प्रायोगिक अनुसंधान प्ररचनाओं के प्रकार | Types of Experimental Research Designs
प्रायोगिक अनुसंधान प्ररचनाओं के प्रकार- यह अनुसंधान प्ररचना प्रयोगशाला में प्रयोग की तरह दो चरों के परस्पर सम्बन्ध का अध्ययन करने के लिये बनाई जाती है। इसमें एक नियंत्रित समूह बनाया जाता है तथा दूसरा प्रायोगिक समूह नियंत्रित समूह को जैसे, वह है वैसे ही रहने दिया जाता है, जबकि प्रायोगिक समूह में जिस कारक का प्रभाव देखना है उसका प्रकाशकरण (Exposure) किया जाता है। अध्ययन में वैज्ञानिक विधि के सभी चरण अपनाये जाते हैं। चैपिन (Chapin) के अनुसार, “समाजशास्त्रीय अनुसंधान में परीक्षणात्मक प्ररचना की अवधारणा नियंत्रण की दशाओं के अन्तर्गत निरीक्षण द्वारा मानवीय सम्बन्धों के व्यवस्थित अध्ययन की ओर संकेत करती है। यदि कोई उपकल्पना का परीक्षण करना चाहता है कि चर ‘अ’ चर ‘ब’ का कारण है तो हमें दो समूहों, एक जिसमें ‘अ’ का प्रकाशकरण किया गया है (प्रायोगिक समूह) तथा दूसरा जिसमें ऐसा नहीं किया गया है। (नियंत्रित समूह) की तुलना प्रकाशकरण के पश्चात करनी होगी। प्रायोगिक अनुसंधान प्ररचनाएँ प्रयोग की प्रकृति के अनुसार तीन श्रेणियों में विभाजित की जा सकती हैं, ये श्रेणियाँ निम्नलिखित हैं-
1. केवल पश्चात् परीक्षण (After Only Experiment)
इस प्रकार के परीक्षणों में नियंत्रित तथा प्रयोगिक समूह का आश्रित चर ‘ब’ के संदर्भ में अवलोकन अथवा मापन प्रकाशकरण के समय अथवा बाद में किया जाता है। इस प्रकार की अनुसंधान प्ररचनाओं में दो एक समान समूहों का चयन किया जाता है तथा एक समूह में जिस कारक का प्रभाव देखना है उसका प्रकाशकरण किया जाता। है। इस प्रकाशकरण वाले समूह को प्रायोगिक तथा जिसमें परिवर्तन नहीं किया है उसे नियंत्रित समूह कहा जाता है। यदि दोनों में कोई अंतर मिलता है तो यह उस कारक के प्रकाशकरण के कारण है।
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2. पूर्व पश्चात् परीक्षण (Before After Experiment )
इस प्रकार की प्ररचनाओं में आश्रित चरों का अवलोकन अथवा मापन प्रकाशकरण के पश्चात ही नहीं किया जाता अपितु पहले भी किया जाता है ताकि दोनों समूहों की समानता तथा अन्य चरों का पूर्वानुमान लगाकर प्रयोग को अधिक विश्वसनीय बनाया जा सके। पूर्व पश्चात परीक्षण में एक ही समूह हो सकता है अथवा एक से अधिक समूह हो सकते हैं। यदि एक ही समूह चुना जाता है तो उसका अवलोकन, जिस कारक का प्रभाव देखना है, उससे प्रकाशकरण के पूर्व तथा पश्चात किया जाता है। यदि अन्तपरिवर्तनशील (Interchangable) समूहों को चुना जाए तो प्रायोगिक चर की प्रारम्भिक माप की समस्या समाप्त हो जाती है। यदि दो समूह चुने गये हैं तो एक का पूर्व मापन नहीं किया जाता परन्तु प्रायोगिक चर से प्रकाशकरण किया जाता है।
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3. कार्योत्तर अथवा कार्यान्तर तथ्य परीक्षण (Ex-Post Facto Experiment)
कई बार कार्योत्तर तथ्य परीक्षण प्रायोगिक प्ररचना का भी प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार के परीक्षणों का प्रयोग तब किया जाता है जबकि ऐसी समस्या का अध्ययन करना होता है जो घटित हो चुकी है तथा जिसका पुनर्परीक्षण नहीं किया जा सकता। इसमें भी दो समूहों का चयन किया जाता है। एक समूह वहाँ चुना जाता है जहाँ घटना हो चुकी हो तथा दूसरा वहाँ से जहाँ घटना घटित नहीं हुयी है।
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सैल्टिज, जहोदा तथा अन्य विद्वानों का तर्क है कि प्रायोगिक अनुसंधान प्ररचना में नियंत्रित तथा प्रयोग समूह का चयन दैव निदर्शन अथवा समानीकरण के आधार पर करना चाहिये, ताकि दोनों समूहों। की तुलना तथा प्रायोगिक चर का प्रभाव अधिक अर्थपूर्ण दृष्टि से देखा जाये। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो निष्कर्ष भ्रमक हो जाता है। सामाजिक घटनाओं के कार्य व्याख्या सम्बन्धों के अध्ययन में प्रायोगिक अनुसंधान प्ररचना के प्रयोग में घटनाओं की जटिलता एक बाधा हो सकती है। जे. एस. मिल द्वारा प्रतिपादित विधियों – (i) समानता की विधि (Method of agreement) तथा (ii) असमानता की विधि (Method of difference) की सहायता से दो तुलनात्मक परिस्थितियों का अध्ययन करके अप्रत्यक्ष प्रयोग किये जा सकते हैं। क्योंकि सामाजिक विज्ञानों में घटनाओं पर किसी भी प्रकार नियंत्रण रखना एक कठिन कार्य है, इसलिये समाजशास्त्र में अप्रत्यक्ष प्रयोग की विधि ही अधिक उपयोगी है। दुर्खीम ने समाजशास्त्रीय अध्ययनों में इस विधि की शुरुआत की तथा अन्य विद्वानों ने भी इसे अपनाकर महत्वूपर्ण अध्ययन किये हैं।
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