राजनीति विज्ञान / Political Science

द्वितीय शीत युद्ध के प्रमुख कारण | नवीन शीत युद्ध के प्रमुख कारण | उत्तर शीत युद्ध के शुरू होने के कारक

द्वितीय शीत युद्ध के प्रमुख कारण
द्वितीय शीत युद्ध के प्रमुख कारण

द्वितीय शीत युद्ध के प्रमुख कारण अथवा नवीन शीत युद्ध के प्रमुख कारण अथवा उत्तर शीत युद्ध के शुरू होने के कारक

‘शीत-युद्ध’ द्वितीय महायुद्धोत्तर अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति की महत्त्वपूर्ण विशेषता है। सन् 1962 के ‘क्यूबा संकट’ के बाद शीत युद्ध में शिथिलता या नरमी आने लगी। अमरीकी राष्ट्रपति कैनेडी और सोवियत प्रधानमंत्री खुश्चेव ने विवेक से कार्य करते हुए दुनिया को ‘तीसरे विश्व युद्ध से उबार लिया। जहाँ अमरीका ने क्यूबा पर आक्रमण न करने का आश्वासन दिया वहाँ सोवियत संघ ने क्यूबा से प्रक्षेपास्त्रों को हटाने का आश्वासन दिया जिन्हें बाद में वहाँ से हटा लिया गया। आगे चलकर सोवियत संघ-अमरीकी सम्बन्धों में ‘दितान्त’ की शुरुआत हुई। ‘दितान्त’ से अभिप्राय है सोवियत-अमरीकी रिश्तों में तनाव-शैथिल्य और उनमें दिन-प्रतिदिन बढ़ती मित्रता, सहयोग और शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व की भावना का विकास। ‘दितान्त’ सम्बन्धों के इस युग में सीमित परमाणु परीक्षण प्रतिबन्ध सन्धि (1963), परमाणु अप्रसार सन्धि (1968), मास्को-बोन समझौता (1970), बर्लिन समझौता (1971), यूरोपीय सुरक्षा एवं सहयोग सम्मेलन (1973 1975), साल्ट वार्ताएं (1972 की साल्ट-1 सन्धि और 1979 की साल्ट-2 सन्धि), आदि प्रमुख उपलब्धियाँ कही जा सकती हैं। परन्तु 1978-88 की अनेक घटनाओं ने दितान्त भावना को ऐसे झटके दिये कि यदि उसका अन्त नहीं हुआ तो वह बुरी तरह क्षतिग्रस्त अवश्य हो गयी। महाशक्तियां पुनः शीत युद्धकालीन भाषा का प्रयोग करने लगीं, शस्त्रों की होड़ पुनः तीव्र गति से बढ़ने लगी, टकराव के पुनः विविध केन्द्र उत्पन्न हो गये। एक नये शीत युद्ध की शुरुआत हुई।

दूसरे ‘ नये’ शीत युद्ध के कारण

नये (दूसरे) शीत युद्ध की शुरुआत के निम्नांकित कारण बताये जाते हैं

1. सोवियत संघ की शक्ति में वृद्धि होना

दितान्त के युग में सोवियत संघ परमाणु और नौ-सैनिक शक्ति में अमरीका की बराबरी करने का प्रयत्न कर रहा था। जब अमरीका वियतनाम युद्ध में उलझा हुआ था तब सोवियत संघ ने परम्परागत अस्त्रों और अन्तरिक्ष में अमरीका से आगे निकलने की सफल चेष्टा की। अब सोवियत संघ अमरीका को चुनौती देने की स्थिति में था। उसके समुद्री जहाज सातों समुद्रों की गश्त लगाने लगे। अमरीका सोवियत संघ की सर्वोपरि स्थिति को कैसे स्वीकार कर सकता था ?

2. रीगन का राष्ट्रपति पद पर निर्वाचन होना

नवम्बर, 1980 के अमरीकी राष्ट्रपति के निर्वाचन में अमरीकी जनता ने जब एक बाज (हॉक- Hawk) को ह्वाइट हाउस की गद्दी प्रदान कर दी तो नये शीत युद्ध की गरमी को सर्वत्र अनुभव किया जाने लगा। दक्षिणपन्थियों और कट्टर रूढ़िवादियों के हाथों हाइट हाउस की बागडोर उग्र-आक्रामक नीतियों का संकेत था। रीगन ने सत्ता में आते ही ‘अमरीका को पुनः कार्य पर लगाने’, ‘शस्त्र उद्योग को बढ़ावा देने’, ‘मित्र राष्ट्रों का पुनः शस्त्रीकरण करने’, ‘शस्त्र प्रतिस्पर्द्धा को तेज करने’ और ‘सोवियत संघ के प्रति उग्र नीति अपनाने की घोषणा करके’ पहले से ही शुरू हुए नये शीत युद्ध की अग्नि में घी की आहुति दे दी।

3. अन्तरिक्ष अनुसंधान की सोवियत संघ

अमरीकी होड़- अन्तरिक्ष में हथियारों की होड़ का सिलसिला पिछले तीन दशकों से जारी था। जिस दिन पहला स्पुतनिक छोड़ा गया था, उसी दिन इस होड़ की भी शुरुआत हो गयी थी। सोवियत संघ और अमरीका दोनों ने यह प्रचार किया कि उनके अन्तरिक्ष अनुसंधान मानव जाति के कल्याण के लिए हैं। वास्तव में, दोनों की ही नीयत साफ नहीं थी। दोनों को यह आशंका हमेशा रही कि दूसरा अन्तरिक्ष अनुसंधान में कहीं बाजी न मार ले जाये, इसलिए दोनों एक-दूसरे पर कड़ी नजर रखने लगे। पहले साधारण उपग्रह, फिर संचार उपग्रह, फिर अन्तरिक्ष में प्रयोगशाला तो दूसरी ओर मनुष्य को अन्तरिक्ष में लम्बे समय तक रखकर प्रयोग करने में समर्थ बनाने के प्रयास एक ओर स्पेस शटल तो दूसरी ओर अन्तरिक्ष स्टेशन। एक ने आदमी को चन्द्रमा पर भेजकर वहाँ की मिट्टी और चट्टाने मंगाकर दुनिया को हतप्रभ कर दिया, तो दूसरे ने यंत्र द्वारा चन्द्रमा से मिट्टी और चट्टानें लाकर दिखा दी। एक ने वृहस्पति और शनि की खोज के लिए यान भेजा तो दूसरे ने अन्तरिक्ष में कारखाने खोलने की तैयारी शुरू कर दी। कहा गया कि अन्तरिक्ष यान इस ब्राह्मण्ड की गुत्थी को सुलझाने में मदद करेंगे तो दूसरे ने प्रचारित किया कि अन्तरिक्ष कारखानों में ऐसी उपयोगी चीजें तैयार की जायेंगी जिन्हें धरती पर बनाना सम्भव नहीं।

अमरीका के सैन्य संवाद का 80 प्रतिशत उपग्रहों के माध्यम से ही होता है। दिन प्रतिदिन उपग्रहों पर उनकी निर्भरता बढ़ती जा रही थी। 1988 तक वह 18 उपग्रहों का एक ऐसा समूह स्थापित करना चाहता था जो संसार के किसी भी हिस्से में विमानों, जहाजों और फौजियों की बिल्कुल ठीक स्थिति बता सके। इसके लिए उपग्रहों पर परमाणु घड़ियां लगाने की बात कही जाने लगी। लेसर संचार उपग्रहों से पनडुब्बी में बैठे योद्धा समुद्र की गहराइयों में रहकर वार्ता करने लगे। सोवियत संघ भी पीछे नहीं था। 18 जून, 1982 को उसके कॉस्मॉस 1379 उपग्रह-मारक उपग्रह ने अन्तरिक्ष में जाकर बारह दिन पूर्व छोड़े गये कॉस्मॉस यान का रास्ता रोक लिया। पृथ्वी से 950 किलोमीटर ऊपर उपग्रह-मारक अस्त्र की स्थापना की दिशा में यह पहला कदम था। उपग्रह-मारक उपग्रह के इस निदर्शन के कुछ ही घण्टों में सोवियत संघ ने अन्तरिक्ष में दो आई.सी.बी.एम. एक माध्यम दूरी का एस. एस. 20 प्रक्षेपास्त्र, एक पनडुब्बी प्रक्षेपित प्रक्षेपास्त्र और दो बैलिस्टिक प्रक्षेपास्त्र रॉकेट छोड़कर खौफनाक युद्ध का माहौल बना दिया।

सोवियत संघ की इस अन्तरिक्षीय उपलब्धि के बाद अमरीका भला चुप कैसे बैठ सकता था? उसने रफ्तार से अपनी उपग्रह-मारक प्रणाली तैयार कर डाली और 14 सितम्बर, 1985 को अपना पहला उपग्रह-मारक परीक्षण कर डाला।

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