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पाठ्यवस्तु का श्रेणीकरण एवं संगठन | Gradation and Organization of Context in Hindi

पाठ्यवस्तु का श्रेणीकरण एवं संगठन
पाठ्यवस्तु का श्रेणीकरण एवं संगठन

पाठ्यवस्तु का श्रेणीकरण एवं संगठन (Gradation and Organization of Context)

पाठ्यवस्तु के विश्लेषण के पश्चात् उसके तत्त्वों को क्रमबद्ध रूप से व्यवसाय करने के लिए निम्नांकित नियमों का अनुसरण करना चाहिए-

(1) ज्ञात से अज्ञात की ओर (Known to unknown)।

(2) सरल से जटिल की ओर (Simple to complex)।

( 3 ) स्थूल से सूक्ष्म की ओर (Concrete to abstract)।

(4) अंश से पूर्ण की ओर (Part of whole) ।

(5) अवलोकन से तर्क की ओर (Observation to logical Thinking)।

शिक्षण की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि शिक्षक कैसे अपनी योग्यता, सूझबूझ, कल्पना तथा सृजनशीलता का प्रयोग शिक्षण वस्तु के विश्लेषण तथा संश्लेषण में करता हैं।

पाठ्यवस्तु के तत्त्वों की विशेषताएँ (Characteristics of Content Elements)

पाठ्यवस्तु के तत्त्वों की निम्नांकित विशेषताएँ होती हैं-

(1) तत्त्व स्वयं में पूर्ण (Complete) होता है और छात्रों द्वारा सरलता से समझा जा सकता हैं।

(2) तत्त्व को पृथक रूप से छात्रों को समझाया जा सकता है।

(3) तत्त्व छात्रों के व्यवहार में परिवर्तन ला सकते हैं।

(4) छात्रों की अनुक्रिया से पता चल जाता है कि उन्हें तत्त्व का ज्ञान या नहीं।

( 5 ) तत्त्व का मापन प्रश्नों के द्वारा सम्भव होता है। आवश्यकतानुसार एक या ज्यादा प्रश्न एक तत्त्व का मापन करने में समर्थ होते हैं

(6) छात्रों के व्यवहार से तत्त्व में स्तर का मापन किया जा सकता है। जैसे ज्ञान का स्तर, बोध स्तर अथवा चिन्तन स्त स्तर ।

(7) तत्त्वों को यदि क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत किया जाये तो किसी प्रत्यय, विचार या तथ्य का विकार किया जा सकता है।

पाठ्यवस्तु विश्लेषण का प्रयोग पाठ योजना निर्माण के क्षेत्र में भी किया जाता है। इसीलिए एक परिभाषा के अनुसार-

“Task analysis consists of abilities to analyse the objectives in terms of behavioural change in cognitive, conative and effective area.”

ज्ञानात्मक क्षेत्र में पाठ्य विश्लेषण के माध्यम से निम्नांकित तत्त्वों पर पहुँचा जा सकता है और उनमें तादात्म्य स्थापित किया जा सकता है-

(1) पद (Term ) ।

(2) प्रत्यय (Concept)।

(3) तथ्य (Facts) ।

(4) नियम एवं सिद्धान्त (Laws and Principles)।

(5) संकेत (Symbols) ।

( 6 ) थ्योरी ( Theory ) ।

(7) प्रक्रियायें (Process / Methodology)।

(8) कल्पना (Assumptions / postulates )।

(9) सम्बन्ध (Relationship ) |

क्रियात्मक (Conative)- क्षेत्र में प्रकरणों का विश्लेषण करते समय शिक्षक को निम्न बातों पर ध्यान देना चाहिए-

(1) Performative Acquision, (2) Expressional Acquision, (3) Conventional Acquision.

भावात्मक (Affective)- क्षेत्र के प्रकरणों के विश्लेषण में निम्नांकित तथ्यों को ध्यान में रखना चाहिए (1) General Appreciation Ability, (2) Appreciation in Particular, (3) Appreciation with Novelty.

पाठ्य-वस्तु विश्लेषण, शिक्षक के लिये उद्देश्य-निर्धारण प्रक्रिया में दिशा-निर्देश प्रदान करते हैं।

क्रिया-विश्लेषण (Job Analysis)- इसे व्यावसायिक विश्लेषण भी कहा जाता है। इसमें कुछ सामाजिक तथा व्यावसायिक (Professional) क्रियाओं तथा भूमिकाओं का विश्लेषण किया जाता है; जैसे-

उदाहरण- 1.

क्रिया-विश्लेषण

क्रिया-विश्लेषण

उदाहरण- 2.

क्रिया-विश्लेषण

क्रिया-विश्लेषण

कौशल विश्लेषण (Skill Analysis) – किसी विशिष्ट कार्य के सफल निष्पादन हेतु विभिन्न कौशलों की आवश्यकता होती है। इनका विश्लेषण ही कौशल विश्लेषण कहलाता है,

जैसे- शिक्षक के विशिष्ट कौशल हैं

( 1 ) प्रश्न पूछना।

(2) प्रेरणा देना।

(3) पुनर्बलन प्रदान करना ।

(4) व्याख्या करना।

(5) स्पष्टीकरण देना।

(6) श्यामपट्ट पर लिखना आदि ।

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