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व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि | CTBT Full Form in Hindi

व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि
व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि

व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि – CTBT Full Form in Hindi

यह आणविक निःशस्त्रीकरण के क्षेत्र में सबसे महत्त्वपूर्ण कदम व ऐतिहासिक घटना व सन्धि है। सी.टी.बी.टी. अर्थात् व्यापक आणविक परीक्षण प्रतिबन्ध सन्धि (Comprehen sive Test Ban Treaty) विश्व भर में किये जाने वाले परमाणु परीक्षणों पर रोक लगाने के उद्देश्य से लाई गई सन्धि या समझौता है जिसका 1993 में भारत अन्य देशों के अतिरिक्त अमेरिका के साथ सह प्रस्तावक था। किन्तु 1995 में भारत ने इससे यह कह कर अपना हाथ खींच लिया कि “यह सन्धि सार्वभौमिक परमाणु निःशस्त्रीकरण के समयबद्ध कार्यक्रम से जुड़ी नहीं है।” भारत ने इसका विरोध किया व इस पर हस्ताक्षर करने से इन्कार कर दिया है।

अगस्त 1996 में जिनेवा में इस विवादास्पद संधि के मसौदे पर विचार चलता रहा। इस बहुचर्चित सन्धि में “परमाणु परीक्षणों पर प्रतिबन्ध लगाने के साथ-साथ इस पर अमल की जाँच हेतु अन्तर्राष्ट्रीय निरीक्षण की भी व्यवस्था है।” भारत को इसी पर ऐतराज है।

भारत द्वारा हस्ताक्षर से इंकार

भारत द्वारा सी. टी.बी.टी. (C.T.B.T.) के प्रस्तावित मसौदे पर हस्ताक्षर करने से इंकार के पीछे प्रमुख कारण इस प्रकार हैं-

(1) प्रस्तावित मसौदे में परमाणु निःशस्त्रीकरण का कोई प्रावधान नहीं है।

(2) यह सन्धि बहुत ही संकीर्ण व भेदभावपूर्ण है। यह केवल नवीन विस्फोट रोकने की बात करती है।

(3) यह नये तकनीकी विकास एवं नये परमाणु शस्त्रों के विषय में चुप है।

(4) भारत की सबसे बड़ी आपत्ति यह है कि “सन्धि का स्वरूप परमाणु राष्ट्रों की तकनीकी उपलब्धता को बरकरार रख कर उनके हितों की रक्षा के लिए अधिक है, न कि सम्पूर्ण निःशस्त्रीकरण के लिए।”

हस्ताक्षर तथा अमल- इस सन्धि पर 24 सितम्बर, 1996 से हस्ताक्षर शुरू हुए तथा अब तक कुल मिलाकर 144 देशों ने हस्ताक्षर कर दिये हैं। 45 राष्ट्रों द्वारा इसका विधिवत अनुमोदन भी किया जा चुका है। किन्तु इसके क्रियान्वयन हेतु “विश्व के उन सभी 44 देशों द्वारा इसका अनुमोदन आवश्यक है जिनके पास परमाणु शस्त्र अथवा परमाणु विद्युत संयंत्र | अथवा परमाणु क्षमता उपलब्ध है। परमाणु क्षमता वाले केवल 26 देशों ने ही इसका अनुमोदन किया है, जबकि भारत, पाक व उत्तरी कोरिया द्वारा अभी हस्ताक्षर ही नहीं किये गये हैं।” अतः इसका लागू होना अभी खटाई में पड़ा है और भविष्य में जल्दी ही इसके अमल में आने के आसार कम दिखलाई पड़ते हैं। भारत अपनी ही शर्तों पर इस पर हस्ताक्षर व अनुमोदन करेगा।

परमाणु शक्तियों की स्थिति- जहाँ तक पाँच घोषित परमाणु शक्तियों- अमेरिका, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन व रूस का प्रश्न है, सभी ने हस्ताक्षर कर दिये हैं। किन्तु पुष्टि सिर्फ फ्रांस व ब्रिटेन ने ही की है। इसे सबसे बड़ा झटका तब लगा जब अक्टूबर, 1999 में अमरीकी सीनेट ने इसे अनुमोदित नहीं किया। राष्ट्रपति बुश जूनियर इसे अनुमोदित कराने हेतु विशेष उत्सुक भी नहीं दिखलाई पड़े। अतः फिलहाल इसका कार्यान्वयन खटाई में पड़ चुका है।

यू.एन. का विशेष सम्मेलन (अक्टूबर, 1999 )– सी.टी.बी.टी. के कार्यान्वयन की प्रगति के मूल्यांकन (Evaluation) हेतु यू. एन. द्वारा एक विशेष सम्मेलन 6-8 अक्टूबर, 1999 को वियना में बुलाया गया। इसमें 92 देशों के 400 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। तीन दिन तक चले इस अधिवेशन/ सम्मेलन में भारत, पाक व उ. कोरिया से सन्धि पर हस्ताक्षर की अपील की गयी तथा उसके अनुमोदन पर जोर दिया गया, ताकि सन्धि को लागू किया जा सके। किंन्तु अभी तक इस अपील का कोई प्रभाव भारत सहित इन देशों पर नहीं पड़ा।

वस्तुतः यह सन्धि भेदभावपूर्ण व अपूर्ण है। अतः भारत इस पर शीघ्र हस्ताक्षर नहीं करेगा। अतः निकट भविष्य में इसका क्रियान्वयन हो सकेगा इसमें संन्देह दिखलाई पड़ता है। चाहे जो भी हो यह सन्धि परमाणु निःशस्त्रीकरण व प्रतिबन्धों के क्षेत्र में सबसे कहीं अधिक व्यापक व प्रभावशली है।

परमाणु अप्रसार सन्धि समीक्षा सम्मेलन (अप्रैल-मई, 2000) – अप्रैल मई 2000 का परमाणु अप्रसार सन्धि समीक्षा सम्मेलन अपना एक विशिष्ट महत्त्व रखता है। इस समीक्षा सम्मेलन में पांच परमाणु सम्पन्न शक्तियों द्वारा “अपने परमाणु आयुद्धों (भण्डारों) को पूरी तरह समाप्त करने पर सहमति व्यक्त की गई, किन्तु इस हेतु कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की गई।” परमाणु विहीन देशों द्वारा इसका स्वागत करते हुए “इसे परमाणु निःशस्त्रीकरण की दिशा में एक अहम् कदम बताया गया।”

निष्कर्ष- अब तक के विश्लेषण से एक बात स्पष्ट है कि “यू.एन. निःशस्त्रीकरण की दिशा में विशेष चिन्तित व प्रयासरत है और इसमें उसे काफी हद तक सफलता भी मिली है।” अक्टूबर 1999 में सी.टी.बी.टी. के कार्यान्वयन की प्रगति मूल्यांकन करने हेतु जेनेवा में एक विशेष सम्मेलन आयोजित किया गया, जो काफी सफल माना जा सकता है। उसके बाद भी यू.एन. इस क्षेत्र में सक्रिय है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि परमाणु निःशस्त्रीकरण की दिशा में निरन्तर प्रगति हो रही है व इसकी सफलता के आसार काफी बढ़ गये हैं।

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