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पाठ्यचर्या निर्माण के लिए शिक्षा के उद्देश्य | Objectives of education for curriculum formation in Hindi

पाठ्यचर्या निर्माण के लिए शिक्षा के उद्देश्य
पाठ्यचर्या निर्माण के लिए शिक्षा के उद्देश्य

पाठ्यचर्या निर्माण के लिए शिक्षा के उद्देश्य (Objectives of education for curriculum formation)

पाठ्यचर्या निर्माण हेतु शिक्षा के उद्देश्य

शारीरिक विकास

मानसिक विकास

सामाजिक विकास

सांस्कृतिक विकास

नैतिक व चारित्रिक विकास

चित्र – पाठ्यचर्या हेतु शिक्षा के उद्देश्य

1. शारीरिक विकास (Physical Development)- वर्त्तमान में हमारे देश में स्कूली शिक्षा का प्रथम उद्देश्य है बच्चों का शारीरिक विकास करना। पाठ्यक्रम में शारीरिक विकास के उद्देश्य को सम्मिलित किया जाये और बालक को इस प्रकार की शिक्षा दी जाये जिससे उनका शरीर स्वस्थ, सुन्दर तथा सुदृढ़ बने। सभी गुणों तथा देशों में इसे शिक्षा का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य माना गया है। इस उद्देश्य के अनुसार शिक्षा ऐसी होनी चाहिए कि बालक को स्वस्थ एवं बलवान बना सके। प्राचीन काल में कुछ देशों में शारीरिक विकास को सर्वोपरि स्थान दिया जाता है। प्लेटो ने अपनी शिक्षा योजना में शारीरिक विकास पर बहुत बल दिया है।

रूसो ने कहा कि—“खेलकूद और व्यायाम का समुचित प्रबन्ध होना चाहिये जिससे बालक की शारीरिक शक्तियों का विकास होगा और वे स्वस्थ बनेंगे।”

रेबले ने लिखा है कि-“स्वास्थ्य के बिना जीवन नहीं है अपितु स्पूर्तिहीनता तथा वेदना की दिशा है और मृत्यु का प्रतिरूप है।”

अरस्तु ने कहा है कि- “स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क होता है।”

महाकवि कालिदास ने कहा है कि- “शरीरमाघं खलु धर्म साधनम्” अतः शरीर की साधना करना मनुष्य का पहला धर्म है। धर्म की साधना के लिए शरीर की आवश्यकता होती है।”

हॉल के अनुसार – ” अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखएि क्योंकि उसकी अवहेलना करने का आपको कोई अधिकार नहीं है। यदि आप ऐसा करते हैं तो अपने तथा दूसरों के लिए भार बन जायेंगे।”

कहने का तात्पर्य है कि पाठ्यक्रम में शिक्षा के उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए शारीरिक विकास पर भी बल दिया जाये क्योंकि आज के प्रत्येक स्कूल में शारीरिक शिक्षा को एक विषय का भी दर्जा दिया गया है । स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहने के लिए पाठ्यक्रम में इसको स्थान दिया जाय जिससे प्रत्येक बालक स्वस्थ रह सके ।

2. मानसिक विकास (Mental Development) – वर्तमान में हमारे देश में शिक्षा का दूसरा उद्देश्य है-मानसिक विकास के द्वारा बालकों में भाषा का ज्ञान कराने के साथ विचारों के आदान-प्रदान की भी शक्ति प्रदान की जा सकती है। बालकों में संवेदना, प्रत्यक्षीकरण, कल्पना और स्मृति शक्तियों का विकास हो जाता है जब तक बालकों में मानसिक विकास नहीं होगा बालक अपने पर्यावरण की वास्तविकता को समझने में असमर्थ रहेगा।

इसलिए शिक्षा के उद्देश्य की प्राप्ति के लिए पाठ्यक्रम में चिन्तन शक्ति, कल्पनाशक्ति, विचारों की शक्ति आदि को संज्ञा दी जाये। जो स्कूली शिक्षा में वर्त्तमान से अधिक प्रचलित है।

बालकों में आत्म विश्वास का विकास होता है और वह आत्म विश्वास के साथ अपने भाव एवं विचार प्रकट करने लगता है।

3. सामाजिक विकास (Social Development) – वर्तमान में देश में हमारी शिक्षा का तीसरा उद्देश्य है-सामाजिक विकास। वर्त्तमान में शिक्षा के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए सामाजिक विकास से तात्पर्य बच्चों को समाज की भावना रीति-रिवाज, अच्छाई-बुराई आदि से होता है। समाज में रहकर अच्छाई तथा बुराइयों से बचने की समझ शिक्षा के द्वारा ही उत्पन्न की जा सकती है।

शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य का अर्थ है व्यक्ति के ऊपर समाज और राज्य की सत्ता। समाज से अलग रहकर व्यक्ति का कोई अस्तित्व नहीं होता। व्यक्ति समाज का ही अंग है और समाज से ही निर्देशित होना चाहिए। शिक्षा का यह उद्देश्य है कि वह व्यक्ति को सामाजिक मूल्यों तथा आदर्शों का पालन करना सिखाए। शिक्षा के द्वारा व्यक्ति में सामाजिक गुण भरे जाएँ और उसमें सामाजिक कुशलता पैदा की जाए।

बालक या व्यक्ति से हटकर उसके वैयक्तिक जीवन का कोई महत्त्व नहीं है । व्यक्ति विकास के लिए समाज पर अवलम्बित होता है। अतः वह समाज का ऋणी है तथा इस ऋण को चुकाना हर व्यक्ति का कर्त्तव्य है। अतः शिक्षा की व्यवस्था इस ढंग से हो कि समाज प्रगति के मार्ग पर बढ़े। पाठ्यक्रम में शिक्षा के उद्देश्यों का निर्धारण तत्कालीन समाज की आवश्यकता को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिये। इसलिए अधिकांश शिक्षाशास्त्री शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य को पाठ्यक्रम (पाठ्यचर्या में) स्थान देने हेतु अधिक बल देते हैं।

बालक में सामाजिक विकास परिवार तथा विद्यालय दोनों जगहों से होता है, बच्चे का स्वाभाविक रूप से सामाजिक विकास परिवार से होता है। परन्तु उसके द्वारा समाज में रहन-सहन अच्छाई-बुराई, इस सब का चयन करने के लिए स्कूली शिक्षा की आवश्यकता होती है। इसलिए पाठ्यचर्या में समाज की अच्छाई-बुराई, आत्म विश्वास, प्रेरणा आदि को सम्मिलित करना अनिवार्य है। जिससे बालक में स्कूली शिक्षा ग्रहण कराकर उसका विकास किया जा सके। स्कूली शिक्षा द्वारा पाठ्यचर्या में सामूहिक कार्य करने को स्थान दिया जाये तथा समाज की सेवा-भाव का भी वर्णन किया जाये। ऐसा होने से बालकों में समाज के प्रति लगन, सेवा-भाव, अचार, विचार आदि के प्रति लगाव हो सकेगा।

4. सांस्कृतिक विकास (Cultural Development) — वर्त्तमान में हमारे देश में स्कूली शिक्षा का चौथा उद्देश्य है- सांस्कृतिक विकास। वर्त्तमान में हमारे देश में शिक्षा द्वारा सांस्कृतिक विकास से तात्पर्य बच्चों को अपनी संस्कृति के अनुसार आचार-विचार करने के साथ-साथ दूसरों की संस्कृतियों के प्रति उदार भाव उत्पन्न करने से होता है। मानव की सुसंस्कार क्षमता तथा सम्पन्नता ही उसकी संस्कृति है। संस्कृति एक ओर हमारे शरीर तथा मन को शुद्ध कर हमारे व्यक्तित्व का विकास करती है तथा दूसरी ओर हमें समाज सम्मत तथा शिष्ट व्यवहार करने की क्षमता प्रदान करती है। जिस व्यक्ति का संस्कार हो चुका है। जो संस्कारक्षम है वही सभ्य तथा सुसंस्कृत मनुष्य कहा जाता है। जिसके अनुसार विचार तथा मन संस्कारित हो चुके हैं, वही मनुष्य सुसंस्कृत है। संस्कृति हमारी प्रकृति की बाह्य अभिव्यक्ति है जो हमारी विचार प्रणाली, कला, धर्म, नैतिकता तथा परम्परा द्वारा व्यक्त होती है। मानव व्यक्तित्व और जीवन को अप्रत्यक्ष रूप से समृद्ध करने वाली चिन्तनधारा तथा कलात्मक एवं सृजनात्मक क्रिया ही संस्कृति है। मनुष्य सुसंस्कृत बनने के प्रयास में जिन उपादानों का सहारा लेता है वे सब संस्कृति के प्रतीक हैं। किसी देश की संस्कृति में उस देश के निवासियों का रहन-सहन आचार-विचार, रीति-रिवाज, ज्ञान-विज्ञान, कला, साहित्य का समावेश होता है। इस प्रकार संस्कृति का सम्बन्ध मानव भौतिक, आर्थिक, राजनैतिक, आध्यात्मिक दार्शनिक साहित्यिक तथा कलात्मक विकास तथा जीवन के विविध पहलुओं से है। इसीलिए संस्कृति और संस्कारों में घनिष्ठ सम्बन्ध है। शिक्षा का सम्बन्ध जीवन की प्रक्रिया से है और संस्कृति उस सक्रिया का परिणाम है। इसलिए संस्कृति जीवन की क्रिया निहित है। संस्कृति शब्द का शाब्दिक अर्थ है संस्कार की गई क्रिया अथवा विचार। व्हाइटहेड (Whitehead) ने संस्कृति की परिभाषा देते हुए लिखा है, “संस्कृति का अर्थ है वैचारिक क्रियाकलापों जीवन का सौन्दर्य तथा मानवीय भावनाओं के प्रति संवेदनशीलता। अधिक जानकारी रखने वाले व्यक्ति का जीवन केवल अपूर्ण ही नहीं है अपितु अर्थहीन है संस्कृति तथा कला जीवन को उदात्तता एवं गहराई प्रदान करती है।

पाठ्यचर्या में शिक्षा के उद्देश्य में सांस्कृतिक उद्देश्य को स्पष्ट इसलिए किया गया है क्योंकि शिक्षा और संस्कृति का घनिष्ठ सम्बन्ध है—

ओटावे के अनुसार—“शिक्षा का कार्य समाज के सांस्कृतिक मूल्यों और व्यवहारों के प्रतिमानों को युवा तथा सक्षम सदस्यों को प्रदान करना है।”

महात्मा गाँधी के अनुसार” संस्कृति ही मानव जीवन की आधारशिला और प्राथमिक वस्तु है। यह व्यक्ति के आचरण तथा व्यवहार की छोटी-छोटी बातों में भी व्यक्त होना चाहिए।”

ई.बी. टेलर के अनुसार- “संस्कृति वह जटिल समग्रता है जिससे ज्ञान, विश्वास, कला, नैतिकता प्रथाएँ, योग्यताएँ और आदतें सम्मिलित होती हैं। जिसको मनुष्य समाज के सदस्य के रूप में प्राप्त करता है।”

यह सच है कि बच्चे अपनी संस्कृति को स्वाभाविक रूप से परिवार तथा स्कूल से ही ग्रहण करते हैं। इसलिए पाठ्यक्रम में सांस्कृतिक क्रियाओं के साथ-साथ संस्कृति के विकास तथा इतिहास को भी स्थान दिया जाता है।

5. नैतिक व चारित्रिक विकास (Moral and Character Development)— वर्त्तमान में देश में स्कूली शिक्षा का पाँचवाँ उद्देश्य है- बच्चों का नैतिक व चारित्रिक विकास करना समाज में जो व्यक्ति रहता है उस समाज के आचरण सम्बन्धित कुछ नियम होते है। इन नियमों के अनुसार दूसरे व्यक्ति के साथ किये आचरण को नैतिकता और नियमों को पालन करने को चरित्र कहा जाता है।

चरित्र का अर्थ है- आन्तरिक दृढ़ता और एकीकरण चरित्र में ईमानदारी सत्यप्रियता, कर्त्तव्य परायणता, त्याग सेवा भाव तथा संवेदनशीलता का समावेश होता है चरित्रवान व्यक्ति जो भी कार्य करता है आदर्शों एवं सिद्धान्तों के अनुसार करता है। किसी भी व्यक्ति के आदर्श नैतिक हो सकते हैं और अनैतिक भी।

हरबर्ट के अनुसार- “व्यक्ति तथा समाज दोनों का वास्तविक तथा स्थायी कल्याण उच्चकोटी के नैतिक चरित्र से ही हो सकता है। इसी बात को स्पष्ट करते हुए उसने कहा कि शिक्षा के कार्यों को एक ही शब्द में अभिव्यक्त किया जा सकता है और वह शब्द है नैतिकता।

डॉ. राधाकृष्णन के अनुसार- ‘भारत सहित समस्त विश्व के कष्टों का कारण यह है कि शिक्षा केवल मस्तिष्क के विकास तक सीमित रह गई है और उसमें नैतिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों का अभाव हो गया है।

यदि हम समाज के दोषों को दूर कर एक स्वस्थ, सुखद तथा शान्तिपूर्ण समाज की स्थापना करना चाहते हैं तो हमें शिक्षा के द्वारा चारित्रिक विकास करना आवश्यक है।

हैंडर्सन के अनुसार- “चरित्र निर्माण ही शिक्षा का मूलाधार है और चरित्र के लिए नैतिकता है।” संसार में चरित्रवान व्यक्ति को ही सम्मान मिलता है। किसी व्यक्ति में चाहे हर प्रकार के गुणा मौजूद हों परन्तु यदि उसका चरित्र अच्छा न हो तो उसे समाज का सम्मान नहीं मिल सकता हरबर्ट के अनुसार, मानव का आचरण उसकी मूल प्रवृत्तियों से संचालित होता है और कभी-कभी वह अकल्याणकारी कार्य कर बैठता है। इसलिए शिक्षा का उद्देश्य है कि मानव की प्रवृत्तियों का परिष्कार कर उसे नैतिक आचरण के लिए प्रेरित करे। बालक जन्म से ही सदाचारी नहीं होता, अपनी मूल प्रवृत्तियों से प्रेरित हो वह अनैतिक आचरण कर बैठता है। अतः बालक का नैतिक विकास करने के लिए उसकी पाशविक प्रवृत्तियों का परिष्कार आवश्यक है। शिक्षा के द्वारा हम बालक में सामाजिक तथा नैतिक का विकास कर सकते हैं। बालक के चारित्रिक विकास के लिए उसकी रुचियों का विकसित होना आवश्यक है। किसी की रुचियों को देखकर उसके चरित्र का ज्ञान किया जा सकता है।

स्कूल पाठ्यचर्या को इस प्रकार से तैयार किया जाये जिसमें अच्छाई-बुराई की पहचान आसानी से की जा सके। नैतिक विकास की शिक्षा के द्वारा गलत-सही की पहचान करने में आसानी हो जाती है, सही निर्णय करने की क्षमता का विकास हो जाता है जो नैतिक है। वर्त्तमान में हमारे देश में शिक्षा की व्यवस्था करना राज्य का उत्तरदायित्व है इसलिए स्कूली शिक्षा का एक उद्देश्य बच्चों को राज्य के लोकतन्त्र का ज्ञान कराना है। शिक्षा के उद्देश्य प्राप्ति हेतु पाठ्यचर्या में तदनुकूल ज्ञान और क्रियाओं को स्थान अभी तक नहीं दिया है, इसके लिए सबसे पहली आवश्यकता है कि स्कूलों में प्रारम्भ से ही ऐसा पर्यावरण दिया जाये जिससे छात्र लोकतन्त्रीय जीवन शैली को स्वाभाविक रूप से सीखें। इसलिए पाठ्यचर्या के सम्बन्ध में शिक्षा के उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए लोकतन्त्रीय समाज के शिक्षा सम्बन्धित उद्देश्यों को भी स्थान देना चाहिए।

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