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प्राकृतिक आपदाओं के प्रकार एवं आपदा प्रबन्धन

प्राकृतिक आपदाओं के प्रकार एवं आपदा प्रबन्धन
प्राकृतिक आपदाओं के प्रकार एवं आपदा प्रबन्धन

प्राकृतिक आपदाओं के प्रकार एवं आपदा प्रबन्धन का वर्णन कीजिए। 

प्राकृतिक आपदाओं के प्रकार

प्राकृतिक आपदाओं को मुख्यतः दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है-

  1. पार्थिव प्राकृतिक आपदायें,
  2. पृथ्व्येतर प्राकृतिक आपदायें।

1. प्राकृतिक आपदायें- इनके अन्तर्गत पृथ्वी के उन प्रकमों को सम्मिलित किया जाता है, जिनके द्वारा पृथ्वी की आपदापत्र घटनाएँ उत्पन्न होती हैं (सिंह, 1991)। इनको भी उत्पत्ति स्रोत के आधार पर दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है- (i) पार्थिव या अन्तर्जात प्रक्रमों द्वारा उत्पन्न आपदायें तथा (ii) बहिर्जात या वायुमण्डलीय दशाओं से उत्पन्न आपदायें प्रथम वर्ग में भूकम्प, ज्वालामुखी, वृद्ध स्तर पर घटित भूस्खलन तथा हिमस्खलन को सम्मिलित किया जाता है। ये आपदायें पृथ्वी के अन्तर्जात बलों द्वारा व आन्तरिक तापीय दशाओं के उपरान्त उत्पन्न होती हैं। इनमें अधिकांश प्राकृतिक आपदाओं की उत्पत्ति महाद्वीपीय एवं महासागरीय प्लेटों के संचलन के कारण होती हैं। यथा 26 जनवरी, 2001 को गुजरात का भूकम्प अकेबियन प्लेट तथा इण्डियन प्लेट के संचलन के उपरान्त उत्पन्न हुआ।

प्लेटों का संचलन पृथ्वी के आन्तरिक भागों में तापीय दशाओं के कारण उत्पन्न संवहनीय तरंगों के परिणामस्वरूप होता है। संयुक्त राज्य अमेरिका के डेनवर में स्थित विश्व भूकम्पमापी आंकड़ा केन्द्र के अनुसार 26 जनवरी, 2001 में गुजरात में आने वाले भूकम्प भारतीय प्लेट के उत्तर की ओर यूरेशियाई प्लेट से टकराने से उत्पन्न हुआ।

प्राकृतिक आपदायें निम्नलिखित हैं-

(i) भूकम्प (iii) ज्वालामुखी (iii) हिमस्खलन (iv) भूस्खलन, (v) चक्रवात एवं (vi) बाढ़।

(i) भूकम्प – पृथ्वी की चट्टानों से होकर दोलनकारी तरंगों के गुजरने से उत्पन्न कम्पन्न को ‘भूकम्प’ कहते हैं। इसके आने के विभिन्न कारण होते हैं, जिनमें ज्वालामुखी क्रिया, भ्रंशन क्रिया, ‘समस्थितिक समायोजन आदि प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त पर्वतीय स्थानों पर भूस्खलन तथा महाद्वीपीय जलमग्न वट का यकायक टूटना आदि स्थानीय कारण भी सम्मिलित हैं। भूकम्प की तीव्रता मरकेली तथा रिक्टर पैमाने की सहायता से मापी जाती है।

(ii) ज्वालामुखी क्रिया- ज्वालामुखी क्रिया भी भूकम्प की तरह एक प्रमुख आपदापत्र प्राकृतिक घटना है। ज्वालामुखी विस्फोट के अनेक कारण बताये जाते हैं, जिनमें पृथ्वी तल के अन्दर दरारों, ज्ञरा जल का प्रवेश, वलनों का प्रभाव, रेडियो एक्टिव कणों की उपस्थिति आदि प्रमुख हैं। ज्वालामुखी क्रिया द्वारा भूगर्भिक संरचना में परिवर्तन होता है।

(iii) हिमस्खलन- उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में हिमस्खलन के कारण प्रभावित क्षेत्रों में काफी हानि पहुँचती है। लेकिन इस क्रिया का प्रभाव अधिक व्यापक नहीं होता है।

(iv) भूस्खलन— भूस्खलन एक प्रमुख प्राकृतिक आपदा है। इस घटना में भूमि का एक भाग टूटकर निम्नतर भागों की ओर खिसकता है। यह क्रिया गुरुत्वाकर्षण द्वारा प्राकृतिक रूप से होती है। यह क्रिया अधिकांशतः पर्वतीय उच्च प्रदेशों में होती है। स्ट्रेलर के अनुसार, “पर्वतीय ढाल पर किसी भी चट्टान का गुरुत्वाकर्षण के कारण नीचे की ओर खिसकना भूस्खलन कहलाता है।” यदि यह खिसकाव मंद गति से हो तो इसे मृदा खिसकाव कहते हैं तथा जब वृहद स्तर पर बड़े शिलाखण्डों का खिसकाव होता है तो इसे भूस्खलन कहते हैं। ये दो प्रकार का होता है—

(अ) चट्टानी खिसकाव— इसमें चट्टानों का आधारी आववण वृहद् रूप में खिसकता है, जो भ्रंशों या आवरण तल के रूप में खिसकती हैं।

(ब) अचानक गिरना- इसमें ऊपरी उत्तर ढाल से यकायक चट्टानें खिसकती हैं।

भूस्खलन एक प्रमुख प्राकृतिक आपदा के रूप में जान-माल की हानि के अतिरिक्त पर्यावरण सन्तुलन को भी प्रभावित करते हैं। सन् 1911 में पामीर क्षेत्र में 7-8 हजार टन का प्रस्तरखण्ड खिसककर एक नदी के प्रवाह क्षेत्र में जा पहुँचा जिसके कारण सेरेज झील का निर्माण हुआ। यह झील 80 किलोमीटर लम्बी है। भारत में नैनीताल क्षेत्र में 1880 में एक विशाल भूस्खलन हुआ, जिसमें 150 लोग मारे गये। भूस्खलन विभिन्न कारणों से होता है, जिनमें पृथ्वी की आन्तरिक हलचल, भूसन्तुलन का बिगड़ना, जल द्वारा कटाव, ज्वालामुखी उद्गार तथा भूकम्प प्रमुख हैं।

(v) चक्रवात – ये समस्त आपदायें जलवायु तथा मौसम सम्बन्धी चरम घटनाओं से सम्बन्धित होती हैं। दीर्घकालिक आपदाओं में बाढ़, सूखा, ताप तथा शीत लहर आदि को सम्मिलित किया जाता है, जो संचयी प्रवाह वाले होते हैं। आकस्मिक आपदाओं में उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात व तूफान सम्मिलित हैं। इन चक्रवातों में निम्न प्रमुख हैं-(अ) हरिकेन, (ब) टायफन, (स) टारनेडो, (द) विली-विली। हरिकेन उत्तरी अटलाण्टिक महासागर विशेषतः कैरबियन सागर एवं दक्षिण संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रभावशील है। टायफून उत्तरी प्रशान्त महासागर विशेषतः चीन सागर, चीन के पूर्वी तथा दक्षिणी तटीय भाग, जापान तथा फिलीपाइन्स में, बांग्लादेश, भारत का पूर्वी तट अरब सागर में चक्रवात तथा आस्ट्रेलिया में विली-विली प्रभावशील हैं।

उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात अचानक उत्पन्न होकर इतने तीव्र वेग से प्रवाहित होते हैं कि समुद्री जल में भी प्रलयंकारी तरंगें उत्पन्न हो जाती हैं। इन तरंगों को तूफान तरंग या ज्वारीय तरंग कहते हैं। उत्तरी ऑस्ट्रेलिया के डार्विन नगर में सन् 1974 में ट्रेसी चक्रवात के कारण 49 व्यक्ति मारे गये। टाइफून से सन् 1881 में 3 लाख लोग मारे गये।

(vi) बाढ़- बाढ़ भी एक प्राकृतिक आपदा है, जिसके कारण विस्तृत क्षेत्र जल प्लावित हो जाता है। इस कारण कृषि का विनाश होता है। वनस्पति समाप्त होकर मृदा अपरदन तीव्र हो जाता है। आवासीय बस्तियाँ जलमग्न हो जाती मनुष्य, पशु एवं पक्षी बाढ़ रूपी काल के ग्रास बन जाते हैं। बाढ़ के उपरान्त विभिन्न क्षेत्रों में जल के फैलने से विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ दूषित जल एवं दलदली क्षेत्रों में उत्पन्न होती हैं। भारत में बाढ़ग्रस्त क्षेत्र से बहुत हानि होती है। सितम्बर, 2000 में पं. बंगाल में बाढ़ से लगभग 1000 लोग मारे गये। पी.के. सेन ने बाढ़ से होने वाली पर्यावरणीय क्षति के बारे में लिखा है कि, “बाढ़ की आपदा एक क्षेत्र के पर्यावरण के लिए गम्भीर समस्या को जन्म देती हैं, क्योंकि इससे अनेक प्राकृतिक क्रियाओं में एकाएक परिवर्तन आ जाता है। अपरदन की गति में वृद्धि हो जाती है। परिवहन क्रिया अधिक होती है। साथ में निक्षेप भी अधिक होने से मृदा की संरचना एवं पर्यावरण के अन्य पक्षों पर प्रभाव पड़ता है।”

2. पृथ्व्येतर प्राकृतिक आपदायें- पृथ्वी के बाहर से घटित आपदाओं को पृथ्व्येतर आपदायें कहते हैं, ये क्षुद्रग्रह, मध्यवर्ती गृह तथा पुच्छल तारों की टक्कर के कारण उत्पन्न होती हैं। इनकी पृथ्वी की बाहरी वस्तुओं से टक्कर के कारण अपार धूल-राशि उत्पन्न होती है। महासागरों में ज्वारीय तरंगें उठती हैं, सागर तल में परिवर्तन, जलवायु में परिवर्तन, स्थलाकृतियों में परिवर्तन, ज्वालामुखी क्रिया तथा भूतल पर गतों का निर्माण आदि परिवर्तन होते हैं। इस प्रकार की अनेक आपदायें प्रकट हो चुकी हैं। विद्वानों के एक वर्ग का मानना है कि क्रिटेशियस युग के अन्त तथा टर्शियरी युग के प्रारम्भ में आज से लगभग 65 मिलियन वर्ष पूर्व कुछ जन्तुओं का सामान्यतया तथा डायनोसोर का सामूहिक विलोपन पृथ्वी के एक बृहदाकार क्षुद्रगृह समूह के मध्य टक्कर के कारण हुआ था। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय की बर्कल स्कूल के लुइस अलवारेज तथा वाल्टर लवारेज ने बताया कि आज से 660 लाख वर्ष पूर्व एक 10 कि.मी. चौड़े पुच्छल तारे की पृथ्वी से जबर्दस्त भिड़न्त हुई थी, जिसके परिणामस्वरूप अपार धूलराशि उत्पन्न हुई, जिससे वायुमण्डल में धूल का सघन आवरण बन गया तथा कई वर्षों तक अन्धकार छाया रहा।

आपदा प्रबन्धन

प्रकृति में भूकम्प, ज्वालामुखी उद्गार, बाढ़, सूखा, चक्रवात, हरिकेन, टारनैडो, टाइफून, भूस्खलन आदि अपना प्रभाव डालते हैं। इन क्रियाओं के प्रकोप से मानव तथा अन्य जीव-जन्तु प्रभावित होते हैं, विगत दशकों में देश के लगभग सभी भागों में महाविपत्तिकारी घटनाएँ घटी हैं।

पृथ्वी पर प्रत्येक स्थिति में कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में आपदायें उत्पन्न हो रही हैं। जल के अभाव में भीषण सूखा (उ.प. भारत, अफ्रीकी सहेल प्रदेश) पड़ता है, तो जलाधिक्य की स्थिति में बाढ़ की स्थिति बन जाती है। जैसे-पश्चिमी भारत में भीषण सूखा पड़ रहा है तथा पूर्वी भारत में बाढ़ की स्थिति बन रही हैं। इस प्रकार असन्तुलन की स्थिति में भूकम्प एवं भूस्खलन की घटनाएं हो रही हैं। वर्षों से सन्तुलित अवस्था में चल रहे मानसून को नूतन वर्षों में उत्पन्न अलनिनो से प्रभावित किया जिस कारण दक्षिणी-पूर्वी एशिया के अनेक स्थानों को सूखे की स्थिति का सामना करना पड़ा। पृथ्वी पर समतल एवं उर्वर क्षेत्रों में भी आपदापत्र घटनाएँ होने लगी हैं। समतल क्षेत्रों में सघन कृषि करने के लिए भूजल संसाधन का अन्धाधुन्ध दोहन किया गया, जिससे भयंकर जल संकट उत्पन्न हो गया तथा ऐसी स्थिति में दूसरी आपदाओं की तीव्रता बढ़ जाती है। 26 जनवरी, 2001 को गुजरात में आये भूकम्प के बारे में शोध के उपरान्त स्पष्ट हुआ है कि राजस्थान के विभिन्न भागों में नलकूप लगवाकर भूजल का तेदोहन किया जा रहा है जिसके दुष्परिणाम आने वाले समय में भूकम्प जैसी भीषण प्राकृतिक आपदा के रूप में सहन करने पड़ सकते हैं। दोहन के अनुपात में भूजल का पुनर्भरण न होने पर आन्तरिक चट्टानों में तनाव व फैलाव के होता है तथा चट्टानों में दरारें आ जाती हैं जिस कारण भूजल के परस्पर एक-दूसरे जलमरे में संचरित होने पर भूगर्भिक असन्तुलन उत्पन्न हो सकता है तथा साथ ही इन फ्रेक्चर वाली चट्टानों के टकराने की आशंका बनी रहती है। प्राकृतिक आपदा प्रबन्धन के निम्नलिखित तीन चरण होते हैं-

  1. आपदाओं के आने की भविष्यवाणी करना या पूर्वानुमान लगाना।
  2. आपदा आने के उपरान्त तुरन्त राहत सामग्री पहुँचाना।
  3. आपदाओं के रोकथाम के उपाय करना तथा सीमा तक समायोजन के उपाय करना।

किसी व्यवस्थित क्रम में तैयार की गई आपदा प्रबन्धन योजना के निम्नलिखित छः चरण होते-

  1. आपदा रोकथाम,
  2. आपदा का प्रभाव कम करना,
  3. आपदा से निपटने की तैयारी,
  4. आपदा आने पर कार्यवाही करना,
  5. आपदा राहत एवं पुनर्वास तथा
  6. आपदा एवं विकास

1. आपदा रोकथाम— आपदा की रोकथाम के उपायों में वे सभी कार्य सम्मिलित हैं, जो किसी प्राकृतिक प्रकोप को आपदा में परिवर्तित होने से रोकने के लिये किए जा सकते हैं। यह स्पष्ट है कि समुद्री तूफान, बाढ़ और हिमस्खलन जैसे प्राकृतिक खतरों को रोकने के लिए कुछ नहीं किया जा सकता लेकिन उनके आपदाकारी प्रभावों को रोकने के लिए प्रयास किये जा सकते हैं। उदाहरण के लिए 29 अक्टूबर, 1999 को उड़ीसा में आये भीषण समुद्री तूफान की पूर्वसूचना सम्बन्धी जिलों में वायरलेस एवं आकाशवाणी द्वारा 25 अक्टूबर, 1999 को दे दी गई थी। इसी प्रकार 1998 के गुजरात तूफान के समय भी इसके अरब सागर में उत्पन्न होते ही गुजरात एवं समीपवर्ती क्षेत्रों को इसकी पूर्व सूचना दे दी गई थी। रोकथाम के कुछ राष्ट्रीय विकास के अन्तर्गत आते हैं, जबकि अन्य का सम्बन्ध विशेष आपदा प्रबन्ध कार्यक्रमों के साथ है।

2. आपदा का प्रभाव कम करना- आपदा का प्रभाव कम करना आपदा प्रबन्धन योजना का प्रमुख हिस्सा है। सामान्य शब्दों में, प्रभाव कम करने के अन्तर्गत उन सभी उपायों को सम्मिलित किया जाता है, जिनमें से किसी क्षेत्र के लोगों को आपदा से यथासम्भव बचाने में मदद मिलती है। प्रभाव कम करने की आधारभूत नीतियों में भूमि-उपयोग को नियन्त्रित करना, आपदा प्रतिरोधी आदर्श भवनों का निर्माण करना, सामुद्रिक गतिविधियों को नियंत्रित करना, भवन निर्माण सम्बन्धी उपयुक्त संहिता एवं भवनों के वास्तुशिल्प सम्बन्धी डिजाइन तैयार करना ताकि चट्टानों को गिरने से रोकने के लिए अवरोधक खड़े करना आदि उपाय सम्मिलित हैं।

इनके अतिरिक्त जलग्रहण प्रबन्ध, श्रेणियों में सुधार, फसल चक्र, मवेशी प्रबन्धन और मृदा संरक्षण प्रविधियाँ भी आपदाओं का प्रभाव कम करने में महत्त्वपूर्ण सहयोग करती हैं। गैर रचनागत उपायों में आपदाओं से रक्षा के लिए पर्याप्त कानून, नियम और उपनियम, बीमा एवं ऋण योजनाएं, शिक्षा और प्रशिक्षण कार्यक्रम, स्वयं सहायता समूह को सक्रिय बनाना, उपयुक्त चेतावनीं प्रणाली और संस्थाओं की स्थापना जैसे उपाय सम्मिलित हैं।

3. आपदा से निपटने की तैयारी- आपदाओं से निपटने की तैयारी सम्बन्धी उपाय निश्चय ही राष्ट्रीय आपदा तैयारी योजना के दायरे में आने चाहिए और साथ ही विशेष आपदा की स्थिति में केन्द्र, राज्य, जिला और खण्ड स्तर पर अल्प एवं दीर्घ अवधि की योजनाएँ बनाई जानी चाहिए। बाढ़, सूखा, तूफान और भूकम्प जैसी आपदाओं के लिए अलग-अलग आपात योजनाएँ, राहत योजनाएँ तथा पुनर्वास योजनाएँ बनायी जानी चाहिए।

4. आपदा आने पर कार्यवाही करना- आपदा आने पर तुरन्त कार्यवाही करनी चाहिए अन्यथा दूसरी अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं जैसे 1999 के उड़ीसा तूफान के कारण उपजी महामारी की आशंका आदि ऐसी ही सम्बद्ध समस्याएँ हैं, अतः तुरन्त यथासम्भव कार्यवाही की जानी चाहिए।

5. आपदा राहत एवं पुनर्वास- आपदा ग्रस्त क्षेत्र में आपदा के स्वरूप एवं सहने की क्षमता अनुसार राहत एवं पुनर्वास के कार्य चलाए जा सकते हैं। आपदा के उपरान्त सहायता की आवश्यकता, प्रकार, मात्रा तथा अवधि का निर्धारण करने में इससे सहायता मिलती है।

6. आपदा एवं विकास- आपदाओं का प्रत्यक्ष सम्बन्ध विकास से होता है। जनहानि के अतिरिक्त अनेक ऐसी क्रियाएँ या तो मन्द हो जाती हैं या विनष्ट हो जाती हैं, जो विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। आपदा होने वाली क्षति विकास में बाधा बनती हैं।

आपदा क्षति का संग्रहण एवं पूर्वानुमान आपदा के कारगर प्रबन्धन में सहायक हो सकते हैं। आपदा मानचित्र तैयार करना भी उन सर्वाधिक कारगर उपायों में से एक है जिनसे आपदा प्रबन्धन के विभिन्न पहलुओं के बारे में आँकड़े एकत्र कर, उनका विश्लेषण किया जा सकता है। आपदा की आशंका वाले प्रमुख स्तोत्रों के मानचित्र तैयार किए जा सकते हैं, जिनमें भूकम्पीय गतिविधियों वाले क्षेत्रों, लघुस्तर पर औद्योगिक क्षेत्रों, भूमि उपयोग की योजना, प्राकृतिक भूगोल, जल विज्ञान, विज्ञान, जनसंख्या वितरण के बारे में स्थानीय आँकड़ों का विश्लेषण तथा आपदा की आशंका वाले क्षेत्रों का सामाजिक-आर्थिक स्वरूप आदि तथ्यों को रेखांकित किया जा सकता है।

आपदा की आशंका वाले क्षेत्रों में उपग्रह आधारित विश्वसनीय एवं बेजोड़ संचार प्रणाली का विकास किया जा सकता है। इस दिशा में भारत में प्रयास किया गया है, जिसे आपदा चेतावनी प्रणाली का नाम दिया है। अब हवा के न्यून दबाव वाले क्षेत्रों का 72 घण्टे पहले पता लगाया जा सकता है। आपदाओं का पहले से ही कारगर प्रबन्ध करने के लिए हमारे पास एक समुचित, विश्वसनीय और समयानुकूल आगाह करने वाली चेतावनी प्रणाली होनी चाहिए, जो विश्वसनीय पूर्वानुमानों के आधार पर सम्भव हो सकती है। सही-सही पूर्वानुमान केवल उन्हीं आपदाओं के बारे में व्यक्त किया जा सकता है, जिनके बारे में पूर्वसूचनाएँ मिल सकें। इस प्रकार सूचनीयता, पूर्वानुमान एवं चेतावनी के मध्य एक महत्त्वपूर्ण सम्बन्ध है।

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