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सांस्कृतिक अभिविन्यास | Cultural Orientation in Hindi

सांस्कृतिक अभिविन्यास
सांस्कृतिक अभिविन्यास

सांस्कृतिक अभिविन्यास से आप क्या समझते हैं? (What do you mean by cultural orientation)

मनुष्य में देश-प्रेम की भावना प्राचीन काल से ही पाई जाती रही है। हमारे देश में तो जननी और जन्मभूमि को स्वर्ग से भी बढ़कर माना गया है। कविवर रामनरेश त्रिपाठी ने मानव की स्वाभाविक देश-प्रेम की भावना को इस प्रकार व्यक्त किया है-

‘विषुवत रेखा का वासी जो, जीता है नित हाँफ-हाँफ कर

करता है अनुराग अलौकिक, वह भी अपनी मातृभूमि पर।

ध्रुव वासी जो हिम में, तन में, जी लेता है काँप-काँप कर

कर देता है प्राण निछावर, वह भी अपनी मातृभूमि पर।”

इस प्रकार देश-प्रेम का अर्थ उस स्थान से प्रेम रखना है जहाँ व्यक्ति जन्म लेता है और ऐसा होना स्वाभाविक भी होता है। राष्ट्रीयता देश-प्रेम अथवा देश-भक्ति से अधिक व्यापकता की ओर संकेत करती है तथा राष्ट्रीयता की भावना का जन्म अठारहवीं शताब्दी में फ्रांस की महान क्रांति के पश्चात् ही हुआ है। राष्ट्रीयता का अर्थ केवल राज्य के प्रति असीम भक्ति ही नहीं है अपितु इसका अभिप्राय राज्य तथा उसके धर्म, भाषा, इतिहास तथा संस्कृति से भी पूर्ण श्रद्धा रखना है । अतः, राष्ट्रीयता, राष्ट्र के प्रति अपार भक्ति, आज्ञापालन, कर्त्तव्यपरायण एवं सेवा है, परंतु देश-प्रेम एवं राष्ट्रीय चेतना दोनों एक-दूसरे से गुँथे हुए हैं।

देश-प्रेम, देश भक्ति एवं राष्ट्र-प्रेम उसी स्थिति में सम्भव है जब व्यक्ति को अपने राष्ट्र और राष्ट्र की समस्त भौतिक एवं सांस्कृतिक सम्पत्ति से प्रेम हो । अतः, सामान्य रूप में हम यह कह सकते हैं कि राजनीतिक क्षेत्र में जिसे राष्ट्रीयता कहा जाता है, साहित्य की भाषा में उसे ही देश-प्रेम, देश भक्ति और राष्ट्र-प्रेम कहा जाता है। इस प्रकार सच्चा देश-प्रेम अथवा सच्ची राष्ट्रीयता वही है जिसमें व्यक्ति देश-हित अथवा राष्ट्र हित के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तैयार हो । इस दृष्टि से राष्ट्रीय चेतना अथवा राष्ट्रीय एकता को हम इस प्रकार परिभाषित कर सकते हैं-

“जब किसी राष्ट्र के नागरिक स्थान, वेश-भूषा, खान-पान, रहन-सहन, भाषा-साहित्य, मूल्य-मान्यताओं, जाति, समूह और धर्म आदि के अंतर होते हुए भी अपने को एक समझते हैं तथा राष्ट्र-हित के आगे अपने व्यक्तिगत एवं सामूहिक हितों का त्याग करने को तत्पर होते हैं तो इस भावना को राष्ट्रीय चेतना अथवा राष्ट्रीय एकता कहा जाता है।”

भारतीय विभिन्न जातियों, धर्मों, भाषाओं एवं संस्कृतियों का देश है । भारतीय संविधान में इसी दृष्टि से राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बन्धुता बढ़ाने का संकल्प प्रस्तुत किया गया है । राष्ट्र को सबल एवं सफल बनाने के लिए नागरिकों में राष्ट्रीयता की भावना विकसित करना परम आवश्यक है। इसलिए विभिन्न प्रदेशों, भाषाओं, उप-संस्कृतियों, सम्प्रदायों की विविधताओं में एकता का अनुभव कराकर मातृभूमि के प्रति प्रगाढ़ प्रेम की उस भावना को अक्षुण्ण बनाए रखना जिसका विकास हमने राष्ट्रीय आंदोलन के समय किया था, हमारी वर्तमान शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए, जिससे हम अपनी राष्ट्रीय संस्कृति, परम्पराओं एवं मान्यताओं पर गर्व कर सकें।

वर्तमान समय में भारत में राष्ट्रीय चेतना के विकास में जो तत्व बाधक हैं उनमें प्रमुख हैं— प्रांतवाद, क्षेत्रीयता, भाषावाद, साम्प्रदायिकता, मूल्यहीन सत्तावाद, त्यागपूर्ण नेतृत्व का अभाव, कर्तव्यों के प्रति विमुखता तथा अधिकारों के प्रति प्रमुखता आदि। इन बाधाओं को पार करने के उद्देश्य से विद्यालयों के पाठ्यचर्या में आवश्यक परिवर्तन करके उसमें समाज सेवा एवं राष्ट्रीय सेवा के कार्यों को अनिवार्य किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय पर्व एवं राष्ट्रीय त्यौहारों को मनाने पर विशेष बल दिया जाना चाहिए। प्राथमिक स्तर के पाठ्यचर्या में लोकगीतों तथा देश के विभिन्न भागों की कहानियों को विशेष स्थान दिया जाना चाहिए। इसमें देश के भिन्न-भिन्न भागों का भौगोलिक ज्ञान और वहाँ की सांस्कृतिक झाँकी प्रस्तुत करने वाली पाठ्य-सामग्री होनी चाहिए। माध्यमिक स्तर के पाठ्यचर्या में धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा तथा सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय महत्त्व की पाठ्य सहगामी क्रियाओं को महत्त्व दिया जाना चाहिए। इस स्तर पर भारत के औद्योगिक एवं आर्थिक विकास से सम्बन्धित विषयों को पाठ्यचर्या में स्थान दिया जाना चाहिए त्रिभाषा सूत्र को लागू करना चाहिए। विश्वविद्यालय स्तर पर भारत की विभिन्न भाषाओं, धर्मों एवं संस्कृतियों के तुलनात्मक अध्ययन की व्यवस्था की जानी चाहिए। इस स्तर पर शिक्षा का माध्यम हिन्दी अथवा अंग्रेजी हो, किन्तु अन्ततः राष्ट्रभाषा हिन्दी को ही माध्यम बनाने पर बल देना चाहिए।

सरकारी तन्त्र व अन्य शक्तिशाली समितियाँ (System of Governance and Power Relations)

शिक्षा द्वारा राष्ट्र तथा समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती है। शासन प्रणाली बदलने से पाठ्यचर्या के प्रारूप को बदलना होता है। केन्द्र तथा राज्य स्तर की पार्टी की सत्ता बदलने से भी पाठ्यचर्या के प्रारूप पर प्रभाव पड़ता है। पाठ्यचर्या के विशिष्ट प्रारूप को -केन्द्रीय सरकार प्रभावित करती है। रूस में शासन सत्ता बदलने से पाठ्यचर्या का प्रारूप बिल्कुल ही बदल गया था।

भारत में भी पाठ्यचर्या के प्रारूप का निर्माण अध्ययन समितियों, राष्ट्रीय आयोग व विभिन्न बोर्डों द्वारा किया जाता है। विभिन्न स्तरों पर अध्ययन समितियों के द्वारा पाठ्यचर्या का निर्माण व सुधार किया जाता है। अध्ययन समिति के सदस्यों की सूझ-बूझ व अनुभवों द्वारा ही पाठ्यचर्या के प्रारूप को विकसित किया जाता है। साधारणतः अध्ययन समिति के अध्यक्ष ही पाठ्यचर्या का प्रारूप बनाते हैं और बदलते हैं।

इसी प्रकार राष्ट्रीय आयोग तथा समितियाँ भी गठित की जाती हैं जो विश्वविद्यालय, माध्यमिक तथा प्राथमिक स्तर पर सुधार के लिए सुझाव देती हैं और उन सुझावों को लागू करने के प्रयास में पाठ्यचर्या के प्रारूप को भी बदलना पड़ता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में व्यावसायिक शिक्षा (Vocational education) को अधिक महत्त्व दिया गया है। अतः, शिक्षा के आयोगों तथा समितियों के सुझाव के पर भी पाठ्यचर्या का प्रारूप निर्धारित होता है।

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