इतिहास / History

भारत का विभाजन कितने खण्डों में हुआ ? भारत- विभाजन के प्रमुख कारण

भारत का विभाजन तथा भारत- विभाजन के कारण

भारत का विभाजन

भारत का विभाजन

भारत का विभाजन

भारत का विभाजन 15 अगस्त, 1947 को ‘भारतीय स्वतन्त्रता अधिनियम’ के अनुसार भारतीय महाद्वीप पर ब्रिटिश शासन का अन्त हुआ और भारत व पाकिस्तान-दो स्वतन्त्र अधिराज्य अस्तित्व में आये। कांग्रेस चाहती थी कि दोनों के गवर्नर जनरल एक ही रहें, ताकि संक्रमण काल (Transitional period) की समाप्ति शान्तिमय ढंग से हो सके. लेकिन पाकिस्तान द्वारा इस प्रकार प्रस्ताव स्वीकार न किये जाने के कारण भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड माउण्टबेटन तथा पाकिस्तान के गवर्नर जनरल श्री जिन्ना बने।

भारत-विभाजन के कारण

विगत वर्षों में भारत का विभाजन एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना है। देश-विभाजन के निम्नलिखित कारण हैं-

1. मुसलमानों की अलगाववादी नीति – 20वीं सदी के शुरू से ही मुसलमानों ने अलगावादी नीति को अपनाना शुरू कर दिया। इसके पूर्व सरकार की मुस्लिम विरोधी नीति के परिणामस्वरूप मुस्लिम जाति बहुत पिछड़ गई थी तथा उसकी प्रगति अवरुद्ध हो गई थी। वे भविष्य में हिन्दू प्रभुत्व से भय खाने लगे थे। इसके नेता सर सैयद अहमद खाँ ने यह महसूस किया कि हिन्दुओं से अलग रहकर ही मुसलमान प्रगति कर सकते हैं। ब्रिटिश सरकार ने भी भारतीय राष्ट्रीयता तथा एकता की भावना को नष्ट करने के लिए मुसलमानों को पृथक्तावादी नीति अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया। धीरे-धीरे मुसलमानों की पृथक्तावादी नीति दृढ़तर होती गई। मुहम्मद इकबाल और जिन्ना ने इस दिशा में विशेष कार्य किया। इसने साम्प्रदायिकता का रूप ले लिया, जिसका अन्तिम परिणाम देश का विभाजन हुआ।

2. हिन्दुओं की अछूतवादी नीति – हिन्दुओं की अछूतवादी नीति ने मुसलमानों की पृथकतावादी नीति के लिए आग में घी का काम किया। कट्टरपंथी हिन्दू मुसलमानों के सामाजिक बहिष्कार में विश्वास करते थे। उनके रीति-रिवाज और व्यवहार ने मुसलमानों को यह सोचने के लिए बाध्य कर दिया कि हिन्दू बहुसंख्यक भारत में उनका धर्म, संस्कृति और भाषा सुरक्षित नहीं है। फलतः हिन्दुओं के प्रति मुसलमानों में घृणा की भावना पैदा हो गई। यह भावना दृढ़तर होती गई और इसने साम्प्रदायिक विद्वेष का रूप धारण कर लिया।

3. जिन्ना की हठधर्मी – जिन्ना ने शुरू से ही पाकिस्तान के निर्माण के लिए कड़ा रुख अपनाया। बहुत प्रयत्नों के बावजूद उसने हठधर्मी को नहीं छोड़ा। उसने राष्ट्रवादियों को तब तक सहयोग देने से इन्कार कर दिया जब तक कि उन्होंने पाकिस्तान की माँग को स्वीकृति नहीं दे दी। दूसरी ओर कांग्रेस किसी भी कीमत पर विदेशी सत्ता से मुक्ति पाने के लिए व्याकुल थी, अत: उसने तत्कालीन परिस्थिति में कोई दूसरा रास्ता न निकलते देख अनमने ढंग से भारत विभाजन को स्वीकार कर लिया। 3 जून, 1947 ई. को लॉर्ड माउण्टबेटेन ने कहा था, “एक अखण्ड भारत भारतीय समस्या का सर्वोत्तम साधन होता है। लेकिन, चूँकि पाकिस्तान के अलावा किसी अन्य आधार पर दलों में समझौता होने की सम्भावना नहीं थी, इसलिए उन लोगों ने भारत-विभाजन को हिचक के साथ स्वीकृति दी थी।”

4. अंग्रेजों की भारत को कमजोर बनाने की नीति – अंग्रेज वर्षों से भारत का शोषण कर रहे थे और भविष्य में भी वे इससे लाभ उठाना चाहते थे, अत: इन्हें दुर्बल भारत की आवश्यकता थी। इसका सबसे सरल उपाय था कि उसका विभाजन कर दिया जाए और विभाजन के बाद भी आपस में लड़ते रहें, अत: उन्होंने ऐसी नीति अपनायी जिससे लाचार होकर कांग्रेस को पाकिस्तान के निर्माण की माँग को मानना पड़ा।

5. ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति – शुरू से ही अंग्रेजों ने भारत पर अपना शासन बनाये रखने के लिए भारतीयों में फूट डालकर शासन की नीति अपनायी। इसी उद्देश्य से सम्प्रदायिकता का बीज बोया और मुसलमानों को राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष करने को प्रोत्साहित किया। 1909,1919 और 1935 ई. के अधिनियमों द्वारा पृथक् निर्वाचन की व्यवस्था पर सम्प्रदायवाद की जड़ को मजबूत बना दिया। इस प्रकार, अंग्रेजों ने भारत में पृथकतावाद, सम्प्रदायवाद और पारस्परिक फूट का बीज बोया जो अन्त में भारत विभाजन का कारण बना।

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