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अन्तःअनुशासनात्मक पाठ्यक्रम एवं बहिअनुशासनात्मक पाठ्यक्रम

अन्तःअनुशासनात्मक पाठ्यक्रम एवं बहिअनुशासनात्मक पाठ्यक्रम
अन्तःअनुशासनात्मक पाठ्यक्रम एवं बहिअनुशासनात्मक पाठ्यक्रम

अन्तःअनुशासनात्मक पाठ्यक्रम (Interdisciplinary Curriculum)

प्रत्येक छात्र क्या जानना चाहता है तथा उन्हें अर्थपूर्ण अधिगम किस प्रकार दिया जा सकता है। इसी परिप्रेक्ष्य में अन्तःअनुशासनात्मक पाठ्यक्रम का विकास हुआ है जिसमें अध्यापक व छात्र एक सहयोगिक समूह में रहकर कार्य करते हैं। इसमें सामान्य अनुशासन के अतिरिक्त अन्य कई नियमों का अनुसरण किया जाता है जिससे प्रभावी अधिगम सम्भव होता है। भारत जैसे विकासशील देश में छात्र परम्परागत शैक्षिक विधियों के कारण शिक्षण का पूर्ण लाभ नहीं उठा पाते हैं जिससे छात्रों को सही शिक्षण नहीं प्राप्त होता है, क्योंकि परम्परागत शिक्षण कुछ अनुशासनों पर निर्भर होता है जबकि अलग-अलग बौद्धिक क्षमता वाले छात्र कक्षा में बैठे होने के कारण अन्तःअनुशासनात्मक पाठ्यक्रम की आवश्यकता नहीं है। इस पाठ्यक्रम में पाठ्यचर्या चूँकि कई अनुशासनों से जुड़ी होती है, अतः इससे छात्रों को लम्बे समय तक चलने वाले कौशलों का विकास हो पाता है तथा वे स्वयं को भविष्य हेतु तैयार कर लेते हैं।

इस पाठ्यक्रम में बहुआयामी अनुशासन को विभिन्न विधियों और विशेषताओं के साथ सम्मिलित किया जाता है। इसके साथ-साथ छात्रों के अधिगम के साथ-साथ जीवन-शैली के विभिन्न कौशलों को भी विकसित किया जाता है ताकि छात्र अपने जीवन लक्ष्य को जानकर उसे प्राप्त कर सकें।

बहिअनुशासनात्मक पाठ्यक्रम (Transdisciplinary Curriculum)

बहिर्झनुशासनात्मक पाठ्यक्रम का अर्थ जल्दी-जल्दी बदलने वाले ऐसे पाठ्यक्रम से है जिसमें दो या उससे अधिक विषयों के अध्ययन की झलक मिलती है, किन्तु किसी एक विशिष्ट विषय के अध्ययन के सम्बन्ध में स्पष्ट रूप से व्याख्या करना सम्भव नहीं होता है। बहिर्झनुशासनात्मक पाठ्यक्रम में दो सम्प्रत्यय हैं-

(1) नवीन ज्ञान के स्वरूप को समझना एवं समस्या समाधान में सहयोग करना। एक नये प्रकार का ज्ञान जिसने विश्व में नवीन दृष्टिकोण व जीवन के अनुभवों को समाहित कर एक नई जगह बना ली हो।

(2) वैज्ञानिक तथा अवैज्ञानिक स्रोत के आधार पर अंतरशास्त्रीय विषयों का मेल।

ब्रूनर ने अपनी पुस्तक ‘Structure of Discipline’ में कुछ उदाहरणों से इस प्रश्न को स्पष्ट करने का प्रयास किया। उनमें से कुछ उदाहरण यहाँ प्रस्तुत किये जा रहे हैं-

(1) ब्रूनर ने भाषा की संरचना का आधार ‘वाक्य गठन’ तथा उस विधि को माना है जिसके द्वारा अर्थ बदले बिना भाषा के रूप में विविधता लायी जा सकती है।

(2) ब्रूनर की दृष्टि में जीव विज्ञान की संरचना ‘बाह्य अभिप्रेरणा एवं गमनशील क्रिया’ के बुनियादी सम्बन्ध पर आधारित है।

(3) किसी अनुशासन का आधार कभी-कभी समानान्तर स्थितियों की खोज भी हो सकती है।

(4) बीजगणित की संरचना गुणन, वितरण एवं सह-सम्बन्ध पर आधारित है। ब्रूनर के अनुसार ये तीन आधारभूत तत्त्व बीजगणित की विविध क्रियाओं को समझने का आधार प्रदान करते हैं।

इस प्रकार निष्कर्ष के रूप में यह कहा जा सकता है कि ब्रूनर की दृष्टि में किसी अनुशासन की संरचना आधारिक संकल्पनाओं, सिद्धान्तों, सामान्यीकरण, अन्तर्दृष्टियों तक ही सीमित नहीं है। यह बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि वह किस प्रकार का ‘अनुशासन’ है तथा कुछ सीमा तक इस बात पर कि कोई व्यक्ति किसी अनुशासन में किस बात को आधारिक महत्त्व देता है। उदाहरणार्थ, यह पूर्ण विश्वास के साथ नहीं कहा जा सकता है कि इतिहास की संरचना एवं शिक्षण विधि के बारे में सभी इतिहासकार एकमत हैं।

हरबर्ट एम. क्लीबार्ड का मानना है कि ब्रूनर द्वारा प्रस्तुत कोई भी उदाहरण यह स्पष्ट नहीं करता कि विभिन्न अनुशासन कुछ ऐसे सामान्य एवं पारस्परिक रूप से सम्बन्धित सिद्धान्तों के ढाँचे पर आधारित हैं जो सभी अनुशासनों में समान रूप से विद्यमान हैं। अतः वह ब्रूनर को अपने उद्देश्य में असफल मानता है। इस सम्बन्ध में क्लीबार्ड कहते हैं कि अध्ययन अध्यापन के लिए किसी क्षेत्र के संगठन की समस्या, उसकी संरचना का आधार खोजने और तब उसे पूर्णरूपेण सम्प्रेषित करने में निहित न होकर, यह निश्चित करने में निहित है कि इस हेतु कौन-कौन से आधारभूत सिद्धान्त एवं संकल्पनाएँ रह सकती हैं।

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