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रचनावादी उपागम में आंकलन | Constructivist approach in assessment in Hindi

रचनावादी उपागम में आकलन
रचनावादी उपागम में आकलन

रचनावादी उपागम में आंकलन की विवेचना करें। (Discuss the Constructivist approach in assessment)

रचनावादी उपागम में आंकलन के निम्नांकित उद्देश्य होते हैं-

(i) रचनावाद के प्रत्यय को समझना;

(ii) आंकलन पर रचनावाद सिद्धान्त का आरोपण;

(iii) परम्परागत आंकलन और आंकलन के रचनावाद उपागम के मध्य अन्तरों को खोजना; और

(iv) आंकलन को समझने में भ्रान्तियों की व्याख्या करना।

रचनावाद और आंकलन (Constructivism and Assessment)

रचनावाद से सम्बन्धित साहित्य में तीन कन्सट्रक्ट्स प्राप्त होते हैं तथा अधिगम पर्यावरण के लिए उनके निहितार्थ ज्ञात होते हैं। वे हैं- (1) अधिगम एक क्रियाशील प्रक्रिया; (2) सीखने वाले छात्र में कुछ पूर्व ज्ञान होता है; और (3) सीखने वाला अपने अधिगम का स्वयं उत्तरदायित्व लेता है उक्त तीनों विचार प्रस्तुत विवरण के केन्द्र बिन्दु हैं।

इन विचारों की संक्रियात्मकता निम्नांकित कथनों द्वारा की जा सकती है-

1. आकलन सार्थक सन्दर्भ में होते हैं जो कि छात्रों के लिए प्रासंगिक है।

2. अधिगम की प्रक्रिया आंकलन की अवधि में स्थगित नहीं होती।

3. आंकलन विशिष्ट मॉड्यूल और शिक्षण परिस्थितियों के अनुरूप किया जाता है।

4. आंकलन में उच्चस्तरीय चिन्तन तथा कौशलता सन्निहित होती है, अर्थात् आरोपण मूल्यांकन, विश्लेषण और संश्लेषण।

5. आंकलन में ज्ञान और समझ का आरोपण सन्निहित होता है।

6. आंकलन में तकनीक के एक विस्तार का प्रयोग होता है।

7. आंकलन प्रत्ययों और समस्याओं तथा उनसे सम्बन्धित तथ्यों और साक्ष्यों की विस्तृत पृष्ठभूमि पर ध्यान केन्द्रित करता है।

8. आंकलन में पूछताछ शामिल होती हैं।

9. छात्र विस्तार के माध्यम से सूचना के प्रारम्भिक स्तर से परे (ज्ञान और समझ) जाते हैं और बड़े विचारों, समस्याओं तथा प्रत्ययों का गहराई से विश्लेषण करते हैं।

10. छात्र समस्याओं को हल करते हैं जिनके द्वारा वे नवीन सन्दर्भों में ज्ञान का पुनः सम्प्रत्ययीकरण तथा विस्तार करते हैं।

11. छात्र पूर्व के मूर्त अनुभवों को सामान्यीकृत करता है और उसके आधार पर अमूर्त सिद्धान्तों को तथा उनके उपयोग या आरोपण को सीखता है।

12. छात्र आरोपण के द्वारा ज्ञान का प्रदर्शन करते हैं।

13. छात्र सभी परिस्थितियों में परस्पर करते हैं, जिसमें आंकलन की अवधि भी सम्मिलित होती है।

आंकलन का प्रयोग प्रतिबिम्ब और पुनरावृत्ति द्वारा समझ के निर्माण के लिए किया जा सकता है। जब छात्र अपनी शैक्षिक प्रतिआशाओं से भिन्न हो और अपने स्वयं के कार्यों का सर्वेक्षण और समालोचना की समझ रखता हो तब इसमें गहन समझ, सृजनात्मकता, उत्पादक प्रक्रिया जिसे हम अधिगम कहते हैं कि प्रशंसा करने की गहन सम्भावनायें हैं। इस प्रक्रिया के तीन चरण हैं-

1. अध्यापक को जिस कसौटी पर कार्य का निर्णय किया जाना है उसके प्रारम्भ से ही छात्र को समझने में सहायता प्रदान करनी चाहिए।

2. छात्रों को इकाई या प्रोजेक्ट की अवधि में अपने कार्य की प्रक्रिया को लिखना चाहिए।

3. निष्पादन और प्रतिपुष्टि द्वारा विद्यार्थी कार्य की जटिल प्रकृति को समझ पाते हैं और अपने स्वयं के कार्य को सुधार सकते हैं।

रचनायुक्त कक्षाकक्ष और आंकलन (Constructivic Classroom and Assessment)

रचनावाद वस्तुतः है जो लोग कैसे सीखते हैं के सम्बन्ध में अवलोकन और है वैज्ञानिक अध्ययन पर आधारित है। यह सिद्धान्त बताता है कि लोग वस्तुओं के अपने अनुभवों और उन अनुभवों पर प्रतिबिम्बित कर अपनी समझ और संसार के सम्बन्ध में अपने ज्ञान का स्वयं निर्माण करते हैं। जब हम किसी नई वस्तु का सामना करते हैं तब हम उसका अपने पूर्व के ज्ञान से मिलान करते हैं और इस आधार पर अपने पूर्व ज्ञान या विश्वास में परिवर्तन कर सकते हैं या नई सूचना को अप्रासंगिक मानकर उसको उपेक्षित कर देते हैं। हर अवस्था में हम अपने ज्ञान के सक्रिय सृजनकर्ता होते हैं। इसके लिए हमें, हम जो कुछ जानते हैं उसके सम्बन्ध में प्रश्न, खोज और आंकलन करना होता है।

अधिगम का रचनावादी दृष्टिकोण कक्षा में अनेक विभिन्न शिक्षण पद्धतियों की ओर इंगित कर सकता है। सामान्य रूप में इसका तात्पर्य है कि विद्यार्थियों को अधिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए क्रियाशील तकनीक प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित करना और इस ज्ञान को प्रतिबिम्बित करना और चर्चा करना कि वे क्या कर रहे हैं तथा उनकी समझ किस प्रकार परिवर्तित हो रही है। रचनावादी अध्यापक निरन्तर यह आंकलन करने के लिए प्रोत्साहित करता है कि क्रिया किस प्रकार उसको समझने में सहायता कर रही है। स्वयं से और अपनी सामरिकी के सम्बन्ध में प्रश्न कर रचनावाद कक्षा में विद्यार्थी आदर्श रूप में ‘विशेषज्ञ सीखने वाले’ बन जाते हैं इससे उनको सीखने का विस्तृत पटल प्राप्त होता है। भली प्रकार से योजनाबद्ध कक्षा पर्यावरण में विद्यार्थी सीखते हैं कि कैसे सीखा जाए।

रचनावाद विद्यार्थी को सूचना की निष्क्रिय रूप से ग्रहण करने की अपेक्षा अधिगम प्रक्रिया का सक्रिय ग्रहणकर्ता के रूप में परिवर्धित कर देता है। अध्यापक द्वारा निर्देशित विद्यार्थी अपने ज्ञान का निर्माण मात्र मेकेनीकल रूप में अध्यापक या पुस्तक से ग्रहण करने की अपेक्षा सक्रिय रूप से ग्रहण करता है।

रचनात्मक कक्षा में ध्यान का केन्द्र अध्यापक से छात्रों पर केन्द्रित हो जाता है। कक्षा वह स्थान नहीं होता जहाँ अध्यापक निष्क्रिय विद्यार्थियों में ज्ञान उड़ेलता है, जो एक खाली बर्तन की भाँति भरा जाना है। रचनात्मक प्रारूप में छात्रों को अपनी अधिगम प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल होने के लिए प्रेरित किया जाता है। अध्यापक सुविधाप्रदान कर्ता के रूप में प्रकार्य करता है, वह प्रशिक्षित, व्यवहित, अनुबोध और विद्यार्थियों को समझ का विकास के आंकलन में सहायता प्रदान करता है तथा इस प्रकार उनके अधिगम में सहायता करता है।

जैसा कि अनेक वर्तमान और लोकप्रिय रूपावलियों की स्थिति में होता है जहाँ हम कदाचित कुछ अंशों में रचनावादी उपागम का प्रयोग करते हैं। रचनावादी अध्यापक प्रश्न और समस्याएँ प्रस्तुत करता है, और तब विद्यार्थियों को उन्हें उनकी समस्याओं और प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करने में सहायता प्रदान करता है। अध्यापन प्रक्रिया में वे बहुत-सी तकनीकियों का प्रयोग करते हैं। उदाहरणार्थ वे निम्नांकित का प्रयोग कर सकते हैं-

(i) विद्यार्थियों को उनके अपने प्रश्न संरचित करने के लिए प्रेरित करता है।

(ii) अधिगम की बहुविध व्यारव्याओं और अभिव्यक्तियों की सहमति प्रदान करता है।

(iii) समूह कार्य और साथियों का स्रोतों के रूप में प्रोत्साहित करना।

आंकलन की विशेषताएँ (Characteristics of Assessment)

रचनावादी उपागम के सन्दर्भ में आंकलन को विद्यार्थियों की रचनावादी उपागम में अधिगम के तीन मुख्य परिणामों की उपलब्धि की प्रगति के प्रमाप की आवश्यकता होती है- विज्ञान में प्रत्यात्मक समझ, वैज्ञानिक जाँच के निष्पादन की योग्यता और जाँच के सम्बन्ध में समझ।

सभी अधिगमकर्ता अधिगम कार्य पर कुछ प्रासंगिक ज्ञान, भावनाओं और कौशलों के साथ आते हैं। सार्थक अधिगम तब होता है जब अधिगमकर्ता नए प्रत्ययों और प्रोपोजीशन्स को प्रासंगिक प्रत्ययों और प्रोपीजीशन्स से अपने संज्ञानात्मक संरचना में सम्बन्धित करना चाहते हैं।

आंकलन का रचनात्मक उपागम योगात्मक की अपेक्षा संरचनात्मक है। इसका उद्देश्य विद्यार्थी के अधिगम की गुणवत्ता सुधारना है न कि मूल्यांकन और श्रेणी निर्धारण के लिए साक्ष्य प्रदान करना।

आंकलन को अध्यापकों, विद्यार्थियों और वैज्ञानिक विषय-वस्तु की विशेष आवश्यकताओं और विशेषताओं के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए। आंकलन, सन्दर्भ- विशिष्ट है, जो एक कक्षा में भली प्रकार कार्य करेगा पर दूसरी कक्षा में अनिवार्य रूप में भली प्रकार कार्य नहीं करेगा।

आंकलन सतत् प्रक्रिया है। अध्यापक विद्यार्थियों से उनके अधिगम की प्रतिपुष्टि प्राप्त करते हैं। अध्यापक विद्यार्थियों को आंकलन के परिणामों की प्रतिपुष्टि प्रदान कर लूप को पूर्ण करेंगे और अधिगम को सुधारने का सुझाव प्रदान करेंगे।

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