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परामर्श की भूमिका | परामर्श का महत्त्व | परामर्श और निर्देशन में अंतर | परामर्श की प्रविधियाँ | वर्तमान सन्दर्भ में परामर्श की प्रासंगिकता

परामर्श की भूमिका
परामर्श की भूमिका

परामर्श की भूमिका (Role of Counselling)

परामर्श की भूमिका- मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और अपने समाज में रहते हुए ही उसका विकास एवं जीवन-यापन आदि समस्त प्रक्रियाएँ सम्पादित होती हैं। जीवन के प्रथम चरण से लेकर अन्तिम चरण तक अलग-अलग समय पर अलग-अलग समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कुछ समस्याएँ ऐसी होती है जिसका समाधान व्यक्ति स्वयं प्राप्त कर लेता है लेकिन कुछ समस्याएँ ऐसी होती हैं जिन्हें वह स्वयं हल नहीं कर पाता। ऐसी समस्याओं के समाधान के लिए उसे ऐसे व्यक्तियों पर निर्भर होना पड़ता है जो उसकी समस्या को हल करने में सहायक हो सकते हैं। जिन व्यक्तियों पर वह अपनी समस्या के समाधान हेतु निर्भर रहता है, वे व्यक्ति उससे अधिक अनुभवी एवं योग्य होंगे। समस्या हल करने हेतु प्राप्त सहायता जो कि सलाह के रूप में होती है, परामर्श कही जाती है।

दुनिया में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसके जीवन में समस्याएँ न उत्पन्न हुई हों और सभी समस्याओं का समाधान उसने स्वयं कर लिया हो। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को चाहे वह कितना ही योग्य हो उसके जीवन में कभी न कभी, कहीं न कहीं समस्याएँ आती हैं जिनके समाधान हेतु उसे दूसरे अनुभवी एवं योग्य व्यक्तियों की सहायता की आवश्यकता पड़ती है। सहायता को दूसरे शब्दों में परामर्श भी कहा जा सकता है। इसलिए कहा जा सकता है कि परामर्श जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं में से एक है जो सभी के लिए आवश्यक है। इस तथ्य से परामर्श प्रक्रिया का महत्त्व स्वयं स्पष्ट हो जाता है। किसी भी मनुष्य के जीवन में परामर्श का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। एक उपयुक्त, उत्तम और उचित परामर्श मनुष्य के जीवन को आलोकित कर विकास का पथ प्रशस्त करता है। इसके अभाव में व्यक्ति का जीवन अन्धकारमय हो सकता एवं उसके विकास के मार्ग अवरुद्ध हो सकते हैं। समाज में औपचारिक रूप से भी लोग परामर्श प्राप्त करते हैं और अनौपचारिक रूप से भी प्राप्त करते हैं।

व्यक्ति के जीवन का कोई भी पक्ष ऐसा नहीं है जिसमें परामर्श की आवश्यकता न हो। जीवन के सामान्य कार्य से लेकर विशिष्ट कार्य तक कोई भी हो, व्यक्ति परामर्श अवश्य प्राप्त करता है। छोटा बच्चा या कोई बड़ा व्यक्ति बीमार होने पर चिकित्सक या ऐसे लोगों से सलाह या परामर्श लेता है जो रोग के निदान एवं उपचार में सक्षम होते हैं। शिक्षा के क्षेत्रों में जैसे- किस संस्था में प्रवेश लेना चाहिए? किस पाठ्यक्रम में प्रवेश मिल सकता है? कौन-सा पाठ्यक्रम उपयुक्त होगा? कौन-सा पाठ्यक्रम अब अधिक प्रचलित हो रहा है? कौन से पाठ्यक्रम के लिए कौन सी संस्था उपयुक्त है? पाठ्यक्रम के कौन से भाग को समझने में कठिनाई आ रही है? वर्तमान में किस तकनीकि साधन का उपयोग उपयुक्त विशिष्ट बालकों की आवश्यकताओं को कैसे पूरा किया जाए? उनके लिए उनकी आवश्यकतानुसार शिक्षा की किस प्रकार व्यवस्था की जाए आदि अनेकों प्रश्न हैं जहाँ परामर्श की अति आवश्यकता पड़ती है। इसी प्रकार विद्यार्थी / व्यक्ति को व्यावसायिक क्षेत्र में भी व्यावसायिक पाठ्यक्रम संस्थान एवं व्यवसाय चयन से सम्बन्धित प्रश्नों जैसे- किस व्यावसायिक पाठ्यक्रम में प्रवेश लेना उचित रहेगा? कौन सा व्यवसाय व्यक्ति विशेष के लिए उपयुक्त है? व्यक्ति विशेष किस व्यवसाय हेतु तैयार है एवं किसके लिए उसमें योग्यता, क्षमता एवं रूचि है? कौन से व्यावसायिक पाठ्यक्रम के लिए कौन सी प्रशिक्षण उचित रहेगी? आदि के समाधान हेतु परामर्श की आवश्यकता होती है।

इसी प्रकार व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन से जुड़ी अनेक समस्याओं के समाधान हेतु व्यक्ति / को परामर्श की आवश्यकता होती है। समायोजन सम्बन्धी समस्याओं के निराकरण में भी परामर्श की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। हमारे भारतीय समाज में विवाह जीवन का एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। वैवाहिक सम्बन्धों को स्थापित करने में भी परामर्श बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। अब तो अनेक सामाजिक संगठन वैवाहिक सम्बन्धों हेतु अलग-अलग तरीकों से सेवा प्रदान करते हैं। पारिवारिक सम्बन्धों में यदि कभी उतार-चढ़ाव आता है तो वहाँ भी परामर्श की आवश्यकता होती है। वैवाहिक सम्बन्धों में स्थायित्व के लिए एवं विच्छेद के लिए भी परामर्श सेवा महत्त्वपूर्ण निभाती है। कानूनी मामलों में भी विधिक सलाह/परामर्श आवश्यक होता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि मानव जीवन का कोई ऐसा पक्ष नहीं है जहाँ उसे परामर्श की आवश्कता न हो। जीवन के प्रत्येक स्तर पर एवं प्रत्येक पक्ष में परामर्श सेवा अति महत्त्वपूर्ण होती है एवं मानव जीवन को सुगमतापूर्वक विकास पथ पर अग्रसर करने में परामर्श की भूमिका अति महत्त्वपूर्ण है।

परामर्श का महत्त्व (Importance of Counselling

परामर्श सेवा के महत्त्व को निम्नलिखित बिन्दुओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-

(1) समस्या एवं समस्या के कारणों को जानने में महत्त्वपूर्ण ( Importan Knowing the Problem and the Causes of Problem) – परामर्श प्रक्रिया तभी संचालित की जा सकती है या यह सेवा किसी व्यक्ति को तभी की जा सकती है। जब परामर्शदाता को व्यक्ति की समस्याओं एवं उनके कारणों का ज्ञान हो। परामर्श सेवा का प्रथम उद्देश्य यही है कि समस्या एवं समस्या के कारणों को ज्ञात करना। समस्या एवं उसके कारणों को ज्ञात करने के लिए परामर्श प्रक्रिया में साक्षात्कार को मिश्रित करना पड़ता है। इसीलिए कहा जाता है कि परामर्श सेवा साक्षात्कार निर्मित है।

(2) निर्देशन की प्रक्रिया को पूरा करने में महत्त्वपूर्ण (Important in Completing the Process of Guidance) – निर्देशन प्रक्रिया बिना परामर्श के सम्भव नहीं होता है। निर्देशन प्रक्रिया को पूरा करने के लिए परामर्श सेवा की सहायता लेना अनिवार्य होता है। निर्देशन प्रक्रिया की पूर्णता परामर्श के द्वारा ही होती है। इसलिए निर्देशन प्रक्रिया को पूर्ण करने में परामर्श सेवा अति महत्त्वपूर्ण है।

(3) परामर्श प्राप्तकर्ता में स्वतः समस्या समाधान की योग्यता विकसित करने में सहायक (Helpful in Developing the Ability to Solve the Problem by Counsellee Himself)- परामर्श का मूल उद्देश्य किसी समस्याग्रस्त व्यक्ति की सहायता इस प्रकार करना कि वह अपनी समस्या का समाधान करने में स्वयं सक्षम बन सके। एक परामर्श को उत्तम परामर्श तभी माना जाता है जब व्यक्ति में स्वयं निर्णय लेने की क्षमता विकसित हो जाए इस दृष्टिकोण से परामर्श सेवा व्यक्ति में स्वयं समस्या समाधान की योग्यता विकसित करने में अति महत्त्वपूर्ण हैं ।

(4) व्यक्ति की समस्या समाधान में सहायक (Helpful in Solving the Problem of Individual) – समस्याग्रस्त व्यक्ति समस्या समाधान हेतु जब दूसरों पर निर्भर होता है तो सहायता स्वरूप उसे परामर्श सेवा प्रदान की जाती है। प्राप्त परामर्श के आधार पर व्यक्ति अपनी समस्या का समाधान ढूँढ़ता है और समाधान प्राप्त भी कर लेता है। यदि किसी समस्याग्रस्त व्यक्ति को सही समय पर उचित परामर्श नहीं मिलता तो उसके विकास का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। इस दृष्टिकोण से परामर्श सेवा अति आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण होती है।

(5) समायोजन सम्बन्धी समस्याओं को दूर करने में सहायक (Helpful in Removing the Problems Related to Adjustment) – कभी-कभी व्यक्ति / विद्यार्थी का जब कार्यक्षेत्र / विद्यालय बदलता है तब उस समय नए स्थान, नए वातावरण एवं नई परिस्थितियों में समायोजन स्थापित करने में समस्या उत्पन्न होती है। ऐसी स्थिति में परामर्श सेवा की आवश्यकता पड़ती है। परामर्श सेवा प्राप्त करने के पश्चात् व्यक्ति / विद्यार्थी की समायोजन सम्बन्धी समस्या दूर हो जाती है। इस दृष्टिकोण से अर्थात समायोजन सम्बन्धी समस्याओं को दूर करने में परामर्श सेवा अति महत्त्वपूर्ण होती है।

(6) व्यक्तित्व विकास में सहायक (Helpful Personality Development) – परामर्श सेवा एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास में सहायता मिलती है। एक सामान्य व्यक्ति के व्यक्तित्व को परामर्श प्रक्रिया द्वारा विकसित कर उसकी क्षमताओं एवं योग्यताओं का समुचित उपयोग करना सम्भव होता है। व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में तो व्यवस्थित ढंग से व्यक्तित्व विकास हेतु नियमित कक्षाएँ संचालित की जाती हैं तथा इस हेतु छात्रों को समय-समय पर निर्देशन एवं परामर्श सेवाएँ प्रदान की जाती हैं। शैक्षणिक एवं व्यावसायिक संस्थाओं के अतिरिक्त भी व्यक्तिगत स्तर पर व्यक्तित्व विकास के लिए अनुभवी एवं योग्य प्रशिक्षक व्यवसाय रूप में परामर्श सेवा प्रदान करते हैं। अतः परामर्श सेवाएँ व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास में सहायक होती हैं और इस कार्य में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

(7) व्यक्ति के सामाजिक विकास में सहायक (Helpful in Social Development of a Person)- मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है जिसका समाज के वातावरण में रहकर ही विकास होता है। कभी-कभी कोई व्यक्ति जब सामाजिक वातावरण से अनुकूलन स्थापित नहीं कर पाता उस स्थिति में उसका सामाजिक विकास अवरुद्ध हो जाता है। सामाजिकता के गुणों के अभाव में उसका समाज में उठना-बैठना, मेल-जोल आदि नहीं हो पाता है, जिसके कारण उसके भीतर हीन भावना उत्पन्न हो जाती है। वह समाज से विलग हो जाता है और स्वयं को अलग-थलग महसूस करता है। ऐसी स्थिति के निराकरण में परामर्श सेवाएँ महत्त्वपूर्ण होती हैं। परामर्श सेवा प्रदान कर उस व्यक्ति में सामाजिकता के गुणों का विकास कर उसको समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जा सकता है। इस प्रकार परामर्श व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

(8) बीमारियों के निदान एवं उपचार में सहायक (Helpful in Diagnosis and Treatment of Diseases)—व्यक्ति जब बीमार होता है तब चिकित्सक उसका परीक्षण करता है उससे पूछताछ करता है जिससे कि वह बीमारी के कारणों और बीमारी के बारे में पता लगा सके। यह प्रक्रिया वह निरीक्षण एवं साक्षात्कार द्वारा पूरी करता है तत्पश्चात् बीमारी के उपचार के लिए चिकित्सक उसे परामर्श देता है। प्रत्येक बीमारी के इलाज के लिए परामर्श अति महत्त्वपूर्ण है। उचित परामर्श प्राप्त कर कोई बीमार व्यक्ति शीघ्र ठीक हो जाता है।

(9) पारिवारिक, वैवाहिक व अन्य सम्बन्धित समस्याओं के समाधान में सहायक (Helpful in Solving Family, Marital and Other Related Problems) – परिवार समाज की एक इकाई है कोई व्यक्ति प्रथमतया अपने परिवार का सदस्य होता है। तत्पश्चात् समाज का सदस्य परिवार में रहते हुए उसका पालन-पोषण होता है, बड़ा होता है, विवाह करता है तथा अन्य व्यक्तिगत पारिवारिक, सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करता है। इन दायित्वों के निर्वहन में उसके समक्ष समय-समय पर अनेक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। उदाहरण के लिए विवाह के सम्बन्ध में अनेक समस्याएँ आती हैं- चाहे प्रेम विवाह किया जाए या माता पिता की पसंद से? घरेलू लड़की से विवाह बेहतर होगा या कामकाजी लड़की से? अन्तर्जातीय विवाह करना उचित होगा या सजातीय विवाह के पश्चात संयुक्त परिवार में रहें या एकल परिवार के रूप में? इसके अतिरिक्त भी अनेक पारिवारिक, सामाजिक, विवाह सम्बन्धी एवं वैवाहिक जीवन की समस्याएँ होती है जिनके समाधान में परामर्श की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

(10) शैक्षिक समस्याओं के समाधान में सहायक (Helpful in Solving the Educational Problems) – प्रत्येक विद्यार्थी के अध्ययन काल में उसे शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर कुछ न कुछ समस्याओं का सामना करना पड़ता है। शिक्षा के स्तर के अनुरूप समस्याओं का स्वरूप भी अलग-अलग होता है। पाठ्यक्रम चयन, संस्था चयन आदि अनेक ऐसी समस्याएँ हैं जिनके समाधान हेतु निर्देशन एवं परामर्श की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। इसी प्रकार विषय में अध्ययन हेतु परामर्श की आवश्यकता पड़ती है। आजकल शिक्षा के लिए विदेश जाने का प्रचलन बढ़ गया है। इसके लिए अनेक परामर्शदात्री संस्थाएँ एवं व्यक्तिगत रूप से परामर्श सेवा प्रदान करने वाले अनुभवी व्यक्ति व्यावसायिक तौर पर सक्रिय हैं।

(11) व्यावसायिक समस्याओं के समाधान में सहायक (Helpful in Solving the Vocational Problems)- प्रत्येक विद्यार्थी / व्यक्ति के जीवन में एक बार आजीविका के साधन के चयन से सम्बन्धित गम्भीर प्रश्न अवश्य उपस्थित होता है। अध्ययनकाल में ही विद्यार्थी को यह निर्धारित कर लेना उचित रहता है कि भविष्य में उसे किन साधनों द्वारा आजीविका का संचालन करना चाहिए। इसी के आधार पर विद्यार्थी व्यावसायिक पाठ्यक्रम को चयनित करता है। कौन सा व्यावसायिक पाठ्यक्रम उपयुक्त होगा? किस पाठ्यक्रम हेतु कौन सा व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थान उचित होगा? किस पाठ्यक्रम में विद्यार्थी की रुचि है एवं किसके लिए वह सक्षम है? आदि समस्याओं के समाधान हेत परामर्श पर निर्भर होना पड़ता है। इसी प्रकार जब किसी व्यक्ति को व्यवसाय एवं उसके संसाधनों तथा किन माध्यमों / सरकारी साधनों / सामाजिक संस्थाओं / निजी साधनों द्वारा सहायता / अनुदान प्राप्त हो सकती है आदि के विषय में जानकारी प्राप्त करनी होती है, तब उस स्थिति में परामर्श की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है। उचित परामर्श उपयुक्त समय पर प्राप्त करके कोई भी व्यक्ति सफलता प्राप्त कर सकता है। “

(12) मानसिक रोगों / मानसिक रोगियों के उपचार में सहायक (Helpful in the Treatment of Mental Diseases/Mental Patients) – मनोविकार, मनोरोगियों आदि के उपचार में भी परामर्श सेवा की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। निरीक्षण एवं साक्षात्कार के साथ परामर्श का उपयोग इस प्रकार के रोगों एवं रोगियों के उपचार में अत्यन्त लाभदायक होता है।

परामर्श और निर्देशन में अंतर (Difference between Guidance and Counselling in Hindi)

निर्देशन (Guidance) परामर्श (Counselling)
(1) निर्देशन का क्षेत्र व्यापक होता है। परामर्श का क्षेत्र संकुचित होता है।
(2) निर्देशन की आवश्यकता सामान्यतः सभी व्यक्तियों को होती है। परामर्श की आवश्यकता केवल उन व्यक्तियों को होती है जिन्हें विशेषतः शैक्षिक, मनोवैज्ञानिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
(3) प्रायः निर्देशन वैयक्तिक अथवा सामूहिक रूप से दिया जाता है। परामर्श की प्रक्रिया प्रमुख रूप से सामूहिक होती है।
(4) निर्देशन शक्ति, समय एवं वित्तीय रूप से मितव्ययी होता है। परामर्श दीर्घकालिक होने के साथ-साथ खर्चीली प्रक्रिया है।
(5) निर्देशन प्रमुख रूप से शैक्षिक एवं व्यावसायिक समस्याओं से सम्बन्धित होता है। परामर्श का सम्बन्ध मुख्यतः संवेगात्मक एवं समायोजनात्मक समस्याओं से है।
(6) निर्देशनकर्ता प्रायः निर्देशन की विषयवस्तु को पहले से जानता है। परामर्शदाता पहले से परामर्श की विषयवस्तु को नही जानता है।
(7) निर्देशन में साक्षात्कार लेना अनिवार्य नही है। परामर्श में साक्षात्कार अनिवार्य होता है।
(8) निर्देशन प्रदान करने के लिए प्रार्थी एवं निर्देशकर्ता के मध्य घनिष्ठता होना आवश्यक होता है। परामर्श प्रदान करने हेतु परामर्शदाता एवं प्रार्थी के मध्य सम्बन्ध या घनिष्ठता होना आवश्यक नहीं होता है।
(9) इसकी प्रकृति समस्या निवारणात्मक होती है। परामर्श की प्रकृति उपचारात्मक होती है।
(10) निर्देशन का दृष्टिकोण व्यापक एवं बहिर्मुखी होता है। परामर्श का दृष्टिकोण संकीर्ण एवं अन्तर्मुखी होता है।
(11) निर्देशन में व्यक्ति के निर्देशन की गोपनीयता नही रहती या कम रहती है। परामर्श में प्रायः व्यक्ति से सम्बन्धित जानकारियों को गुप्त रखा जाता है।

वर्तमान सन्दर्भ में परामर्श की प्रासंगिकता (Relevance of Counselling in Present Context)

जहाँ तक भारत का सम्बन्ध है परामर्श के अनौपचारिक एवं आनुषंगिक तकनीक का पता प्राचीन काल से लगाया जा सकता है। पंचतन्त्र एवं जातक कथाओं में दृष्टान्तों और प्रश्न उत्तर तकनीक देखने को मिलती है। शिक्षक एवं छात्र का सम्बन्ध गुरु एवं शिष्य का होता था जिसमें गुरू का अर्थ गाइड अथवा रास्ता दिखाने वाला होता था। बदलते सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य के सन्दर्भ में परामर्श की आवश्यकता अप्रत्याशित गति से बढ़ रही है। मार्गदर्शन एवं परामर्श का नया दृष्टिकोण स्कूलों, कालेजों, विश्वविद्यालयों एवं अन्य संस्थानों की विस्तृत मांग है। यह शैक्षिक, व्यावसायिक एवं व्यक्तिगत समस्याओं को हल करके एक समृद्ध एवं सुयोग्य वातावरण का निर्माण करता है। आर्थिक वैश्वीकरण एवं तकनीकी प्रगति तथा कार्यों की वृद्धि ने परामर्श की आवश्यकता को और अधिक बढ़ा दिया है। विद्यालयों में बढ़ते पाठ्यक्रम, क्रियाएँ एवं कौशलों के विस्तार ने परामर्श को विद्यालय का एक आवश्यक भाग बना दिया।

फस्टर (Fuster) ने परामर्श को व्यवहार परिवर्तन कौशल में वृद्धि, निर्णय लेने की क्षमता में बढ़ावा, सम्बन्धों में सुधार और सुविधाजनक बनाने के लिए आवश्यक बताया है। व्यक्ति के बहुत से तनाव एवं दबाव के कारणवश जीवन के प्रत्येक पक्ष में तेजी से बदलाव आया है।

किशोर बच्चों को अनजाने एवं आकस्मात में भी विभिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ता है। वे वर्तमान शिक्षा प्रणाली से व्याकुल एवं अधिकारहीन महसूस करते हैं। तेजी से विकसित समाज में छात्र समायोजन एवं अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यदि उन्हें यथोचित परामर्श नहीं प्राप्त हुआ तो वे असामाजिक कार्यों में लिप्त अथवा अपने पथ से भटक सकते हैं। छात्र समाज एवं स्वयं के मध्य अन्तर्द्वन्द्व महसूस करते हैं तथा वर्तमान शिक्षा प्रणाली में अनुशासनहीनता एक सामान्य समस्या बन गई है। वर्तमान में किशोरों में बहुत सी सामाजिक समस्याएँ जैसे शराब, तम्बाकू नशीले पदार्थों एवं दवाओं का सेवन प्रमुख है। इसके परिणामस्वरूप बहुत से छात्र अपना पथ भटक जाते हैं एवं अनैतिक कार्यों में संलिप्त हो जाते हैं। छात्रों को एक सुनियोजित मार्गदर्शन एवं परामर्श कार्यक्रम के माध्यम से ही इन छात्रों का मार्गदर्शन किया जा सकता है तथा इन्हें अनैतिक कार्यों से दूर करके अनुशासित एवं नियन्त्रित किया जा सकता है। परामर्श किशोरों के उपयुक्त कैरियर के चयन में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर रहा है।

उच्च स्तर पर कैरियर का चुनाव व्यक्ति के जीवन के लिए एक चिन्तनीय एवं चुनौती भरा कार्य होता है। यह उसके भविष्य जीवनशैली, स्तर, आय, सुरक्षा एवं कार्य संतुष्टि से सम्बन्धित होता है। गलत चयन से वह असन्तुष्ट नाखुश एवं निश्चित रूप से अपने जीवन में फेल हो सकता है क्योंकि व्यवसाय एवं उसकी जीविका उसके चुनाव पर निर्भर करती है। सभी व्यक्ति सभी व्यवसायों के लिए समान रूप से उपयुक्त प्रदर्शन करने में सक्षम नहीं होते हैं। प्रत्येक व्यवसाय की कुछ शैक्षिक एवं व्यावसायिक योग्यता की आवश्यकता है, जिनमें ये योग्यता होती है वही सफल होते हैं। परामर्श उन्हें कैरियर के चुनाव तथा योग्यता को प्राप्त करने में सहायता करती है। यह छात्रों की क्षमता एवं रुचियों के अनुसार चुनाव कर उनके सफलता का प्रतिशत बढ़ा देती है तथा इससे सम्बन्धित किसी भी प्रकार की समस्या उनका पथ प्रदर्शन करती है।

इस प्रकार की परिस्थिति में परामर्श आवश्यक रूप से सहायता करती है तथा यह वर्तमान शिक्षा के सन्दर्भ में आवश्यक है। शैक्षिक संस्थान सार्वभौमिक पैमाने पर मार्गदर्शन एवं परामर्श सेवाएँ प्रदान कर रहे है। कुछ संस्थान दूरदर्शन सेवाएँ प्रदान कर रहे हैं। कुछ संस्थान दूरदर्शन चैनलों एवं रेडियो पर प्रश्नों के द्वारा बहुत से लोगों का मार्गदर्शन एवं परामर्श में महत्त्वपूर्ण भूमिका निर्वाह कर रहे हैं। दुर्भाग्य से अधिकतर स्कूलों में उचित परामर्श की सुविधा उपलब्ध नहीं है, इसलिए इस प्रकार के बालक को साथियों एवं अन्य माध्यमों से अपनी समस्याओं को हल करते हैं। इस परिस्थिति में यह आवश्यक हो जाता है कि शिक्षण संस्थाएँ छात्रों के जीवन कौशल को बेहतर बनाने, उनका मार्गदर्शन एवं परामर्श के लिए एक संगठित कार्यक्रम का आयोजन समय समय पर करें तथा इसके माध्यम से छात्रों की क्षमता एवं रुचि के अनुसार कैरियर, व्यवसाय आदि चुनने में सहायता करें। उपर्युक्त तथ्यों के अवलोकन से यह निष्कर्ष निकलता है कि परामर्श की प्रासंगिकता मात्र कैरियर, जीवनवृत्त एवं भविष्य के निर्माण हेतु ही आवश्यक नहीं है बल्कि बेहतर देश के निर्माण एवं विकास के लिए भी यह आवश्यक है।

परामर्श की प्रविधियाँ (Techniques Of Counselling)

परामर्श प्रक्रिया के दौरान जो प्रविधियाँ प्रयोग में लाई जाती हैं वह सेवार्थी / विद्यार्थी के व्यक्तित्व एवं उसकी विशेषताओं के आधार पर चयनित की जाती हैं। विलियमसन (Williamson) महोदय ने परामर्श की प्रविधियों को पाँच शीर्षकों के अन्तर्गत वर्णित किया है, जो निम्नलिखित हैं-

(1) सौहार्द / मधुर सम्बन्ध स्थापित करना (To Establish Rapport Cordial Relations) – सेवार्थी जब प्रथम बार परामर्शदाता के पास जाता है तब परामर्शदाता का प्रथम कर्तव्य यह है कि वह उसके साथ सम्मानपूर्ण ढंग से पेश आए एवं अच्छा व्यवहार करे। सेवार्थी को आरामदेह स्थिति में लाकर सेवार्थी का विश्वास अर्जित करना चाहिए। सेवार्थी से मधुर सम्बन्ध स्थापित करने का मुख्य आधार है- परामर्शदाता की योग्यता एवं ख्याति, वैयक्तिकता (Individuality) का सम्मान एवं साक्षात्कार से पहले विश्वास, विद्यार्थी के साथ सम्बन्धों को विकसित करने की प्रक्रिया आदि

(2) आत्मबोध निर्मित करना (Cultivating/ Creating Self Understanding)- विद्यार्थी / सेवार्थी / व्यक्ति को स्वयं की योग्यताओं, क्षमताओं एवं उत्तर दायित्वों का स्पष्ट ज्ञान एवं समझ होनी चाहिए। इन बातों की जानकारी सेवार्थी को इनके प्रयोग से पहले ही होनी चाहिए। इसके लिए परामर्शदाता को परीक्षणों को प्रशासित करने एवं इनसे प्राप्त परीक्षण अंकों की व्याख्या करने का अनुभव होना आवश्यक है।

(3) क्रिया हेतु कार्यक्रम नियोजन एवं सुझाव (Advising and Planning a Programme of Action) – परामर्शदाता सेवार्थी के उद्देश्यों, उसकी अभिवृत्तियों या दृष्टिकोणों आदि से प्रारम्भ करता है एवं अनुकूल व प्रतिकूल (Favourable and Unfavourable) तथ्यों या आँकड़ों या सूचनाओं की ओर संकेत करता है। वह साक्ष्यों या प्रमाणों का आंकलन करता है एवं इस तथ्य को समझता है कि वह विद्यार्थी को कोई विशेष सुझाव क्यों दे रहा है। विलियमसन महोदय का मानना है कि परामर्शदाता को अपने दृष्टिकोण का कथन पूरी निश्चिंतता के साथ करना चाहिए। उसे अनिर्णायक की स्थिति मे कभी नहीं दिखना चाहिए।

एक परामर्शदाता को प्रत्यक्ष सवाल या सुझाव देने से नहीं हिचकना या डरना चाहिए। विलियमसन महोदय ने आँकड़े एकत्रित करने के बाद सुझाव /सलाह देने के लिए निम्न प्रविधियाँ बताई हैं-

(i) प्रत्यक्ष सलाह (Direct Advising) – परामर्शदाता निर्भय होकर अपना सुझाव या सलाह देता है। यह प्रविधि कठोर मस्तिष्क एवं कठोर विचारों वाले व्यक्तियों के लिए उपयुक्त होती है जो किसी भी क्रिया या गतिविधि का विरोध करते हैं एवं असफल होने से भी नहीं डरते।

(ii) प्रेरक विधि (Persuasive Method) – यह विधि तब लाभकारी होती है जब आँकड़े स्पष्ट रूप से किसी निश्चित विकल्प की ओर संकेत करते हैं। परामर्शदाता केवल प्रमाणों का विश्लेषण करता है और वैकल्पिक क्रियाओं (Alternate Actions) के परिणामों को देखता है।

(4) व्याख्यात्मक विधि (Explanatory Method)- यह विधि परामर्श प्रक्रिया में सबसे अधिक वांछित विधि है। इस विधि में परामर्शदाता ध्यान पूर्वक धीरे-धीरे निदानात्मक आँकड़ों को समझता है एवं सम्भावित स्थितियों की ओर संकेत करता है जिनमें सेवार्थी की योग्यताओं एवं क्षमताओं का उपयोग किया जा सकता है।

(5) अन्य कार्यकर्ताओं का सहयोग (Cooperation by Other Personnel Workers)—एक परामर्शदाता सभी प्रकार की समस्याओं को नहीं सुलझा सकता है। उसे सीमाओं को पहचानना चाहिए एवं विशिष्टीकृत सहायता के प्रत्येक सम्भव स्रोतों के विषय में जानकारी होनी चाहिए। उसे सेवार्थी को अन्य उपयुक्त तरीकों से सहायता लेने की सलाह देनी चाहिए।

उपरोक्त वर्णित प्रविधियों के अतिरिक्त कुछ अन्य प्रविधियाँ भी हैं जो परामर्श में प्रयुक्त होती हैं। ये प्रविधियाँ इस प्रकार हैं-

(1) मौनधारण (Silence)— कई परिस्थितियाँ कभी – कभी ऐसी भी होती हैं जिसमें मौन रहकर किसी की बात को सुनना अधिक प्रभावशाली होता है। सेवार्थी जब अपनी समस्या के विषय में बताता है, उस समय परामर्शदाता मौन रहकर उसकी बात सुनता है।

(2) स्वीकृति (Acceptance) – परामर्शदाता कई बार कुछ शब्द कहकर अस्थाई रूप से सेवार्थी को इस बात की स्वीकृति देता है कि वह उसकी बात को ध्यानपूर्वक सुन रहा है लेकिन परामर्शदाता इन शब्दों का प्रयोग इस प्रकार करता है कि सेवार्थी को धारा प्रवाह बोलने में बाधा नहीं पहुँचती जैसे- हुं, ठीक है, अच्छा आदि। कई बार बिना कोई शब्द बोले परामर्शदाता स्वीकारात्मक ढंग से सिर हिला देता है।

(3) स्पष्टीकरण (Clarification) – विभिन्न अवसरों पर परामर्शदाता को चाहिए कि वह सेवार्थी की बातों या उसके द्वारा किए गए वर्णन का स्पष्टीकरण दे साथ ही यह भी ध्यान रखें कि स्पष्टीकरण करते समय सेवार्थी को किसी दबाव या जोर-जबरदस्ती का आभास न हो।

4() पुनर्कथन ( Restatement) – कभी-कभी परामर्शदाता सेवार्थी द्वारा कही गई बात को स्वीकृति देने के साथ ही उनकी पुनरावृत्ति भी करता है। परामर्शदाता द्वारा दी गई स्वीकृति एवं पुनर्कथन सेवार्थी को इस बात का आभास देते हैं कि परामर्शदाता को उसकी बात समझ में आ रही हैं और वह उसे स्वीकार कर रहा है।

(5) मान्यता (Approval)—सेवार्थी अपनी समस्या से सम्बन्धित विभिन्न विचारों को व्यक्त करता है। कुछ विचारों को परामर्शदाता मान्यता प्रदान करता है एवं कुछ को नहीं । परामर्शदाता द्वारा जिन बातों या विचारों को मान्यता दे दी जाती है उससे सेवार्थी प्रभावित होता है। परामर्शदाता का व्यक्तित्व एवं ज्ञान भी सेवार्थी को प्रभावित करते हैं।

(6) प्रश्न पूछना (Asking Question)- परामर्शदाता को चाहिए कि वह सेवार्थी को उसकी समस्या से सम्बन्धित विचारों को और अधिक प्रेरणा प्रदान करने के लिए कुछ प्रश्न पूछे। सेवार्थी द्वारा अपनी बात पूरी कह लेने के पश्चात् ही ये प्रश्न पूछे जाते हैं।

(7) सारांश स्पष्टीकरण (Summary Clarification) – सेवार्थी द्वारा अपनी समस्या के सन्दर्भ में अभिव्यक्त किए गए सारे विचार लाभप्रद नहीं होते। इस कारण कभी-कभी सेवार्थी को ही अपनी समस्या के विषय में अस्पष्टता हो जाती है। ऐसी स्थिति में परामर्शदाता का कर्तव्य है कि वह सेवार्थी द्वारा अभिव्यक्त विचार को संक्षिप्त कर उसे सुव्यवस्थित करे जिससे वह समस्या को स्पष्ट रूप से समझ सके। परामर्शदाता का यही प्रयास होना चाहिए कि इस प्रक्रिया में उसके विचार न शामिल हों।

(8) विनोद भाव (Sense of Humour) – परामर्शदाता को चाहिए कि वह सम्पूर्ण परामर्श की प्रक्रिया के दौरान सेवार्थी को तनावमुक्त रखें। इसके लिए वह मधुर बातचीत के साथ-साथ बीच-बीच में विनोद या हास्य का पुट भी प्रयोग करें।

(9) विश्लेषण (Analysis) – परामर्शदाता सेवार्थी द्वारा अभिव्यक्त विचारों से उसकी समस्या को विश्लेषित कर उसका समाधान प्रस्तुत करने की पहल कर सकता है लेकिन परामर्शदाता सेवार्थी को उसे स्वीकार करने हेतु बाध्य नहीं कर सकता। यह सेवार्थी पर निर्भर करेगा कि वह परामर्शदाता द्वारा सुझाए गए समाधान को स्वीकार करे अथवा अस्वीकार करे।

(10) व्याख्या/ विवेचना (Interpretation) – परामर्शदाता को सेवार्थी द्वारा अभिव्यक्त विचारों की विवेचना का अधिकार होता है। इसमें उसे अपनी ओर कुछ नहीं जोड़ना चाहिए। सेवार्थी द्वारा अभिव्यक्त विचारों से ही परामर्शदाता निष्कर्ष निकालता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि सेवार्थी स्वयं निष्कर्ष निकालने में सक्षम नहीं होता है।

(11) आश्वासन (Assurance) – परामर्शदाता का कार्य है कि वह सेवार्थी की समस्या के समाधान हेतु उसे आश्वस्त करे एवं उसमें आशा का संचार करे। आश्वासन परामर्श की सबसे महत्त्वपूर्ण एवं मनोवैज्ञानिक पक्ष से जुड़ी प्रविधि के रूप में कार्य करता है। आश्वासन स्वीकृति से अधिक व्यापक है। इसमें स्वीकृति शामिल होता है।

(12) परित्याग (Abandonment) – कई बार सेवार्थी जो कुछ सोचता है या विचार व्यक्त करता है वह त्रुटिपूर्ण होता है। त्रुटिपूर्ण विचारों का परित्याग आवश्यक होता है। को यह कार्य बड़ी ही सावधानी के साथ करना चाहिए जिससे सेवार्थी के मन में विद्रोह की भावना न पनपे एवं वह परित्याग का अर्थ न निकाले।

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