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मेसोपोटामिया की सभ्यता | Mesopotamia civilization in Hindi d.el.ed

Mesopotamia civilization in Hindi

मेसोपोटामिया की सभ्यता

मेसोपोटामिया की सभ्यता

मेसोपोटामिया की सभ्यता

मेसोपोटामिया मूल रूप से दो शब्दो से मिलकर बना है – मेसो + पोटामिया, मेसो का अर्थ मध्य (बीच) और पोटामिया का अर्थ नदी है अर्थात दो नदियों के बीच के क्षेत्र को मेसोपोटामिया कहा जाता था। पश्चिमी एशिया में फारस की खाड़ी के उत्तर में स्थित वर्तमान इराक को प्राचीन समय में मेसोपोटामिया कहा जाता था मेसोपोटामिया की सभ्यता दजला और फरात दो नदियों के मध्य क्षेत्र में जन्म, पली और विकसित हुई। इन नदियों के मुहाने पर सुमेरिया, बीच में बेबीलोनिया तथा उत्तर में असीरिया सभ्यता का विकास हुआ । इन सभ्यताओं के विषय में यह कहावत प्रचालित है कि सुमेरिया ने सभ्यता को जन्म दिया, बेबीलोनिया ने उसे उत्पत्ति के चरम शिखर तक पहुँचाया और असीरिया ने उसे आत्मसात किया। दूसरे शब्दो में सुमेरिया, बेबीलोनिया और असीरिया इन तीनों सभ्यताओं के सम्मिलन से जो सभ्यता विकसित हुई, उसे मेसोपोटामिया की सभ्यता कहा गया ।

इस क्षेत्र में तीन सभ्यताओं — सुमेरिया, बेबीलोनिया और असीरिया की सभ्यता का विकास हुआ था । अतः तीनों सभ्यताओं को सम्मिलित रूप से मेसोपोटामिया की सभ्यता के नाम से जाना जाता है। इन तीनों सभ्यताओं का अलग-अलग वर्णन किया जा रहा है –

1. सुमेरिया की सभ्यता—

मेसोपोटामिया में सर्वप्रथम सुमेरिया की सभ्यता का ही विकास हुआ था। इस क्षेत्र को अत्यधिक उपजाऊ होने के कारण ‘उपजाऊ क्रीसेण्ट’ कहा जाता है। सुमेरिया सभ्यता के लोगों ने अपनी राजधानी सुमेर बनाई थी। इसी कारण इस सभ्यता को ‘सुमेरियन की सभ्यता’ कहा जाता है।

  1. राजनीतिक स्थिति — दजला एवं फरात नदियों के कारण इस क्षेत्र में अनेक द्वीप बन गए थे। इन्हीं द्वीपों में धीरे-धीरे सभ्यता का विकास हुआ और प्रत्येक द्वीप पर एक राज्य की स्थापना हुई। सुमेरिया सभ्यता के प्रमुख राज्य-उर, किश, निष्पुर, इरिदु आदि थे। सुमेरिया सभ्यता में शासन धर्म पर आधारित था तथा ‘राजा’ को ईश्वर का प्रतिनिधि समझा जाता था। सारगन प्रथम इस सभ्यता का संस्थापक था। राजा के बाद राज्य में पुरोहित का महत्व होता था।
  2. सामाजिक जीवन — सुमेरिया सभ्यता के समाज पर धर्म का विशेष प्रभाव था। तत्कालीन समाज तीन वर्गों में विभक्त था— उच्च वर्ग, मध्यम वर्ग एवं निम्न वर्ग। उच्च वर्ग में शासक, सामन्त, उच्चाधिकारी एवं पुरोहित आदि आते थे। मध्यम वर्ग में कृषक, व्यापारी, शिल्पी आदि आते थे। इसके अतिरिक्त निम्न वर्ग में दास आते थे। तत्कालीन समाज में यद्यपि दहेज प्रथा का प्रचलन था, लेकिन फिर भी समाज में स्त्रियों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था।
  3. आर्थिक जीवन— सुमेरियन सभ्यता के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था। इस काल के लोगों ने नहरों एवं बाँधों का निर्माण कराया, जिसके परिणामस्वरूप कृषि का विकास हुआ। इस काल किसानों को अपनी कुल उपज का 1/3 भाग राज्य को कर के रूप में देना पड़ता था। सुमेरियन सभ्यता में के अन्तर्गत व्यापार की स्थिति भी अच्छी थी । व्यापार दूर-दूर तक के क्षेत्रों के साथ किया जाता था। इस सभ्यता के निवासी अनाज, खजूर, ऊनी वस्त्र आदि मिस्र एवं भारत ले जाते थे। इन देशों से सोना, चाँदी तथा मूल्यवान पत्थर (हीरा आदि) लेकर आते थे।
  4. धार्मिक जीवन — सुमेरियन सभ्यता में धर्म का विशेष महत्व था। प्रारम्भ में केवल वह एक ही देवता (एकेश्वरवाद) की पूजा किया करते थे। परन्तु बाद में अनेक देवताओं की पूजा की जाने लगी थी। प्राकृतिक शक्तियों में सूर्य एवं चन्द्रमा की पूजा की जाती थी अर्थात् यहाँ धर्म एकेश्वरवाद से बहुदेववाद की ओर अग्रसर हुआ।
  5. लेखन कला — सुमेरियन लोगों को लेखन कला का भी ज्ञान था । इनकी लिपि को ‘कीलाकार लिपि कहा जाता है। इस लिपि का आविष्कार लगभग 3000 ई.पू. में सुमेरियन लोगों ने किया था। इस लिपि में लगभग 300 अक्षर थे, जिन्हें चिह्न, चित्रों और संकेतों के माध्यम से व्यक्त किया जाता था। इस लिपि को चिकनी मिट्टी की गीली तख्तियों पर नुकीली वस्तु (कलम) से लिखा जाता था। इस लिपि में अनेक लेख भी प्राप्त हुए हैं। सुमेरिया सभ्यता के अध्ययन के बाद हम कह सकते हैं कि 300 ई. पू. की इस सभ्यता ने मानव को काफी कुछ दिया, जिसके लिए मानव जाति इस सभ्यता की ऋणी रहेगी।

2. बेबीलोनिया की सभ्यता —

सुमेरिया सभ्यता के पश्चात् इस क्षेत्र में बेबीलोनिया की सभ्यता का जन्म हुआ । बेबीलोनिया सभ्यता के लोगों ने सुमेरियन सभ्यता को नष्ट न करके उसमें सुधार कर पहले से अच्छा बनाया। इसी कारण बेबीलोनिया एवं सुमेरिया की सभ्यता में अनेक समानताएँ हैं।

बेबीलोनिया के लोग सम्भवतः अरब के रेगिस्तान के घुमक्कड़ लोग थे जिन्होंने 2000 ई. पू. के लगभग सुमेर पर विजय प्राप्त की। इन्होंने ‘बेबीलोन’ को अपनी राजधानी बनाया। इसी कारण इस सभ्यता को बेबीलोनिया की सभ्यता कहा जाता है।

बेबीलोनिया सभ्यता का राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक जीवन निम्नलिखित रूपों से स्पष्ट किया जा सकता है ।

  1. राजनीतिक जीवन — बेबीलोन का सर्वप्रमुख शासक हम्मुराबी’ था । उसने लम्बे समय लगभग 2123 ई.पू. से 2080 ई.पू. तक शासन किया। बेबीलोन में भी राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था। हम्मुराबी न केवल अत्यंत शक्तिशाली शासक था, वरन् अत्यन्त योग्य भी था । उसको विश्व का प्रथम कानून निर्माता भी माना जाता है।
  2. सामाजिक जीवन — बेबीलोनिया समाज तीन वर्ग-उच्च, मध्य एवं दास वर्ग में विभक्त था। उच्च वर्ग में पुरोहित तथा अन्य सम्पन्न व्यक्ति थे। जबकि मध्य वर्ग में किसानों एवं व्यापारियों को रखा जाता था। निम्न वर्ग में दास थे। इस सभ्यता में सामान्यतया एक पत्नी प्रथा ही प्रचलित थी।
  3. आर्थिक जीवन — इस सभ्यता में कृषि ही प्रमुख व्यवसाय था । इस सभ्यता में किसान सम्पन्न थे, क्योंकि भूमि उपजाऊ थी। किसानों को कुल उपज का 1/3 सरकार को देना पड़ता था। इस सभ्यता में व्यापार उन्नति पर था। सड़कों एवं जहाजों से व्यापार किया जाता था। उनके भारत एवं मिस्र से व्यापारिक सम्बन्ध थे।
  4. धार्मिक जीवन — इस सभ्यता में धर्म का विशेष महत्व था । यहाँ जिगुरात अर्थात मंदिर राज्य की सम्पत्ति माने जाते थे। इस सभ्यता में अनेक देवी-देवताओं की पूजा की जाती थी। इस समय पशु-बलि का भी प्रचलन था। सूर्य और चन्द्रमा की भी पूजा की जाती थी।

3. असीरिया की सभ्यता —

हम्मुराबी की मृत्यु के पश्चात् बेबीलोनिया का साम्राज्य कमजोर हो गया। असीरियन लोगों ने बेबीलोन पर आक्रमण कर अधिकार कर दिया। इन्होंने मेसोपोटोमिया के विशाल भू-भाग पर अपने साम्राज्य की स्थापना की। उनके राज्य में ‘अस्सुर’ – नामक नगर के कारण वे असीरियन कहलाए | इनका सबसे प्रसिद्ध शासक असीरि बेत्रिपाल था। यह एक विद्वान शासक था । इस सभ्यता की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक एवं धार्मिक जीवन व्यवस्था अग्रलिखित थी-

  1. राजनीतिक स्थिति — असीरियन की राजधानी निनेवे थी। यह दजला नदी के किनारे थी। इस सभ्यता में कुशल एवं सुव्यवस्थित शासन की स्थापना की गई थी। इस सभ्यता में भी राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था। वह अत्यन्त शक्तिशाली होता था। प्रशासन की सुविधा हेतु साम्राज्य को इकाइयों में बांटा गया था। प्रत्येक इकाई का सर्वोच्च अधिकारी राज्यपाल होता था। जिसका कार्य कर वसूल करना, प्रशासनिक व्यवस्था बनाए रखना एवं जनता की सुरक्षा करना था। इस सभ्यता में अपराधियों को कठोर दण्ड दिया जाता था।
  2. आर्थिक जीवन — असीरियन सभ्यता भी कृषि प्रधान थी । यहाँ के लोगों का मुख्य व्यवसाय खेती करना था। कृषि के अतिरिक्त उद्योगों का भी विकास होने लगा था। इन लोगों ने लोहे का प्रयोग करना भी शुरू कर दिया था। लोहे के औजार बनाने वाले ये सम्भवतः प्रथम लोग थे।
  3. सामाजिक जीवन—इस सभ्यता के लोगों का समाज तीन भागों में विभक्त था । उच्च वर्ग में सामन्त एवं पुरोहित, मध्य वर्ग में व्यापारी एवं कृषक तथा निम्न वर्ग में दास आदि थे। इस काल में स्त्रियों की स्थिति अच्छी नहीं थी। परदा प्रथा प्रचलित थी।
  4. धार्मिक जीवन — इस सभ्यता में धर्म का महत्व कम था। इस सभ्यता के लोग असुर, मर्दुक एवं ईश्वर की पूजा करते थे। असीरियनों ने शक्ति के बल पर शासन की स्थापना की थी। अतः यह अधिक समय तक कायम नहीं रह सकी और इस सभ्यता का पतन हो गया।

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