B.Ed. / BTC/ D.EL.ED / M.Ed.

पाठ्यक्रम निर्माण के सामाजिक सिद्धान्त | Sociological Principles of Curriculum Development in Hindi

पाठ्यक्रम निर्माण के सामाजिक सिद्धान्त
पाठ्यक्रम निर्माण के सामाजिक सिद्धान्त

पाठ्यक्रम निर्माण के सामाजिक सिद्धान्त (Sociological Principles of Curriculum Development)

पाठ्यक्रम का विकास/निर्माण करते समय निम्नलिखित सामाजिक सिद्धान्तों को ध्यान में रखना चाहिए-

1. समाज की समस्याएँ एवं आवश्यकताएँ (Needs a problems of Society)- पाठ्यक्रम समाज की अवस्थाओं, आवश्यकताओं तथा समस्याओं पर आधारित होना चाहिए।

2. छात्रों तथा उनकी समस्याओं से सम्बन्धित (Concerns and Problems of Students) – पाठ्यक्रम छात्रों तथा उनकी समस्याओं से सम्बन्धित होना चाहिए।

3. सांस्कृतिक एवं सामाजिक मूल्य (Cultural and Social Values)- पाठ्यक्रम म बुनियादी सामाजिक तथा सांस्कृतिक मूल्य प्रतिबिम्बत होने चाहिए।

4. संस्कृति का हस्तांतरण (Transmission of Culture)- पाठ्यक्रम संस्कृति के उच्चतम मूल्यों का एजेन्ट (Agent) होना चाहिए।

5. व्यावहारिक (Functional)- पाठ्यक्रम व्यावहारिक तथा जीवन से सम्बन्धित होना चाहिए। यह छात्र के विकासात्मक स्तर के भी अनुकूल होना चाहिए।

6. स्वस्थ अभिवृत्तियाँ (Healthy Attitudes) – पाठ्यक्रम को मानवीय सम्बन्ध विकसित करने के लिये स्वस्थ अभिवृत्तियों का विकास करना चाहिए।

7. जगत् समाज के लिए तैयारी (Preparation for World Society)– पाठ्यक्रम छात्रों को जगत् समाज के लिये तैयार करे अर्थात् यह उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय समाज के लिए तैयार करने वाला होना चाहिए।

8. सामाजिक रूप से कुशल व्यक्ति (Scocially Efficient Persons)– पाठ्यक्रम को सामाजिक रूप से कुशल व्यक्ति तैयार करने चाहिए।

9. परिवर्तनशील (Flexibility)– पाठ्यक्रम सामाजिक उद्देश्य की प्रभावशाली पूर्ति के लिये परिवर्तनशील एवं लचीला होना चाहिए।

10. हम भावना (We Feeling) – पाठ्यक्रम ‘हम भावना’ विकसित करने वाला होना चाहिए। यह सामाजिक अन्तर्क्रिया तथा सामाजिक सम्बन्ध की भावना विकसित करने वाला हो।

11. समायोजन (Adjustment)– पाठ्यक्रम सभी मानवीय सम्बन्धों में समायोजन स्थापित करने वाला होना चाहिए।

12. सम्मान (Dignity)- पाठ्यक्रम सभी व्यवसायों एवं सेवाओं की प्रतिष्ठा की मान-मर्यादा को ध्यान में रखकर निर्मित किया जाना चाहिए। इसमें श्रम के प्रति सम्मान (Dignity of labour) को पर्याप्त महत्त्व देना चाहिए।

13. पर्याप्त सहभागिता (Wholesome Participation)- पाठ्यक्रम शैक्षिक कार्यक्रम तथा क्रियाएँ प्रदान करने वाला होना चाहिए ताकि छात्र समाज में सक्रिय भाग ले सकें।

14. व्यावसायिक एवं वैज्ञानिक विषयों पर बल (Emphasis on Vocational and Scientific Subjects)- पाठ्यक्रम में व्यावसायिक एवं वैज्ञानिक विषयों पर बल देना चाहिए।

15. उपजीविका अर्जित करना (Earning Livelihood)- पाठ्यक्रम छात्रों को उपजीविका अर्जित करने के योग्य बनाने वाला होना चाहिए।

16. सृजनात्मक दृष्टिकोण (Creative Attitude) – पाठ्यक्रम सृजनात्मक दृष्टिकोण विकसित करने वाला होना चाहिए।

व्यावसायिक सम्बद्ध (Academic Linkage) — व्यावसायिक सम्बद्ध को देखा जाये। तो इससे सम्बन्धित निम्नलिखित कार्यक्रमों को शामिल किया जाता है-

(1) व्यावसायिक विषय (Vocational subjects),

(2) वैज्ञानिक तकनीकी विषय (Scientific and technological subjects),

(3) तकनीकी विषय (Technical subjects),

(4) औद्योगिक कोर्स (Industrial courses),

(5) कार्य अनुभव (Work experience),

(6) वातावरण शिक्षा (Environment euducation),

(7) सामाजिक शिक्षा (Social education),

(8) प्रौढ़ शिक्षा (Adult education),

(9) अनौपचारिक शिक्षा (Non-formal education),

(10) महिला शिक्षा (Women education),

(11) समाज विज्ञान (Social science),

(12) कला एवं क्राफ्ट (Art and Crafts),

(13) ललित कलाएँ (Fine arts),

(14) मातृभाषा (Mother-tongue),

(15) विदेशी भाषाएँ (Foreign languages),

(16) पाठ्-सहायक क्रियाएँ (Co-crurricular activities)।

इसे भी पढ़े…

Disclaimer

Disclaimer: Sarkariguider does not own this book, PDF Materials Images, neither created nor scanned. We just provide the Images and PDF links already available on the internet. If any way it violates the law or has any issues then kindly mail us: guidersarkari@gmail.com

About the author

Sarkari Guider Team

Leave a Comment