य व्यक्ति एक साथ बैठकर भोजन करें। सभी एक साथ मिलकर एक उद्देश्य, अर्थात् प्रत्येक की उन्नति के लिए कदम से कदम मिलाएँ।

“वसुधैव कुटुम्बकम्” से जुड़े श्लोक वैदिक कामना, अर्थात् “संसार में, वृहद् दृष्टिकोण से – ब्रह्माणड में, दृश्य-अदृश्य जगत् में, सभी सुखी रहें, प्राणिमात्र सुख-स्थिति को प्राप्त हों, सभी रोग मुक्त रहें तथा स्वस्थ हों, विश्व भर में कोई दुखी न रहें।” की पुष्टि करते हैं। यथा-

“सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःख भाग्यवेत् ॥”

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