महाकवि बिहारी का जीवन परिचय

हिन्दी साहित्य के चारो युगो आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल और आधुनिक काल में से रीतिकाल के कवि और साहित्यकार आत्मभाव से साहित्य रचना में प्रवृत्ति होते थे। आत्मपरिचय की तरफ इन कवियों की रूचि नगण्य थी। यही कारण है कि तत्कालीन कवियों और लेखकों का जीव नवृत प्राय अज्ञात रहा है। यद्यपि विभिन्न साहित्यकारों की रचनाओं में उनके संबंध में कुछ अस्पष्ट संकेत मिल जाते है, किन्तु वे इतने अपर्यापत, अप्रमाणित और संदिग्ध है कि उनके आधार पर ठोस तथ्यों की उपलब्धि की सम्भावना नहीं की जा सकती है। कवि बिहारी के काल-निर्धारण के संबंध में भी यही कठिनाई उपस्थित होती है। उनके कुछ दोहों से उनके जीवन की कतिपय घटनाओं का धुधला सा आभास होता है।

पिता :-

भारतीय संस्कृति की अंहव्यवच्छिन धारणा ने कवियों को अपना इतिवृत छिपाये रखने की प्रेरणा ही प्रदान की। “अनुसंधान बहिर्साक्ष्य और आन्तर्साक्ष्यों के आधार पर कुछ अनुमान सामने आते है। जिनके आधार पर कोई बिहारी को हिन्दी के प्रसिद्ध केशवदास का पुत्र घोषित करता है।” तो कोई इनमें गुरू शिष्य के संबंध पर बल देता है। सूचना देने वाला निम्नलिखित दोहा माना जाता है।

“प्रकट भये द्विजराज कुल, सुबस बसें ब्रज आय ।
मेरो हरौ कलेस सब, केसो – केसौराय।।

इस दोहे के केसोराय को सोद्देश्य मानते हुए प्राचीन टीकाकार बिहारी द्वारा अपने पिता के प्रति की गई विनय-भावना की और संकेत करते है। इस दोहे में बिहारी ने कृष्ण के साथ-साथ किसी आलौकिक व्यक्ति को भी नमन किया है। वह निश्चित ही बिहारी के पिता होगे, जो हिन्दी के प्रसिद्ध कवि केशव ही है, किन्तु यह विषय आज तक विवाद योग्य बना हुआ है। केशव तो सनाढ्य ब्राह्मण थे और बिहारी घरवारी माथुर थे। यदि ये पिता –पुत्र रहे होते तो दोनो का गौत्रा भी एक ही होता। परन्तु बिहारी सतसई की प्रथम टीका लिखने बाले का मत है कि बिहारी के पिता का नाम केशवराय था। इस मत को रसचंद्रिमका, हरिप्रकाशटीका, तथा लाल चन्द्रिका, के रचयिता ने भी अपनी स्वीकृति प्रदान की है। परन्तु फिर भी इस संबंध में कोई ठोस तथ्यों के अनुसंधान की आवश्यकता है।

माता :-

बिहारी की माता के संबंध में हिन्दी साहित्य के इतिहास में कुछ भी उपलब्ध नहीं होता। सम्पूर्ण इतिहास ने इस विषय पर मौन धारण कर रखा है।

जाति

बिहारी जाति के ब्राह्मण थे, परन्तु सरजार्ज ग्रियर्सन ने केशवराय में राय शब्द के कारण बिहारी की जाति भाट मानी है, किन्तु कुछ जाति के प्रमाणिक साक्ष्य के आधार पर बिहारी सनाढ्य ब्राह्मण थे। आचार्य केशव ने स्वयं सनाढ्यब्राह्मण होते हुए अपने कई छंदों में अपना नाम केशवराय दिया है। अतः केशवराय से बिहारी को भाट घोषित करने का निष्कर्ष कदापि संगत प्रतीत नहीं होता। इसके अतिरिक्त मिश्रबंधुओं ने किवंदनी के आधार पर महाकवि बिहारी को ‘कंकोर कुल में उत्पन्न माना है। “डॉ० हरिवंश लाल शर्मा ने मिश्रबधुओं के इस निष्कर्ष का खण्डन किया और बिहारी को धैम्यगौत्री सनाढ्य माथुर चौबे ब्राह्मण बताया है।

जन्म :-

रीतिकालीन रीतिसिद्ध कवियों में गिने जाने वाले महाकवि का जन्म विक्रमी सं0 1652 (सन् 1595 ई0) में ग्वालियर के पास बसुआ गोविन्दपुर में हुआ। बिहारी ने अपना सम्पूर्ण बचपन बुंदेलखण्ड में व्यतीत किया तथा विवाह के उपरांत या यौवन काल में वे अपने ससुराल मथुरा में घर-जमाई बनकर रहने लगे। इस विषय में बिहारी का यह दोहा दृष्यटव्य है :-

“जनम ग्वालियर जानिये, खण्ड बुंदेले बाल ।
तरूनाई आई सुखद, मथुरा बसि ससुराल ।।”

रत्नाकार जी मानना है कि यह दोहा कवि बिहारी द्वारा रचित नहीं है, बल्कि जनश्रुतियों के द्वारा बनाया हुआ है।

“डॉ० गणपति चन्द्रगुप्त मानते है कि बिहारी का जन्म विक्रमी संवत 1652 में ग्वालियर में हुआ। उन्होने अपने बचपन के दिन बुंदेलखण्ड में व्यतीत किए और यौवन काल उन्होने मथुरा अपनी सुसराल में बिताया।

शिक्षा दीक्षा :-

“जनश्रुतियों के आधार पर बिहारी के पिता के सात-आठ वर्ष की अवस्था में ही ग्वालियर को छोड़कर ओडछे चले गये थे तथा वहां के राजा इन्द्रजीत के आश्रय में रहने लगे थे। इसिलि बिहारी की शिक्षा दीक्षा भी वही हुई। ओंडछे के निकट गुढौ ग्राम में प्रसिद्ध महात्मा नरहरिदास से बिहारी के पिता दीक्षित हुए थे ओर बिहारी पर भी उनका गहरा प्रभाव पड़ा तथा वहीं रहकर बिहारी ने संस्कृत, प्राकृत आदि भाषाओं का अभ्यास, काव्य एवं रीतिग्रंथों का पठन-पाठन किया तथा जब महात्मा नरहरिदास के कहने से बिहारी आगरा गये तब बिहारी ने वहां उर्दू-फारसी का स्वयं अभ्यास किया।

बिहारी का कृतित्व

रीतिकाल रीति सिद्ध कवियों में गिने जाने वाले महाकवि बिहारी ने अपने जीवन काल , सतसई के अतिरिक्त अन्य कोई भी रचना नहीं की। बिहारी सतसई के एक-एक दोहे पर बिहारी रसिकवृन्द मुग्ध होकर लुटे से दिखाई देते है बिहारी सतसई एक दोहाबद्ध रचना है। स्पष्ट शब्दों में श्रृंगार रस से परिपूर्ण एक मुक्तक रचना है। संस्कृत साहित्य में शतक, सप्तशती, सप्तशतिका के रूप में क्रमशः सौ, सात सौ और हजार श्लाकों की रचना प्रचुर मात्रा में हुई है। यह आवश्यक नहीं माना गया कि शतक में सौ ही श्लोक हो। फिर भी संस्कृत के रचनाकारों का ध्यान नियम के अनुसरण की की ओर अवश्य रहा है।

बहन भाई :-

जनश्रुतियों के आधार पर बिहारी की एक बहन थी जिसका विवाह वृदांव न में हरिकृष्ण मिश्र के पुत्र परशुराम मिश्र के साथ हुआ रीतिकाल के प्रसिद्ध आचार्य कुलपतिमिश्र बिहारी की बहन के पुत्र है। तथा उन्होंने अपनी चरना ‘संग्राम-सार’ के प्रारम्भ में अपने नाना केशवराय और मामा बिहारी की वंदना की है।

“कविवर मातामह सुमिरि केशव केसवराइ।
करौ कथा भरत्थ की भाषा छंद बनाई।”

जनश्रुतियों के आधार पर बिहारी का एक भाई भी था जिसका विवाह मैनपुरी में हुआ बताया जाता है।

विवाह व पत्नी

बिहारी का विवाह माथुर चौबे लोगों के घराने में हुआ था। विवाह के बाद बिहारी अपने ससुराल मथुरा में ही जाकर रहने लगे थे। बिहारी की पत्नी के नाम के संबंध में हिन्दी साहित्य के इतिहास के पन्ने शान्त है। परन्तु कुछ किचदन्तियों के अनुसार बिहारी की पत्नी एक कवयित्री थी। जिसने कुल 1400 दोहों की रचना की थी और उनमें से 700 दोहो को छांट कर बिहारी सतसई की रचना की गई है। बिहारी की पत्नी द्वारा रचित एक दोहा दृष्टव्य है।

“दूरि भजत प्रभु पीठि है गुनल विरतारन काल ।
प्रगटत प्रभु निर्गुन निकट रहि चंग रंग भूपाल।”

बिहारी की पत्नी द्वारा रचित इस दोहे से प्रसन्न होकर महाराजा जयसिंह ने बिहारी को कई ग्रामों की राजलक्ष्मी देकर सम्मानित किया। बिहारी की पत्नी पतिव्रता थी। अतः उसने अपने नाम से नहीं बल्कि बिहारी के नाम से सतसई को प्रसिद्ध कराया।

संतान :-

प्रो० विश्वनाथ प्रसाद मिश्र बिहारी को निःसंतान बताते है। परन्तु एक “किवदती के अनुसार बिहारी के एक कुष्णपाल नामक पुत्र था, जिसने बिहारी सतसई पर अपनी सवैया वाली टीका लिखी है।

विविध :- महाकवि बिहारी जयप र के राजा जयसिंह के अभिन्न मित्र थे तथा उनही के आश्रित थे। “टीकाकार देवकी नंदन की वर्णार्थ प्रकाशिका’ टीका में प्रस्तुत कविवर बिहारी के दोहा जीवन का एक रोचक प्रसंग वर्णित है। इनके अनुसार बिहारी की पत्नी भी एक कुशल कवयित्री थी वह दो दोहों की रचना करती थी ओर बिहारी राजाओं- सांमतों को दोहे सुनाकर पुरस्कार एवं दक्षिणा प्राप्त करते थे। बिहारी को अपनी प्रत्येक दोहे के लिए एक मोहर मिलती थी और उसकी से अपना गृहस्थ चलाते थे।

“नहि पराग नहिमंमधुर-मधु, नहिं विकास यहिं काल ।
अली कली ही सो बध्यो, आगे कौन हवाल।।

संबंधी दोहा पंष्पहार ले जाने वाली मालिहो के हाथ राजा जयसिंह तक भेजा। दोहे को पढ़कर राजा जयसिंह की मोह-निद्रां छिन्न-भिन्न हो गई और उन्होने कवि बिहारी को अंजलिभर सोने की मुद्राओं से विभूषित किया ओर ऐसे प्रभावपूर्ण दोहों की रचना करेन के लिए प्रति होहा एक मोहर देने का वचन दिया।

कहते है कि चौहान अन्नत कुमारी ने बिहारी को काली पहाड़ी नाम ग्राम पुरस्कार स्वरूप प्रदान किया तथा बिहारी का एक चित्र बनवाया जो आज भी मिलता है। कहा जाता है कि कि बिहारी की पत्नी ने कुल 1400 दोहों की रचना की जिसमें से 700 दोहो का चयन कर बिहारी सतसई का निर्माण किया गया। बिहारी की पत्नी चाहे कवियित्री हो, किन्तु वह मानना कठिन है कि सतसई के सभी दोहों की रचना उनकी पत्नी ने की है। क्योंकि इस तथ्य के कोई अन्यपुष्ट प्रमाण नहीं मिलते परन्तु उपरोक्त घटना से राजा जयसिंह से बिहारी के संबंध एवं आश्रय की पुष्टि आवश्य होती है।

मृत्यु :-

रीतिकालीन रीतिसिद्ध महाकवि बिहारी की मृव्यु लगभग 70 वर्ष की आयु में सर्वत् 1721 वि० (सन् 1664ई0) में माना जाता है। महाकवि बिहारी ने अपना सम्पूर्ण जीवन दरबारी वातावरण में रहते हुए भी उन्होने अपने आश्रय दाता को कड़ी फटकार सुनाई जो कि उनके स्वतन्त्र व्यक्तित्व और प्रतिभाशाली होने का प्रमाण है। मध्यकाल के विलासपूर्ण सामानती वातावरण का चित्र कवि के काव्य से पलकता है। इससे उदनके ऐश्वर्यशाली जीवन का परिचय मिलता है।

निष्कर्ष

उपर्युक्त संक्षिप्त परिचय के आधार पर कहा जा सकता है कि बिहारी का सम्पूर्ण जीवन प्रधानता चार स्थानों पर व्यतीत हुआ था। बुंदेलखंड, मथुरा, आगरा और जयपुर। बुंदेलखंड में इनका बचपन व्यतीत हुआ था तथा वहां रहते हुए परिस्थितियों के अनुकुल इन्होंने जो भाषा सीखी उनकी स्पष्ट छाप इनके काव्य में अन्दर दिखाई देती है। जैसे लखिरी, व्योरति इत्यादी क्रियाएं ‘स्यौ ज्यौ कौ’, ‘पयोसार, इत्यादी शब्द बुंदेली भाषा के है। बिहारी सतसई परकेशव का भी स्पष्ट प्रभाव लक्षित होता है। इनके कई दोहो का भाव केशव की रामचंद्रिका, कवि प्रिया और रसिकप्रिया के पद्यो से मिलता-जुलता है।।

कविवर बिहारी का यौवन काल मथुरा में व्यतीत हुआ। मथुरा में निधुवन आश्रम में अपने गुरू नरहरिदास के आश्रय में इन्होंने शिक्षा-दीक्षा ग्रहण की। हरिदास जी के सम्प्रदाय में संगीत, वादन, चित्र इत्यादी कलाओं और काव्य का प्रद्यान्य रहता है। यही कारण है कि विहारी के कावय में संस्कृत भाषा के प्रौढ़ पाडित्य के साथ-साथ अनेक शास्त्रों का ज्ञान तथा कलाभिज्ञता का परिचय प्राप्त होता है।

बिहारी का ससुराल भी मथुरा में ही था तथा विवाह के पश्चात बिहारी अपने ससुराल में ही रहने लगे थे। बहुत दिनों तक ससुराल में रहने के कारण उन्हें ससुराल में रहने के दोषों का भलिभांति ज्ञान हो गया था।

बिहारी ने अपना कुद जीवन आगरा व जयपुर में व्यतीत किया। वे जयपुर के राजा जयसिंह के आश्रय में रहे। इस प्रकार बिहारी का सम्पूर्ण जीवन दारबारी वातावरण में ही व्यतीत हुआ था। इस प्रकार हम कह सकते है कि बिहारी विभिन्न शास्त्रों भाषाओं आदि का ज्ञान था। अर्थात वे बहुज्ञाता थे। इलिए हिनदी साहित्य के इतिहास में उन्हें महाकवि की उपाधी दी जाती है।

प्रश्न . बिहारी को गागर में सागर भरने वाला कवि क्यों कहा जाता है?

अथवा

बिहारी की लोकप्रियता के कारण बताइए।

अथवा

“बिहारी ने गागर में सागर भर दिया है।” उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।

अथवा

“बिहारी एक सफल मुक्तककार हैं” इस कथन की समीक्षा कीजिए।

अथवा

मुक्तक रचना के रूप में बिहारी सतसई की विशेषताओं पर सोदाहरण प्रकाश डालिए।

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