राजनीति विज्ञान / Political Science

शीतयुद्ध को समाप्त करने वाले प्रमुख कारकों का वर्णन कीजिए।

शीतयुद्ध को समाप्त करने वाले प्रमुख कारक
शीतयुद्ध को समाप्त करने वाले प्रमुख कारक

शीतयुद्ध को समाप्त करने वाले प्रमुख कारक

दूसरे शीत युद्ध (1979) के बाद का समय अमेरिका और सोवियत संघ के बीच तनाव का चरम उत्कर्ष था। अफगानिस्तान में सोवियत संघ के हस्तक्षेप के बाद विश्व की राजनीतिक स्थिति अत्यन्त गम्भीर हो गयी। परन्तु अचानक मात्र सात वर्षों (1985-91) में यह ‘शीत युद्ध’ विदाई की ओर अग्रसर होता गया। इसके अनेकानेक कारण हैं जिसमें सोवियत संघ के साथ व्यापाक सहयोग किया। शीत युद्ध की समाप्ति के कुछ प्रमुख कारण निम्न हैं-

(1) मिखाइल गोर्बाच्योव का व्यक्तित्व एवं नीतियाँ

मार्च, 1985 में सोवियत संघ के शासन का नेतृत्व मिखाइल गोर्बाच्योव के हाथों में आया। जिस प्रकार स्टालिन को शीत युद्ध के जन्मदाता के रूप में स्मरण किया जाता है उसी प्रकार विश्व गोर्बाच्योव को शीत युद्ध को समाप्त करने वाले नेता के रूप में स्मरण करेगा। गोर्बाच्योव ने लौह आवरण की दीवार को ढहा दिया और बन्द दरवाजे तथा खिड़कियाँ खोल दीं। उन्होंने विश्व में शान्ति स्थापित करने के लिए परमाणुविहीन, हिंसामुक्त, समस्यारहित विश्व की एक नवीन दृष्टि प्रदान की। उन्होंने दिसम्बर, 1987 में कम और मध्यम दूरी तक मार करने वाले प्रक्षेपास्त्रों को समाप्त करने वाली सन्धि (आई.एन.एफ. सन्धि) पर दस्तखत किये। उन्होंने अस्त्रों और सेनाओं की एकपक्षीय कटौती की घोषणा की। उनकी ग्लास्नोस्त्र और ‘पेरेस्त्रोइका’ नीतियों ने राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्रों में नवीन व्यवस्था का सूत्रपात किया। सोवियत संघ ने गोर्बाच्योव के नेतृत्व में जिस उदार, सौम्य और समझौतावादी राजनय का आश्रय लिया उसने विश्व राजनीति में आमूल-चूल परिवर्तन ला दिया। पूर्वी यूरोप के देशों की स्वतंत्रता एवं लोकतंत्र का समर्थन कर युक्त जर्मनी को नाटो की सदस्यता बरकरार रखने, वारसा पैक्ट को भंग करने का निर्णय लेकर गोर्बाच्योव ने यूरोपीय लोगों के हृदय पर विजय प्राप्त कर ली। इन रियायतों से जर्मन लोग कृतार्थ हो गये। गोर्बोच्योव की इन्हीं राजनयिक उपलब्धियों के कारण उन्हें नोबल शान्ति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

(2) सोवियत संघ की आर्थिक विशेषताएँ

सन् 1980 के पश्चात् सोवियत संघ आर्थिक संकट का सामना कर रहा था। अन्तरिक्ष अनुसंधान की प्रतिस्पर्द्धा और शस्त्र निर्माण पर अन्धाधुन्ध व्यय करने के उपरान्त उसकी अर्थव्यवस्था चरमराने लगी। अब उसमें सामार्थ्य नहीं थी कि वह पश्चिमी देशों से शीत युद्ध की प्रतिस्पर्द्धा कर सके। मिखाइल गोर्बाच्योव ने दो टूक शब्दों में सोवियत अर्थव्यवस्था की दुर्दशा का वर्णन किया- “स्थिति का विश्लेषण करने पर हमें यह ज्ञात हुआ कि आर्थिक प्रगति धीमी होती जा रही है। विगत 15 वर्षों में राष्ट्रीय आय की वृद्धि दर आधे से भी कम हो गयी और सन् 1980 के दशक के प्रारम्भ तक वह घटकर आर्थिक गतिरोध के निकटवर्ती स्तर पर पहुँच गयी थी। जो देश कभी विश्व के उन्नत देशों की समानता के अत्यधिक निकट पहुँच गया था, वह लगातार एक के बाद दूसरा स्तर गँवाने लगा।”

संक्षेप में, सोवियत संघ जैसी महाशक्ति आर्थिक संकट के किनारे पर पहुँच गयी थी। सन् 1988 में आर्थिक वृद्धि दर 4.4 प्रतिशत थी, निर्यात 2 प्रतिशत घट गया और आयात 6.5 प्रतिशत बढ़ गया। जिस देश में उत्पादन दक्षता और लोगों के जीवन निर्वाह स्तर में वृद्धि अवरुद्ध हो गयी थी, उपभोक्ता वस्तुओं के लिये लम्बी-लम्बी लाइन (पंक्तियाँ) लगती हों उसे शीत युद्ध की समाप्ति में ही अपना राष्ट्रीय हित दिखाई देने लगा।

सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के 28वें सम्मेलन में तत्कालीन सोवियत विदेश मंत्री शेवरनाद्से ने रहस्योद्घाटन किया कि पश्चिम के साथ वैचारिक संघर्ष में सोवियत संघ को 7 अरब रूबल तो सैनिक साधनों पर ही खर्च करने पड़े, जबकि राजनीतिक समतुल्यता कायम करने के लिए आवश्यकता इससे भी अधिक थी, दूसरी ओर चीन के साथ लगे झमेले में 2 खरब रूबल का खर्च और हुआ। अफगानिस्तान में टाँग फँसाने की लागत आयी- प्राण हानियों के अतिरिक्त 60 अरब रूबल।

( 3 ) अमेरिका एवं पश्चिमी देशों का सकारात्मक रुख

यह सच है कि सोवियत संघ ने अपनी आर्थिक विषमताओं के कारण निशस्त्रीकरण की नीति अपनायी, परन्तु पश्चिमी यूरोप के देशों विशेषकर पश्चिमी जर्मनी और संयुक्त राष्ट्र अमेरिका ने सोवियत के प्रयासों एवं नीतियों के प्रति सकारात्मक एवं उदारवादी रवैया अपनाया। इसके परिणामस्वरूप सोवियत संघ और अमेरिका के बीच विभिन्न निशस्त्रीकरण वार्तायें सम्भव हो सकीं तथा दोनों के बीच विश्वास में वृद्धि हुई, संदेह की काली रात्रि समाप्त हुई। दोनों देशों के बीच संदेह का वातावरण ही शीत युद्ध का प्रमुख कारण था। संदेह के निराकरण ने दोनों देशों के बीच विभिन्न समझौतों एवं सौहार्द के वातावरण में वृद्धि की। जैसे-

(i) अक्टूबर 1986 में रीगन-गोर्बाच्योव के बीच शिखर वार्ता हुई।

(ii) U.S.A. और U.S.S.R.. के बीच दिसम्बर 1987 में INF संधि हुई इसके माध्यम से मध्यम दूरी के प्रक्षेपास्त्र एवं 1139 परमाणु हथियार को नष्ट करने की सहमति हुई।

(iii) पश्चिमी जर्मनी के चान्सलर हेल्मुट कोल ने मास्को की यात्रा की।

(iv) दिसम्बर, 1990 में बुश-गोर्बाच्योव शिखर वार्ता हुई इसमें जर्मनी एकीकरण पर वार्ता हुई।

(v) 1 जुलाई, 1990 में जर्मनी का एकीकरण तथा 5-6 जुलाई, 1990 को राष्ट्रपति बुश ने ऐतिहासिक घोषणा की कि नाटो एवं वारसा देशों के मध्य शीत युद्ध समाप्त हो गया है।

(vi) नवम्बर 1990 में नाटो एवं वारसा देशों के मध्य एक ऐतिहासिक सन्धि पर हस्ताक्षर हुए जिसमें कहा गया कि यूरोप से शीत युद्ध का अन्त हो गया है।

(4) सोवियत संघ का बिखराव

सन् 1990-91 के वर्ष सोवियत संघ में उथल-पुथल के वर्ष रहे। 9 अगस्त, 1991 की सत्ता हस्तगत की घटना से गोर्बाच्योव की लोकप्रियता को गहरा आघात पहुँचा। विश्व-शक्ति के रूप में अब सोवियत संघ की प्रतिष्ठा गुजरे जमाने की वस्तु बनकर रह गयी। सोवियत संघ की स्थिति में आयी यह गिरावट खाड़ी संकट के दौरान उसके द्वारा अमेरिका को दिये गये निष्क्रिय समर्थन से ही उजागर हो चुकी थी, लेकिन इसकी चरम परिणति तब हुई जब गोर्बाच्योव ग्रुप 7 की लंदन बैठक में जाकर पश्चिमी आर्थिक सहायता प्राप्त करने में असफल रहे और उनके अपने देश में अपने गणराज्यों ने प्रबल तरीक से अपनी स्वायत्तता की माँगें रखनी प्रारम्भ कर दी। किसी समय विश्व-शक्ति कहलाने वाले सोवियत संघ का यह राजनीतिक विखण्डन वर्तमान समय की कुरूप वास्तविकता है। कल तक श्रमिकों के हितों की रक्षक मानी जाने वाली सोवियत कम्युनिष्ट पार्टी मृत्यु के कगार पर थी और के. जी.बी. जैसी सर्वसमर्थ मानी जाने वाली संस्था भी रेत की दीवार की तरह ध्वस्त हो चुकी थी। इसी प्रकार सोवियत सरकार का केन्द्रीकृत स्वरूप भी नागरिक, सैनिक और अफसरशाही के क्षेत्र में हो रहे नित नवीन परिवर्तनों के कारण लड़खड़ाने लगा। इसी घटनाक्रम का परिणाम था कि धीरे-धीरे कुछ ही महीनों में भीमाकार सोवियत संघ धराशायी हो गया।

( 5 ) साम्यवादी देश में लोकतंत्र और बाजार अर्थ व्यवस्था 

शीत युद्ध एक वैचारिक संघर्ष था। सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के देशों ने विकास का ‘कम्युनिस्ट मॉडल’ स्वीकार किया था जिसकी विशेषता थी- एक सर्वाधिकारवादी दल तथा केन्द्रीकृत आदेशित अर्थव्यवस्था, किन्तु 1989-90 के वर्षों में पूर्वी यूरोप के देशों ने स्वतंत्र निर्वाचन वाली बहुदलीय प्रजातंत्रीय राजनीतिक व्यवस्था के साथ-साथ बाजार अर्थव्यवस्था स्वीकार कर ली। सन् 1990 में सोवियत संघ में भी साम्यवादी पार्टी पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया तथा मुक्त बाजार व्यवस्था स्वीकार कर ली गयी। अब पश्चिमी देशों और पूर्वी यूरोप के देशों में कोई भेद नहीं रह गया। अब तो सोवियत संघ को जी-7 देशों से आर्थिक सहायता प्राप्त होने की सम्भावना बढ़ गयी। ऐसे परिवर्तन के समय में शीत युद्ध की समाप्ति एक स्वाभाविक घटना थी। नवम्बर दिसम्बर, 1991 में अमेरिका ने खाद्य राहत के रूप में सोवियत संघ को 1.5 अरब डॉलर की राशि स्वीकृत की जिसे मिलाकर वर्ष 1991 में प्रदान की गयी अमेरिकी सहायता की राशि 4 अरब डालर तक पहुँच गयी। इन्हीं दिनों अकेले जर्मनी ने ही सोवियत संघ को 40 अरब डॉलर की सहायता प्रदान की थी।

इस प्रकार साम्यवाद, सोवियत संघ एवं पूर्वी यूरोप की साम्यवादी व्यवस्था के पतन के बाद कमोवेश विश्व का स्वरूप उदारवादी लोकतांत्रिक हो गया। पूँजीवाद और साम्यवाद के बीच वैचारिक प्रतिद्वन्द्विता की समाप्ति हुई। जब सोवियत संघ ही बिखर गया तो उसकी सैनिक, आर्थिक, वैचारिक प्रतिद्वन्द्विता अमेरिका के साथ समाप्त हो गयी। संयुक्त राष्ट्र संघ में अमेरिका और (सोवियत का उत्तराधिकारी) दोनों विश्व की समस्याओं के समाधान के लिये सहयोग करने लगे। इस प्रकार यूरोप तथा विश्व के अन्य भागों में फैला अमेरिकी और सोवियत गुट के बीच शीत युद्ध समाप्त हो गया।

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